हिमाचल प्रदेश: चीची के जंगल में पेड़ काटना तो दूर, सूखा गोबर उठाना भी देव अपराध; जानें सबकुछ विस्तार से
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में देवदारों के बीच फैला जंगल देव वन है। इसकी खास बात ये है कि यहां पेड़ काटना तो दूर, सूखी लकड़ी, पत्ते या यहां तक कि पशुओं का सूखा गोबर उठाना भी देव अपराध माना जाता है। पढ़ें पूरी खबर...
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राजधानी शिमला के ठियोग विकास खंड का चीची गांव। यहां घने देवदारों के बीच फैला जंगल सिर्फ एक जंगल नहीं, बल्कि हजारों लोगों की आस्था का केंद्र है। यह जंगल स्थानीय लोगों के लिए देव वन है। एक ऐसा वन, जहां पेड़ काटना तो दूर, सूखी लकड़ी, पत्ते या यहां तक कि पशुओं का सूखा गोबर उठाना भी देव अपराध माना जाता है। ठियोग की देवरीघाट पंचायत के चीची देहात के अंतर्गत आने वाला यह जंगल चीची गांव, कुफर खनाल और शावग के बीच करीब 22 बीघा क्षेत्र में फैला हुआ है।
जंगल के भीतर कटे हुए पेड़ों के ठूंठ ढूंढे नहीं मिलते। इस जंगल की लकड़ी का प्रयोग स्थानीय लोगों के लिए प्रतिबंधित है। स्थानीय लोग इस जंगल से पशुओं का सूखा गोबर तक नहीं उठा सकते क्योंकि गोबर में देवदार की महीन पत्तियां चिपकी होती हैं। स्थानीय निवासी विक्रम शर्मा बताते हैं कि यह जंगल देवता चिखड़ेश्वर महाराज देवठी जनोग को समर्पित है और इसकी रखवाली का जिम्मा देवता ने गांव वालों को सौंप रखा है। जंगल के बीच में एक प्राकृतिक तालाब है, जहां घास चरने के बाद पशु पानी पीते हैं। कच्ची सड़क से सटे होने के बावजूद इस जंगल में आज तक कभी अवैध कटान नहीं हुआ। वन विभाग ठियोग के वन मंडल अधिकारी मनीष रामपाल का कहना है कि देव वन परंपरा जंगलों के सरंक्षण मेें बहुमूल्य योगदान दे रही है। इन जंगलों में लोगों की आवाजाही बहुत कम होती है। इसलिए जैव विविधता के लिए यह परंपरा बेहद महत्वपूर्ण हैं।
हिमाचल प्रदेश में आस्था और प्रकृति संरक्षण के प्रतीक 468 देव वन हैं। लोग स्वेच्छा से इन वनों की रक्षा करते आ रहे हैं। देव वनों की सबसे अधिक संख्या शिमला जिले में है, जहां 130 देव वन मौजूद हैं। इसके बाद कुल्लू जिले में 109 देव वन हैं। इन वनों में न तो अवैध कटान होता है और न ही वन्य जीवों का शिकार। यही कारण है कि ये वन जैव विविधता के सुरक्षित ठिकाने बने हुए हैं। पर्यावरणविद् डॉ. आरती गुप्ता का कहना है कि देव वन पारंपरिक संरक्षण का बेहतरीन उदाहरण हैं, जहां बिना किसी सरकारी निगरानी के प्रकृति सुरक्षित है। देव वनों में कई दुर्लभ औषधीय पौधे और वन्य प्रजातियां पाई जाती हैं, जो अन्य क्षेत्रों में अब नहीं दिखतीं।
| शिमला | 130 |
| कुल्लू | 109 |
| सोलन | 38 |
| चंबा | 25 |
| हमीरपुर | 19 |
| किन्नौर | 16 |
| मंडी | 45 |
| ऊना | 14 |
| लाहौल | 7 |
| बिलासपुर | 17 |
| कांगड़ा | 19 |
| कुल | 468 |