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गेयटी में ब्रिटिश सभ्यता पर होते थे प्ले, अब पहाड़ी नाटी की गूंज
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ब्रिटिश हुकूमत की याद दिलाता है शिमला का ऐतिहासिक गेयटी थियेटर
क्रॉसर
पंडित नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी देख चुके हैं यहां शो
दीपक मेहता
शिमला। ब्रिटिश शासन की कमान संभलाने वाली रानी विक्टोरिया भले ही शिमला न आई हो लेकिन उनकी याद में विक्टोरियन गौथिक शैली में निर्मित ऐतिहासिक गेयटी थियेटर आज भी मौजूद है।
आजादी के 75 साल बाद भी गेयटी थियेटर ब्रिटिश हुकूमत की याद दिलाता है। ब्रिटिश शासन से लेकर अभी तक गेयटी के ओल्ड थियेटर में पर्दे को रस्सी से खींचकर नाटकों (प्ले) का आगाज होता है। वर्ष 1864 में शिमला को अंग्रेजी साम्राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया था। इसके 23 साल बाद 1887 में क्वीन विक्टोरिया के साम्राज्य की स्वर्ण जयंती पर गेयटी थियेटर को निर्मित किया।
अंग्रेज सैनिक इस थियेटर में आकर नाटक देखते थे। 30 मई 1887 को नोबेल पुरस्कार विजेता रुडयार्ड किपलिंग ने गेयटी में ‘द टाइम, विल टेल’ नामक पहले नाटक मंचन किया था। उन्होंने ‘ए स्क्रैप ऑफ पेपर’ में अभिनय भी किया था। यहां मशालें जलाकर नाटकों का मंचन किया जाता था। गेयटी में 1895 में बिजली की रोशनी में पहली बार नाटक का मंचन किया गया। शिमला के चाबा में बिजली तैयार करके गेयटी तक पहुंचाई गई थी। अधिकतर अंग्रेजी सभ्यता पर आधारित नाटकों का ही मंचन होता था लेकिन अब गेयटी में देश भक्ति और पहाड़ी संस्कृति की प्रस्तुतियों की धूम रहती है। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान थियेटर में भारतीय नागरिकों के आने पर पाबंदी थी। वायएस राय के लिए एक विशेष सीट होती थी लेकिन अब गेयटी में स्कूली बच्चों से लेकर आम आदमी तक गेयटी में नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रम का लुत्फ उठाते हैं।
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पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी भी देखे थे नाटक
आजादी के तीन साल बाद तक गेयटी थियेटर बंद रहा। इसके बाद 1950 से 1970 के बीच की अवधि में गेयटी में कई नाटक हुए। यहां जेफ्री केंडल, रॉबर्ट बैडेन पॉवेल, पृथ्वीराज कपूर, मास्टर मैडम, बलराज साहनी, अनुपम खेप, मनोहर सहित कई फिल्म अभिनेता और निर्माता नाटकों का मंचन कर चुके हैं। 1950 में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित और बेटी इंदिरा गांधी ने ‘शी स्टूप्स कॉनक्योर’ नाटक गेयटी में देखा था।
3 लाख 23 हजार में बना था गेयटी
गेयटी थियेटर को 1884 में ब्रिटिश आर्किटैक्ट हैनरी इरबिन ने विक्टोरियन गौथिक शैली में बनाना शुरू किया था। इसके लिए 1 लाख रुपये का बजट रखा था लेकिन तीन साल बाद इसे 1887 में 3 लाख 23 हजार रुपये में बनाकर तैयार किया गया। वर्ष 2003 में साढ़े 10 करोड़ रुपये की लागत से इसका जीर्णोद्धार किया गया।
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पंडित नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी देख चुके हैं यहां शो
दीपक मेहता
शिमला। ब्रिटिश शासन की कमान संभलाने वाली रानी विक्टोरिया भले ही शिमला न आई हो लेकिन उनकी याद में विक्टोरियन गौथिक शैली में निर्मित ऐतिहासिक गेयटी थियेटर आज भी मौजूद है।
आजादी के 75 साल बाद भी गेयटी थियेटर ब्रिटिश हुकूमत की याद दिलाता है। ब्रिटिश शासन से लेकर अभी तक गेयटी के ओल्ड थियेटर में पर्दे को रस्सी से खींचकर नाटकों (प्ले) का आगाज होता है। वर्ष 1864 में शिमला को अंग्रेजी साम्राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया था। इसके 23 साल बाद 1887 में क्वीन विक्टोरिया के साम्राज्य की स्वर्ण जयंती पर गेयटी थियेटर को निर्मित किया।
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अंग्रेज सैनिक इस थियेटर में आकर नाटक देखते थे। 30 मई 1887 को नोबेल पुरस्कार विजेता रुडयार्ड किपलिंग ने गेयटी में ‘द टाइम, विल टेल’ नामक पहले नाटक मंचन किया था। उन्होंने ‘ए स्क्रैप ऑफ पेपर’ में अभिनय भी किया था। यहां मशालें जलाकर नाटकों का मंचन किया जाता था। गेयटी में 1895 में बिजली की रोशनी में पहली बार नाटक का मंचन किया गया। शिमला के चाबा में बिजली तैयार करके गेयटी तक पहुंचाई गई थी। अधिकतर अंग्रेजी सभ्यता पर आधारित नाटकों का ही मंचन होता था लेकिन अब गेयटी में देश भक्ति और पहाड़ी संस्कृति की प्रस्तुतियों की धूम रहती है। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान थियेटर में भारतीय नागरिकों के आने पर पाबंदी थी। वायएस राय के लिए एक विशेष सीट होती थी लेकिन अब गेयटी में स्कूली बच्चों से लेकर आम आदमी तक गेयटी में नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रम का लुत्फ उठाते हैं।
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पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी भी देखे थे नाटक
आजादी के तीन साल बाद तक गेयटी थियेटर बंद रहा। इसके बाद 1950 से 1970 के बीच की अवधि में गेयटी में कई नाटक हुए। यहां जेफ्री केंडल, रॉबर्ट बैडेन पॉवेल, पृथ्वीराज कपूर, मास्टर मैडम, बलराज साहनी, अनुपम खेप, मनोहर सहित कई फिल्म अभिनेता और निर्माता नाटकों का मंचन कर चुके हैं। 1950 में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित और बेटी इंदिरा गांधी ने ‘शी स्टूप्स कॉनक्योर’ नाटक गेयटी में देखा था।
3 लाख 23 हजार में बना था गेयटी
गेयटी थियेटर को 1884 में ब्रिटिश आर्किटैक्ट हैनरी इरबिन ने विक्टोरियन गौथिक शैली में बनाना शुरू किया था। इसके लिए 1 लाख रुपये का बजट रखा था लेकिन तीन साल बाद इसे 1887 में 3 लाख 23 हजार रुपये में बनाकर तैयार किया गया। वर्ष 2003 में साढ़े 10 करोड़ रुपये की लागत से इसका जीर्णोद्धार किया गया।