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हिमाचल: हाईकोर्ट ने कहा- असली भू-मालिक के खिलाफ निषेधाज्ञा दायर नहीं कर सकते अतिक्रमणकारी

Thu, 01 May 2025 11:05 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Thu, 01 May 2025 11:05 AM IST
सार

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राकेश कैंथला की पीठ ने इस आधार पर पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता की ओर से पुनर्विचार याचिका दायर की गई। 

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Himachal: Encroachers cannot file injunction against real landowner
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि अतिक्रमणकारी भूमि के असली मालिक के खिलाफ निषेधाज्ञा दायर नहीं कर सकते। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राकेश कैंथला की पीठ ने इस आधार पर पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता की ओर से पुनर्विचार याचिका दायर की गई।  हाईकोर्ट ने पाया कि पुनर्विचार याचिका में याचिकाकर्ताओं की ओर से ली गई दलील सही नहीं है कि प्रथम अपीलीय न्यायालय की ओर से कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया। प्रथम अपीलीय न्यायालय की ओर से निर्णय के अवलोकन पर पाया गया कि याचिकाकर्ता को मामला पेश करने का उचित अवसर दिया गया और सभी निष्कर्ष गुण-दोष के आधार पर दर्ज किए गए। याचिकाकर्ता के अनुसार न्यायालय ने दलीलों को गलत पढ़ा था और रिकॉर्ड पर त्रुटि स्पष्ट थी।

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याचिकाकर्ता ने अपनी स्वामित्व वाली भूमि की घोषणा की डिक्री प्राप्त करने के लिए ट्रायल कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। तर्क था कि अधिकारियों ने गलत तरीके से भूमि से बेदखल कर दिया था और प्रतिवादी के खिलाफ मांग की थी कि उनको भूमि से बेदखल करने से स्थायी निदेशात्मक निषेधाज्ञा की जाए। पुनर्विचार याचिका में बताया गया है कि उसने 1973-74 में यह भूमि खरीदी थी। इस पर उसने एक घर बनाया था। कार्रवाई के दौरान व्यक्ति ने बंदोबस्त अधिकारी शिमला के समक्ष इस आधार पर आवेदन दायर किया कि उसके घर तक जाने वाला मार्ग याचिकाकर्ता की ओर से बंद कर दिया गया।

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बंदोबस्त अधिकारी ने राजस्व रिकॉर्ड में सुधार के साथ भूमि पर अतिक्रमण के संबंध में याचिकाकर्ता के खिलाफ आदेश पारित किया था। याचिकाकर्ता ने बंदोबस्त अधिकारी के आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए ट्रायल कोर्ट में वाद दायर किया। हालांकि, सिविल कोर्ट ने बंदोबस्त अधिकारी के आदेश को बरकरार रखा। याचिकाकर्ता ने प्रथम अपीलीय न्यायालय में अपील दायर की गई। अपीलीय न्यायालय ने सुनवाई नहीं की। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि कब्जे की बहाली और निषेधाज्ञा मांगने के बीच अंतर है। 

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