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Shimla News: जड़ी बूटियों से होने वाले उपचार को मिलेगा वैज्ञानिक आधार

Tue, 28 Jul 2026 11:59 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Tue, 28 Jul 2026 11:59 PM IST
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Herbal treatments will gain a scientific basis.
केंद्र ने एचपीयू की 25 लाख की शोध परियोजना को मंजूरी, जनजातीय उपचार पद्धतियों का होगा अध्ययन
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शोध के बाद बनेगा उपचार पद्धति का डाटासंवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमालय की पहाड़ियों में पीढ़ियों से चले आ रहे लोक उपचार और जड़ी-बूटियों के ज्ञान को अब वैज्ञानिक रूप से परखा जाएगा। इसके बाद इसका डाटा तैयार होगा।


केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय ने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) शिमला की 25 लाख की शोध परियोजना को मंजूरी दे दी है। इसके तहत राज्य के जनजातीय समुदायों की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली का दो वर्षों तक अध्ययन किया जाएगा। परियोजना के लिए 12.50 लाख की पहली किस्त जारी करने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। दो वर्ष तक चलने वाली यह परियोजना केवल औषधीय पौधों की जानकारी जुटाने तक सीमित नहीं रहेगी। शोध में यह भी पता लगाया जाएगा कि हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों ने आधुनिक अस्पतालों और डॉक्टरों की कमी के बीच सदियों तक अपने स्वास्थ्य की देखभाल कैसे की।
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शोधकर्ता यह जानने का प्रयास करेंगे कि कौन-कौन से पौधे किन बीमारियों में उपयोग किए जाते हैं और इन उपचारों का वैज्ञानिक आधार क्या हैं। परियोजना के तहत किन्नौर, लाहौल-स्पीति, भरमौर और पांगी के अलावा गद्दी तथा गुज्जर समुदायों की चिकित्सा परंपराओं का भी अध्ययन होगा। आमची, वैद्य, लोक जड़ी-बूटी विशेषज्ञ, पारंपरिक प्रसूति सहायिकाओं और अन्य स्थानीय उपचारकर्ताओं के अनुभव तथा ज्ञान का डाटा तैयार किया जाएगा। यह जानकारी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखी जाएगी।
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तेजी से बदलती जीवनशैली के कारण यह पारंपरिक ज्ञान धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। कई पुराने वैद्य और स्थानीय उपचारकर्ता अब नहीं रहे हैं उनके साथ वर्षों का अनुभव भी समाप्त हो रहा है। ऐसे में इस ज्ञान को समय रहते दर्ज करना जरूरी माना जा रहा है। एचपीयू के कुलपति प्रो. महावीर सिंह ने कहा कि इससे पौधों पर होने वाले शोधों में मदद मिलेगी।



औषधीय पौधों का होगा संरक्षण
शोध से तैयार होने वाला डाटा भविष्य में औषधीय पौधों पर नए शोध, जैव विविधता संरक्षण, पारंपरिक चिकित्सा के वैज्ञानिक परीक्षण और स्वास्थ्य नीति बनाने में मदद कर सकता है। यदि किसी उपचार पद्धति की वैज्ञानिक पुष्टि होती है तो उसका उपयोग भविष्य में आयुष और अन्य स्वास्थ्य प्रणालियों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है। परियोजना का नेतृत्व एचपीयू के पर्यावरण विज्ञान विभाग के डॉ. पंकज गुप्ता करेंगे।
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