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हिमाचल में परिवारवाद पर कांग्रेस ने मारी पलटी, रीति नीति दरकिनार

Mon, 23 Oct 2017 02:14 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला Updated Mon, 23 Oct 2017 02:14 PM IST
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himachal assembly election 2017 Congress High Command ticket to kins of ministers

हिमाचल में सत्ता वापसी के लिए कांग्रेस हाईकमान ने प्रत्याशी चयन में परिवारवाद को बाहर रखने का निर्धारित फार्मेट दरकिनार कर दिया। उत्तराखंड और पंजाब के चुनावों की तर्ज में प्रदेश में नेता पुत्र-पुत्रियों को टिकट नहीं देने के स्पष्ट निर्देश रविवार को पलट दिए। दोनों पड़ोसी राज्यों में परिवारवाद के मुद्दे पर हाईकमान झुकने को तैयार नहीं हुई, लेकिन हिमाचल में वीरभद्र सिंह के दबाव में वंशवाद को गले लगाना पड़ा।

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वीरभद्र अपने बेटे विक्रमादित्य के साथ कैबिनेट सहयोगी कौल सिंह की बेटी चंपा को टिकट दिलाने में कामयाब रहे। नौ सीटों पर तीन दिन चले गहन मंथन के बाद हाईकमान ने टिकट की दौड़ में दिख रहे हर नेता पुत्र-पुत्री को हरी झंडी दे दी। अब वंशवाद पर पार्टी की बदली रणनीति भाजपा को नया चुनावी मुद्दा थमाती दिख रही है। 
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कांग्रेस ने जनवरी से मार्च के बीच उत्तराखंड-पंजाब सहित पांच राज्यों के चुनावों में वंशवाद पर सख्त गाइडलाइन बनाई थी। किसी भी नेता के पुत्र-पुत्री को टिकट नहीं दिया गया। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने बेटे और बेटी की पैरवी करते रहे, लेकिन पार्टी ने उन्हें दो विधानसभाओं से लड़ने की अनुमति दी।

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रघुवीर सिंह बाली का नाम सूची से बाहर

himachal assembly election 2017 Congress High Command ticket to kins of ministers

वरिष्ठ मंत्री यशपाल आर्य ने बेटे संजीव आर्य को टिकट नहीं मिलने के आश्वासन पर आखिरी समय में भाजपा से समझौता कर लिया। यही स्थिति पंजाब चुनाव में रही। पार्टी के मुख्यमंत्री प्रत्याशी अमरिंदर सिंह के परिवार से किसी को टिकट देने के बजाय उन्हें दो क्षेत्रों से चुनाव में उतारा। पंजाब और उत्तराखंड के अलावा उत्तरप्रदेश में भी वंशवाद पर सख्ती से पालन हुआ।

हिमाचल में चुनाव कार्यक्रम जारी होने से पहले प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने नेता पुत्र-पुत्रियों को टिकट नहीं देने की गाइडलाइन सख्ती से प्रभावी होने के दावे जताए। पार्टी का एक धड़ा लगातार वीरभद्र सहित अन्य नेता पुत्र-पुत्रियों के टिकट का विरोध करते रहे। वहीं कुछ इस आस में थे कि अगर वीरभद्र के बेटे विक्रमादित्य को टिकट मिला तो उनके बेटों की सियासी पारी भी इस बार शुरू होगी।

पार्टी की 18 अक्तूबर को आई पहली सूची में किसी नेता के परिवार के सदस्य को टिकट नहीं मिला। कांग्रेस ने 9 ऐसे विधानसभा क्षेत्रों में प्रत्याशी घोषित नहीं किए जिनमें सीएम वीरभद्र, मंत्री कौल सिंह, विधानसभा अध्यक्ष बीबीएल बुटेल और पूर्व डिप्टी स्पीकर रामनाथ अपने बेटे या बेटी के लिए टिकट मांग रहे थे। हालांकि मंत्री जीएस बाली के बेटे रघुवीर सिंह बाली का नाम सूची से बाहर कर दिया गया।

आखिरी समय में झुका हाईकमान

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नामांकन से एक दिन पहले पार्टी एक बार फिर वीरभद्र के दबाव में दिखी। देर शाम पार्टी ने सबसे आखिर में विक्रमादित्य और चंपा का टिकट फाइनल किया। पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार आखिरी समय तक वीरभद्र विरोधी खेमा दोनों टिकट रोकने का दबाव बनाता रहा।

हालांकि बुटेल के नहीं लड़ने पर उनके बेटे आशीष को टिकट देने के पक्ष में हाईकमान दिखा। यही आधार रामनाथ के बेटे विवेक शर्मा के लिए बना। वीरभद्र और कौल सिंह के लिए लंबे समय तक एक खेमा अड़ा रहा, लेकिन मुख्यमंत्री की नाराजगी मोल लेने से हाईकमान बचता दिखा।

भाजपा के हाथ थमाया मुद्दा
राहुल गांधी को वंशवाद पर घेरने वाली भाजपा के हाथ एक बार फिर कांग्रेस ने मुद्दा थमा दिया है। कांग्रेस का एक धड़ा लगातार हाईकमान से नेता पुत्र पुत्रियों को टिकटों का विरोध करता रहा, लेकिन उसकी नहीं चली।

उधर, भाजपा की प्रत्याशी सूची में किसी नेता के पुत्र या पुत्री को टिकट नहीं दिया गया है। ऐसे में अब कांग्रेस के वंशवाद पर मुहर लगाने से भाजपा परिवारवाद की सियासत को हवा देगी।

सीएम को इस मुद्दे पर घेरने की भाजपा रणनीति बना रही है। शिमला ग्रामीण में भाजपा परिवारवाद के कार्ड को खूब हवा दे सकती है। मंडी सदर में चंपा के खिलाफ भी भाजपा प्रत्याशी अनिल शर्मा इस मुद्दे को उठा सकते हैं।

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