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हिमाचल: बच्चों को मोहरा बना डीएनए टेस्ट की अनुमति नहीं दे सकते, हाईकोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

Sat, 23 May 2026 09:11 AM IST
Krishan Singh भारती मेहता, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
भारती मेहता, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Sat, 23 May 2026 09:11 AM IST
सार

अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को जबरन डीएनए टेस्ट के लिए मजबूर करना उसकी निजता, गरिमा और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

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Himachal High Court States—DNA Tests Cannot Be Weaponized to Jeopardize Children Futures
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पारिवारिक विवादों में डीएनए टेस्ट को लेकर महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को जबरन डीएनए टेस्ट के लिए मजबूर करना उसकी निजता, गरिमा और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बच्चों को मोहरा बनाकर या किसी महिला पर अवैध संबंध का आरोप साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने यह सख्त टिप्पणी चंबा जिले के एक याचिकाकर्ता की उस अर्जी को खारिज करते हुए की, जिसमें उसने अपनी कथित पत्नी और तीन बच्चों के पितृत्व को चुनौती देते हुए उनका डीएनए टेस्ट कराने की मांग की थी। न्यायाधीश रोमेश वर्मा की अदालत ने याचिका को पूरी तरह से निराधार और तथ्यों को छुपाने वाली मानते हुए इसे जुर्माने के साथ खारिज कर दिया।

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बच्चे का इस्तेमाल एक मोहरे के रूप में नहीं किया जा सकता

अदालत ने कहा कि बच्चों का इस्तेमाल मां के चरित्र पर उंगली उठाने या उसे गलत साबित करने के लिए एक मोहरे के रूप में नहीं किया जा सकता। पति चाहे तो अन्य गवाहों और सबूतों से अपनी बात रखे, लेकिन इसके लिए बच्चे की पहचान और उसकी सामाजिक गरिमा की बलि नहीं दी जा सकती। मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) चंबा ने साल 2010 में ही प्रतिवादी महिला को याचिकाकर्ता की कानूनी रूप से पत्नी और बच्चों को उसकी संतान माना था। तब से पति लगातार उन्हें गुजारा भत्ता दे रहा है। अदालत ने अपने निष्कर्ष में पाया कि अब अंतिम बहस के समय डीएनए टेस्ट की यह नई अर्जी सिर्फ भरण-पोषण की राशि देने से बचने और अदालती आदेशों को दरकिनार करने के लिए दायर की गई है।

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डीएनए टेस्ट के लिए पहले भी अर्जी लगा चुका था

वह इससे पहले भी धारा 125 सीआरपीसी की कार्यवाही के दौरान डीएनए टेस्ट के लिए अर्जी लगा चुका था, जिसे चंबा की निचली अदालत और एडिशनल सेशंस जज ने खारिज कर दिया था। इसके बाद उसने हाईकोर्ट में दायर अपनी चुनौती भी वापस ले ली थी। इस नए दीवानी मुकदमे में उसने अपनी पुरानी अर्जियों के खारिज होने की बात पूरी तरह छुपाई, जो कानूनन गलत है। पति का दावा था कि साल 2007 से पत्नी अपने मायके में रह रही थी, इसलिए बच्चे उसके नही हैं। वहीं, पत्नी का कहना था कि मायके में रहने के बावजूद उसका पति अकसर उससे मिलने आता था। अदालत ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत जब तक पति सबूतों से यह साबित नहीं कर देता कि दोनों के बीच शारीरिक संबंध बनने की कोई संभावना ही नहीं थी, तब तक बच्चों की वैधता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। कोर्ट ने कानून का हवाला देते हुए याद दिलाया कि अगर एक पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह समाज में साथ रहे हैं, तो कानूनन उनकी शादी को वैध माना जाता है। 

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बद्दी सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट के 500 मीटर के दायरे में प्रदर्शन पर रोक

 प्रदेश हाईकोर्ट ने जिला सोलन के बद्दी में स्थित सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट के सुचारु संचालन को लेकर अंतरिम आदेश जारी किया है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि स्थानीय लोगों को लोकतांत्रिक तरीके से विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन वे प्लांट के मुख्य गेट से 500 मीटर की दूरी के बाहर ही ऐसा कर सकेंगे, जिससे प्लांट के कामकाज में कोई बाधा न आए। शिवालिक सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट लिमिटेड की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते अदालत ने यह निर्देश दिए। अदालत ने मामले की गंभीरता और तनाव को देखते हुए पुलिस अधीक्षक बद्दी को मौके पर कानून-व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने के आदेश दिए हैं। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि कंपनी द्वारा सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट के संचालन में कोई रुकावट या बाधा न आए।

अदालत ने कर्मचारियों, श्रमिकों और वाहनों के लिए प्लांट में आने-जाने का सुरक्षित रास्ता सुनिश्चित करने के भी निर्देश दिए हैं। सुनवाई के दौरान सरकार ने दलील दी कि इस मामले में स्थानीय जनता की चिंताएं और पर्यावरण से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। इसलिए अंतिम फैसले के लिए हिमाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का फीडबैक बेहद जरूरी है। इसके बाद अदालत ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को मामले में प्रतिवादी के रूप में शामिल करने का आदेश दिया। खंडपीठ ने प्रशासन और संबंधित पक्षों को निर्देश दिया है कि वे स्थानीय लोगों और याचिकाकर्ता कंपनी दोनों की शिकायतों का निवारण करें। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्लांट बिना किसी नुकसान या परेशानी के सही तरीके से काम कर सके। अदालत ने सभी पक्षों को एक सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 1 जून को होगी।

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