डीएनए टेस्ट पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्यवस्था देते हुए कहा कि डीएनए टेस्ट पैतृत्व जाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इससे किसी की व्यक्तिगत छवि को कोई हानि नहीं होती।
न्यायाधीश धर्म चंद चौधरी ने डीएनए टेस्ट करवाए जाने के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई के बाद यह व्यवस्था दी। प्रार्थी ने हाईकोर्ट में जिला न्यायाधीश शिमला के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिसमें जिला न्यायाधीश शिमला ने प्रार्थी को डीएनए टेस्ट के लिए ब्लड सैंपल देने के आदेश दिए थे।
प्रार्थी ने हाईकोर्ट में दलील दी थी की डीएनए टेस्ट एक संवेदनशील मुद्दा है और किसी भी व्यक्ति को ब्लड सैंपल देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे उसकी निजता के अधिकार का हनन होता है। हाईकोर्ट ने जिला न्यायाधीश शिमला के फैसले को सही मानते हुए प्रार्थी की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया।
संसदीय सचिवों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई टली
प्रदेश हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से संसदीय सचिवों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई 28 दिसंबर के लिए टल गई है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया था और याचिका का जवाब देने के लिए वीरवार तक का समय दिया था।
सरकार की ओर से जवाब देने के लिए अतिरिक्त समय मांगा गया, जिसे स्वीकारते हुए मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर व न्यायाधीश संदीप शर्मा की खंडपीठ ने मामले को 28 दिसंबर को सुनने के आदेश दिए। यह याचिका पीपल फॉर रेसपांसिबल गवर्नेंस नामक संस्था की ओर से दायर की गई है।
कोर्ट ने पिछली सुनवाई के दौरान प्रार्थी संस्था को याचिका की मेंटेनबिलटी को साबित करने को भी कहा था। संस्था ने याचिका में यह आरोप लगाया है कि मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति कानून के प्रावधानों के विपरीत है। यह लोग मंत्रियों के बराबर वेतन व अन्य सुविधाएं ले रहे हैं जो प्रदेश उच्च न्यायालय के पहले ही एक मामले में जारी किए गए निर्णय के विपरीत है।
यही नहीं, संसदीय सचिवों की नियुक्ति को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट भी गैरकानूनी ठहरा चुका है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 में किए गए संशोधन के मुताबिक किसी भी प्रदेश में मंत्रियों की संख्या विधायकों की कुल संख्या की 15 फीसदी से अधिक नहीं हो सकती। प्रदेश में मुख्य संसदीय सचिवों को नियुक्ति देने के पश्चात मंत्रियों की संख्या में 15 फीसदी से अधिक हो गई है। इस कारण मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति को रद्द किया जाना चाहिए।
गौरतलब है कि 22 जनवरी 2013 को नीरज भारती, राजेश धर्माणी व विनय कुमार, 13 मई 2013 को जगजीवन पाल, राकेश कालिया, नंद लाल, रोहित ठाकुर, सोहन लाल ठाकुर व इंद्र दत्त लखनपाल और 22 अक्तूबर को मनसा राम को सीपीएस नियुक्त किया गया था। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि इनकी नियुक्ति से राज्य के राजस्व पर अतिरिक्त भार पड़ा है।
प्रार्थी संस्था का कहना है कि मुख्य संसदीय सचिवों को मंत्री के बराबर ही अन्य भत्ते जैसे टीए डीए, मेडिकल सुविधा दी जाती है। इन्हें मंत्रियों के बराबर ही शक्तियां प्रदान की गई हैं व किसी भी तरह की सरकारी फाइल को देखने की शक्ति भी रखते हैं। वास्तव
में राजनैतिक संतुलन को बनाने की दृष्टि से ही इनकी नियुक्तियां की गई हैं। संस्था ने दलील दी है कि 18 अगस्त 2005 को प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश वीके गुप्ता व न्यायाधीश दीपक गुप्ता की खंडपीठ ने मुख्य संसदीय सचिवों व संसदीय सचिवों की नियुक्ति को संविधान के प्रावधानों के विपरीत पाते हुए रद्द कर दिया था।