हिमाचल के नौ डीसी ने गुरुकुल में देखे प्राकृतिक खेती के परिणाम
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हरियाणा के कुरुक्षेत्र का गुरुकुल फार्म प्राकृतिक खेती का सफल मॉडल बनकर उभरा है। हिमाचल के राज्यपाल आचार्य देवव्रत के न्योते पर प्रदेश के नौ जिला उपायुक्तों ने गुरुकुल फार्म का दौरा किया। सभी जीरो बजट खेती से लहलहाती फसलें देखकर हैरान हो गए। उपायुक्तों को जीरो बजट खेती की जानकारी दी गई। अब प्राकृतिक खेती को हिमाचल में बढ़ावा देने के प्रयास किए जाएंगे।
हिमाचल के अफसरों को इस फार्म का दौरा कराने के पीछे प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना था। पिछले दिनों शिमला में जीरो बजट खेती पर सेमीनार हुआ। इसमें देश से किसानों को बुलाया गया। शुक्रवार को राज्यपाल देवव्रत ने हिमाचल के सभी जिला उपायुक्तों को कुरुक्षेत्र फार्म में प्राकृतिक खेती के प्रयोग के नतीजों का जायजा लेने को आमंत्रित किया गया।
180 एकड़ के इस फार्म में पचास एकड़ भूमि को बंजर मानकर खाली छोड़ा गया था। बाद में प्राकृतिक खेती के नुस्खे अपनाए गए। कल तक बंजर खेत में अब धान, गन्ना, गेहूं, आलू, सब्जियां और अन्य नकदी फसलें ली जा रही हैं। हैरत की बात है कि प्राकृतिक तौर तरीकों से की गई खेती जीरो बजट की है लेकिन रासायनिक खाद के इस्तेमाली वाली खेती के मुकाबले यहां की पैदावार कहीं अधिक है।
क्या कहते हैं राज्यपाल आचार्य देवव्रत
राज्यपाल आचार्य देवव्रत कहना है कि गुरुकुल के फार्म में जीरो बजट खेती के प्रयोग सफल और परिणाम उत्साहजनक रहे हैं। हिमाचल में छोटी काश्त के खेत हैं। किसान-बागवान इसे आसानी से अपना सकते हैं। छोटे खेतों और बगीचों में देखभाल करना आसान है।
जिला उपायुक्तों ने खुद परिणाम देखे हैं। अब उन्हें जिला मुखिया होने के नाते किसानों को शून्य बजट खेती के लिए प्रेरित करना चाहिए। शून्य बजट खेती अपनाकर कि सान गन्ने की बिजाई ऐसे करें ताकि दो कतारों के बीच में तीन किस्म की सब्जियां उगा सकें।
ज्यादा गोबर-रासायनिक खाद की जरूरत नहीं
शून्य खेती अपनाने के लिए गोबर और रासायनिक खाद की जरूरत नहीं रहती। खेतों में डाला जाने वाला घोल तैयार करने के लिए दो सौ लीटर पानी में 8 से 10 किलो देसी गाय का गोबर, दो किलो गुड़ और दो किलो किसी भी दाल का बेसन ड्रम में डालकर घोल तैयार कर लें। इसे तीन दिन तक हर रोज क्लाक वाइज डंडे से घुमाएं। इसे खेतों में खाद के बदले इस्तेमाल कर सकते हैं।
छिड़काव के लिए घोल- फसलों में छिड़काव के लिए ज्यादा पुरानी लस्सी का घोल तैयार करें। इसमें नीम, धतुरा और मिर्च का घोल भी मिला दें। जरूरत के अनुसार छिड़काव करें और फसलों को कीटों से बचाएं। ऐसा करने से छिड़काव के लिए दवाओं के खर्च से बचा जा सकता है।