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Himachal: हाईकोर्ट ने दुष्कर्म मामले में आरोपी की जमानत रद्द करने से किया इन्कार, जानें कोर्ट के बड़े फैसले

Fri, 10 Apr 2026 05:00 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Fri, 10 Apr 2026 05:00 AM IST
सार

विरेंद्र सिंह की अदालत ने पाया कि एक ओर पीड़िता आरोपी की जमानत रद्द कराना चाहती है, दूसरी तरफ उसने आरोपी से अपने और अपने बच्चे के लिए खर्च और रखरखाव की मांग की अर्जी दायर की, जो विरोधाभासी है। 

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Himachal High Court Refuses to Cancel Bail of Accused in dushkarm Case
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के मामले के आरोपी की जमानत रद्द करने से इन्कार कर दिया है। विरेंद्र सिंह की अदालत ने पाया कि एक ओर पीड़िता आरोपी की जमानत रद्द कराना चाहती है, दूसरी तरफ उसने आरोपी से अपने और अपने बच्चे के लिए खर्च और रखरखाव की मांग की अर्जी दायर की, जो विरोधाभासी है। अदालत ने इसे जटिल मानवीय संबंधों का एक उत्कृष्ट मामला करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत रद्द करने के लिए बेहद ठोस और असाधारण परिस्थितियों की आवश्यकता होती है, जो इस मामले में नजर नहीं आती।

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शर्तों के उल्लंघन का कोई ठोस सबूत नहीं मिला
अदालत ने पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट और दोनों पक्षों की दलीलों पर गौर करने के बाद पाया कि पुलिस ने पीड़िता की शिकायत पर जांच की थी, लेकिन आरोपी के खिलाफ शर्तों के उल्लंघन का कोई ठोस सबूत नहीं मिला। अदालत ने यह भी नोट किया कि पीड़िता ने अपने वकील के माध्यम से आरोपी के नियोक्ता को शिकायत भेजकर उसकी नौकरी खत्म करने की कोशिश की थी।पीड़िता (आवेदक) ने आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 64 और 351(2) के तहत सोलन पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज कराई थी।

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पीड़िता ने लगाया था ये आरोप
पीड़िता का आरोप था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए, जिससे उसने एक बच्चे को जन्म दिया। इस मामले में हाईकोर्ट ने 20 मई 2025 को आरोपी को नियमित जमानत दे दी थी। पीड़िता ने जमानत रद्द करने के लिए आवेदन दायर किया, जिसमें बताया गया है कि आरोपी उसे और उसके परिवार को सीधे और परोक्ष रूप से धमका रहा है। आरोपी के रिश्तेदार पीड़िता पर मामले में समझौता करने का दबाव बना रहे हैं।आरोपी ने उसे इंस्टाग्राम पर रिक्वेस्ट भेजकर संपर्क करने की कोशिश की, जो जमानत की शर्तों का उल्लंघन है।

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याचिका खारिज, नगर पंचायत बड़सर का गठन रहेगा बरकरार
प्रदेश हाईकोर्ट ने हमीरपुर जिले में नगर पंचायत बरसर के गठन और उसमें ग्राम पंचायत बनी के क्षेत्रों को शामिल करने के सरकार के निर्णय को सही ठहराया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि क्षेत्र के बेहतर विकास और सुव्यवस्थित प्रबंधन के लिए सरकार का यह कदम सांविधानिक रूप से वैध है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने 25 फरवरी 2026 की अंतिम अधिसूचना को कोर्ट ने सही माना और ग्रामीणों की याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि उनके क्षेत्र के लोग मुख्य रूप से कृषि और पशुपालन पर निर्भर हैं और गरीब हैं। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243 क्यू (2) के तहत किसी क्षेत्र को नगर निकाय घोषित करने के लिए जनसंख्या, राजस्व और आर्थिक महत्व जैसे कई कारकों को देखा जाता है। रिकॉर्ड के अनुसार बरसर क्षेत्र में तहसील कार्यालय, अस्पताल, कॉलेज, 6 बैंक और पुलिस स्टेशन जैसी महत्वपूर्ण सुविधाएं पहले से मौजूद हैं। बाबा बालकनाथ मंदिर के समीप होने के कारण यहां पर्यटकों और श्रद्धालुओं का भारी आवागमन रहता है। नगर पंचायत बनने से क्षेत्र में बेहतर ड्रेनेज, सड़क और लाइट की व्यवस्था हो सकेगी।

ऊना बॉटलिंग प्लांट के लाइसेंस नवीकरण मामले में सरकार की याचिका खारिज
 प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से दायर उस पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें मार्स बॉटलर्स ऊना के लाइसेंस नवीनीकरण और जुर्माने से संबंधित पिछले आदेश को चुनौती दी गई थी। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने कहा कि ऊना 1966 से पहले पंजाब का हिस्सा था। पंजाब पुनर्गठन अधिनियम की धारा 88 और 89 के तहत जब तक किसी कानून को स्पष्ट रूप से संशोधित न किया जाए, पुराने नियम लागू रहते हैं। राज्य सरकार का तर्क था कि 1994 के नए नियमों के तहत लाइसेंस नवीनीकरण के लिए 90 दिन पहले आवेदन न करने पर लाइसेंस स्वतः रद्द हो जाता है। हालांकि, सरकार यह साबित करने में विफल रही कि 1994 का संशोधन विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए भी था, जो 1966 में हिमाचल में शामिल हुए थे। इसलिए पंजाब डिस्टिलरी रूल्स, 1932 (1963 संशोधन सहित) यहां प्रभावी रहेंगे, जो देरी से आवेदन करने पर भी नवीनीकरण की अनुमति देते हैं।

बॉटलर्स को 15 दिनों के भीतर नवीनीकरण के लिए आवेदन करने की छूट
अदालत ने बॉटलर्स को 15 दिनों के भीतर नवीनीकरण के लिए आवेदन करने की छूट दी है। राज्य कर एवं आबकारी आयुक्त को निर्देश दिया गया है कि वे उचित कंपाउंडिंग फीस निर्धारित करें और लाइसेंस नवीनीकरण पर सकारात्मक आदेश पारित करें। अदालत ने शराब की बरामदगी पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रशासन की कार्रवाई न केवल असंगत थी, बल्कि तथ्यों के आधार पर संदिग्ध भी थी। राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि ट्रक से भारी मात्रा में अवैध शराब बरामद हुई थी, जो कंपाउंडेबल नहीं है। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि छापेमारी दल की रिपोर्ट और 10 दिन बाद दर्ज हुई एफआईआर के बयानों में भारी विरोधाभास है। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भौतिक साक्ष्य नहीं है, जो यह साबित करे कि शराब वास्तव में उसी प्लांट की थी। कोर्ट ने बरामदगी की कहानी को अत्यधिक संदिग्ध और अविश्वसनीय करार दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा लगाया गया दंड अत्यधिक और असंगत था। अदालत ने पिछले आदेश के पैरा 36 को तकनीकी कारणों से हटा दिया गया है, लेकिन इससे मुख्य निर्णय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

सर्पदंश से छूटे 8 कार्य दिवस होंगे माफ, 2006 से रेगुलर करने के आदेश
प्रदेश हाईकोर्ट ने एक दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी किसी ऐसी अनहोनी घटना (जैसे सांप का काटना) के कारण 240 दिनों के कार्य दिवस पूरे नहीं कर पाता, तो विभाग को उसे तकनीकी आधार पर लाभ से वंचित नहीं करना चाहिए। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की एकल पीठ ने बहादुर सिंह मामले में यह आदेश पारित किया है। कोर्ट ने कहा कि पॉलिसी लागू करना विभाग की जिम्मेदारी है। सुनवाई के दौरान विभाग के रवैये पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि चतुर्थ श्रेणी के अधिकांश कर्मचारी ग्रामीण और कम पढ़े-लिखे होते हैं। एक बार जब सरकार नियमितीकरण की नीति लागू करती है, तो यह दैनिक वेतन भोगी की जिम्मेदारी नहीं है कि वह अपने हक के लिए सरकार या अदालतों के चक्कर काटे। यह विभाग का उत्तरदायित्व है कि वह पात्र पाए जाने वाले सभी कर्मचारियों को लाभ प्रदान करे।

हाईकोर्ट ने विभाग को आदेश दिया कि 2003 में सांप के काटने के कारण हुई 8 दिनों की कमी को माफ किया जाए और बहादुर सिंह की नियुक्ति 1 जुलाई 1995 से मानते हुए उन्हें 9 जून 2006 की नियमितीकरण नीति के तहत 8 वर्ष की सेवा पूरी होने पर लाभ प्रदान किया जाए। याचिकाकर्ता को मिलने वाले लाभ ट्रिब्यूनल में याचिका दायर करने की तिथि से 3 वर्ष पहले तक नोशनल होंगे और उसके बाद वास्तविक वित्तीय लाभ दिए जाएंगे। अदालत ने विभाग को इस पूरी प्रक्रिया को तीन महीने के भीतर पूरा करने का आदेश दिया है। याचिकाकर्ता को वर्ष 1995 में वन विभाग में दैनिक वेतन भोगी बेलदार के रूप में नियुक्त किया गया था। रिकॉर्ड के अनुसार, उन्हें 1995 से 2002 तक लगातार हर साल अनिवार्य 240 दिन पूरे किए। हालांकि वर्ष 2003 में सांप के काटने के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, जिससे उस वर्ष उनके केवल 232 कार्य दिवस हो पाए यानी निर्धारित लक्ष्य से मात्र 8 दिन कम। इसी 8 दिन की कमी को आधार बनाकर विभाग ने उनकी वरिष्ठता रोक दी और उनकी सेवाओं को वर्ष 2006 के बजाय सीधे 2017 में नियमित किया।

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