इस रोप-वे को मंत्रिमंडल ने दी मंजूरी, पूर्व सरकार ने कर दिया था खारिज
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देश-विदेश के लाखों पर्यटकों की सुविधा आनंदपुर-नयनादेवी रज्जू मार्ग के समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर करने के मामले पर बुधवार को मंत्रिमंडल की मुहर लगा दी है। इस रज्जु मार्ग बनने से इसके बाद दोनों राज्यों के पर्यटन निदेशक राज्य सरकार की ओर से हस्ताक्षर करेंगे।
सरकार ने इस प्रोजेक्ट पर विधि विभाग से कानूनी राय पहले ही ले ली है ताकि भविष्य में कोई अड़चन न हो। अभी तक रोप वे स्थापित करने लिए भूमि का चयन तक नहीं किया गया है। पूर्व वीरभद्र सरकार ने इस रज्जु मार्ग के प्रोजेक्ट को खारिज कर दिया था। पूर्व धूमल सरकार के सत्ता पर रहते भी रज्जू मार्ग बनाने पर सहमति जताई थी। कई साल बीतने के बाद भी यह प्रोजेक्ट सिरे नहीं लगा था। यहां पहले आनंदपुर साहिब- नयनादेवी रज्जु मार्ग बनाया जाना था। कांग्रेस सरकार ने इस प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया था।
इन शर्तों पर किया जाना है एमओयू में
पंजाब और हिमाचल प्रदेश की जितनी जमीन जाएगी, उसे आनंदपुर साहिब- नयनादेवी प्रोजेक्ट लाभांश में हिस्सा मिलेगा। जिस प्रदेश में ज्यादा जमीन का अधिग्रहण होगा, उससे मुआवजा भी ज्यादा देने पड़ेगा। जबकि पंजाब सरकार चाहती है कि इसमें दोनों राज्यों का लाभांश 50:50 का रखा जाए। जबकि हिमाचल प्रदेश की 70 फीसदी और पंजाब की 30 फीसदी जमीन जानी है।
वर्ष 2012 में हुआ था पहले एमओयू पर हस्ताक्षर
प्रसिद्ध धार्मिक स्थल आनंदपुर साहिब से नैना देवी तक रज्जू मार्ग निर्माण की प्रस्तावना दोनों राज्यों के बीच समय-समय पर विचाराधीन रही है। इस संबंध में दोनों राज्यों के बीच दिनांक 26 जुलाई, 2012 को समझौता ज्ञापन भी हस्ताक्षरित किया था।
इस समझौता ज्ञापन को 2013 में रद्द कर दिया था। निर्णय लिया कि टोबा से नैना देवी के मध्य रज्जू मार्ग का निर्माण किया जाए। टोबा से नैना देवी के मध्य रज्जू मार्ग निर्माण कोई भी निविदा प्राप्त नहीं हुई थी।
रज्जु मार्ग प्रोजेक्ट का पंजीकृत कार्यालय शिमला में होगा
दोनों सरकारों की समान भागीदारी होगी। दोनों राज्य सरकार 50-50 लाख देंगी। इस निदेशक मंडल में 10 निदेशक होंगे। दोनाें राज्य सरकारें 5-5 निदेशक मनोनीत करेंगी। इस परियोजना के पर्यवेक्षण, निगरानी और प्रचालन हेतु दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों की अध्यक्षता में एक शीर्ष समिति का गठन किया जाएगा।
जोकि सर्वसम्मति से निर्णय लेगी। इस समिति में दोनों सरकारों के मुख्य सचिव के अलावा कई अफसरों को शामिल किया गया है। इस परियोजना की रियायत अवधि 40 साल की होगी, जिसमें निर्माण के तीन वर्ष शामिल नहीं है।