हिमाचल: सीपीएस नियुक्ति पर हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर किया तलब जवाब
सरकार के छह मुख्य संसदीय सचिवों (सीपीएस) की नियुक्ति को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव (सीएस) सहित प्रधान सचिव वित्त को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
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हिमाचल प्रदेश सरकार के छह मुख्य संसदीय सचिवों (सीपीएस) की नियुक्ति को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव (सीएस) सहित प्रधान सचिव वित्त को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सबीना और न्यायाधीश सत्येन वैद्य की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किए। मंडी निवासी कल्पना देवी ने मुख्यमंत्री समेत अर्की विधानसभा क्षेत्र से सीपीएस संजय अवस्थी, कुल्लू से सुंदर सिंह, दून से राम कुमार, रोहड़ू से मोहन लाल ब्राक्टा, पालमपुर से आशीष बुटेल और बैजनाथ से किशोरी लाल को प्रतिवादी बनाया है। आरोप है कि ये नियुक्तियां असांविधानिक हैं। दलील दी गई है कि संविधान के अनुसार सीएम भी इनकी नियुक्ति नहीं कर सकता। इन नियुक्तियों से राजकोष पर सालाना 10 करोड़ से ज्यादा का बोझ पड़ेगा।
याचिका के माध्यम से बताया गया कि पंजाब में भी ऐसी नियुक्तियां की गई थीं, जिन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने इन नियुक्तियों को असांविधानिक ठहराया था। अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद पाया कि इस तरह की याचिका पहले से ही लंबित है। अदालत ने कल्पना देवी की याचिका की सुनवाई भी पीपल फॉर रिस्पांसिबल गवर्नेंस संस्था की याचिका के साथ सुनने के आदेश दिए हैं। संस्था ने सीपीएस को प्रतिवादी बनाने के लिए आवेदन किया है। कोर्ट ने 21 अप्रैल को सरकार से जवाब तलब किया है। अब दानों मामलों पर एक साथ सुनवाई होगी।
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संस्था ने 2016 में दी थी चुनौती
बता दें कि संस्था ने वर्ष 2016 में हिमाचल संसदीय सचिव (नियुक्ति, वेतन, भत्ते, शक्तियां, विशेषाधिकार और सुविधाएं) अधिनियम, 2006 को चुनौती दी थी। अभी तक हाईकोर्ट में यह मामला लंबित है। उस समय याचिकाकर्ता ने तात्कालिक नौ सीपीएस प्रतिवादी बनाए थे। अब आवेदन के माध्यम से अदालत को बताया गया है कि पुरानी सरकार बदल चुकी है और मामले का निपटारा करने के लिए नए सीपीएस को प्रतिवादी बनाना आवश्यक है। आवेदन में आरोप लगाया है कि सरकार को पता है कि सुप्रीम कोर्ट ने असम और मणिपुर में संसदीय सचिव की नियुक्ति के लिए बनाए अधिनियम को असांविधानिक ठहराया है। याची का आरोप है कि सभी सीपीएस लाभ के पदों पर तैनात हैं, जिन्हें प्रतिमाह 2,20,000 रुपये बतौर वेतन और भत्ते के रूप में दिया जाता है। याचिका में हिमाचल संसदीय सचिव अधिनियम, 2006 को निरस्त करने की गुहार लगाई गई है।
हाईकोर्ट 2005 में भी रद्द कर चुका है नियुक्तियां
वर्ष 2005 में हाईकोर्ट ने सीपीएस की नियुक्तियों को असांविधानिक बताते हुए रद्द किया था। उसके बाद हिमाचल सरकार ने संसदीय सचिव अधिनियम, 2006 बनाया। सुप्रीम कोर्ट ने बिमोलंग्शु राय बनाम असम सरकार के मामले में 26 जुलाई, 2017 को असम संसदीय सचिव अधिनियम 2004 को असांविधानिक ठहराया था। इस फैसले के बाद मणिपुर सरकार ने संसदीय सचिव (नियुक्ति, वेतन और भत्ते और विविध प्रावधान) अधिनियम, 2012 को वर्ष 2018 में संशोधित किया। वर्ष 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर सरकार बनाम सूरजा कुमार ओकराम के मामले में इस अधिनियम को भी असांविधानिक करार दिया।
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वाहन दुर्घटना में आश्रितों को 9.92 लाख रुपये का मुआवजा अदा करने के आदेश
वाहन दुर्घटना में मृतक के आश्रितों को 9.92 लाख रुपये का मुआवजा अदा करने के आदेश दिए हैं। भूपेश शर्मा वाहन दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण शिमला ने मुआवजे की राशि पर छह फीसदी ब्याज अदा करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजे की राशि वाहन मालिक और ड्राइवर से वसूली जाए। 7 नवंबर 2019 को नेरवा की अर्चना गाड़ी मेें चंडीगढ़ जा रही थी। पेरवी पुल के समीप यह गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई। इस दुर्घटना में अर्चना की मौत हो गई थी।
मृतक के आश्रितों ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण शिमला के समक्ष मुआवजे के लिए याचिका दायर की थी। दलील दी गई कि अर्चना की उम्र 34 वर्ष थी और वह सिलाई और कढ़ाई से 25 हजार प्रति महीना कमाती थी। यह भी दलील दी गई कि इस दुर्घटना का मुख्य कारण चालक की लापरवाही थी। मालिक की ओर से दलील दी गई कि गाड़ी का बीमा इंश्योरेंस कंपनी से करवाया गया था। मुआवजे की राशि इंश्योरेंस कंपनी को दिए जाने का आग्रह किया गया था। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद आश्रितों की ओर से मुआवजे के लिए दायर की गई याचिका को स्वीकार किया।