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Shimla News: सेब तुड़ान के बाद बगीचे की मिट्टी की जांच कराएं बागवान
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बागवानी विभाग ने बिना जांच करवाए हर साल एक जैसी खाद के इस्तेमाल से बचने की दी सलाह
स्वस्थ मिट्टी ही अच्छे पेड़ों और बेहतर गुणवत्ता के लिए जरूरी
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। जिले में सेब तुड़ान का काम लगभग अंतिम चरण में है या खत्म हो चुका है। बागवानी विशेषज्ञों ने बागवानों को अभी से अगली फसल की तैयारी शुरू करने की सलाह दी है।
विशेषज्ञों ने बागवानों को बगीचों में खाद का इस्तेमाल करने से पहले मिट्टी की जांच करवाने को कहा है। बागवानी विभाग के विशेषज्ञ डॉ. कुलाल सिंह मेहता ने कहा कि सामान्य तौर पर बागवान फसल खत्म होने के बाद रूटीन खाद का इस्तेमाल करते हैं। विभाग ने बागवानों को ऐसा न करने की सलाह दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि बगीचों में खाद और पोषक तत्वों के प्रबंधन से पहले बागवानों को मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में मिट्टी की जांच करवानी चाहिए, यह अगले साल की अच्छी फसल की नींव है। स्वस्थ मिट्टी ही स्वस्थ पेड़ और बेहतर गुणवत्ता वाले फल के लिए जरूरी है। बागवान अक्सर बीमारी आने पर दवाओं के छिड़काव को लेकर सक्रिय हो जाते हैं, लेकिन मिट्टी की जांच को नजरअंदाज कर देते हैं। सेब के अच्छे आकार और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के लिए केवल फूल आने के बाद किए जाने वाले छिड़काव पर्याप्त नहीं हैं। पेड़ की जड़ स्वस्थ होगी तो वह पानी और पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से ग्रहण कर पाएगी।
मिट्टी की जांच में पीएच, जैविक कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की स्थिति जरूर देखनी चाहिए। आवश्यकता के अनुसार कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर, जिंक और बोरॉन की भी जांच करवाई जा सकती है। इसके बाद मिट्टी की जांच रिपोर्ट को केवल कागज तक सीमित न रखें बल्कि उसके आधार पर बगीचे में खाद और पोषक तत्वों का प्रबंधन करें। पोषक तत्व की कमी हो उसी की पूर्ति की जाए और यदि कोई तत्व पहले से अधिक मात्रा में मौजूद है तो बिना जरूरत उसे दोबारा न डालें। हर साल एक जैसी खाद डालने के बजाय मिट्टी की जरूरत के अनुसार पोषण देना वैज्ञानिक बागवानी है। विशेषज्ञों का कहना है कि सेब के लिए करीब 5.8 से 6.8 तक का पीएच उपयुक्त माना जाता है। यदि मिट्टी अधिक अम्लीय है तो बागवान अपनी मर्जी से चूना डालने के बजाय मिट्टी की जांच रिपोर्ट और आवश्यकता के आधार पर ही इसकी मात्रा तय करें।
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बगीचों में जैविक पदार्थ बढ़ाने पर दें जोर
विशेषज्ञों ने बगीचे में जैविक पदार्थ बढ़ाने पर भी जोर दिया है। अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद और गुणवत्तापूर्ण कंपोस्ट का इस्तेमाल किया जा सकता है। बगीचे से निकलने वाली घास, पत्तियों और उपयुक्त जैविक अवशेषों को जलाने के बजाय उनसे कंपोस्ट तैयार करने की सलाह दी है। इससे बगीचे के कचरे को खाद में बदला जा सकता है और मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में मदद मिलेगी। विशेषज्ञों ने कहा कि अधिक खाद डालने का मतलब अधिक उत्पादन नहीं होता। यदि मिट्टी में फास्फोरस या पोटाश पहले से पर्याप्त मात्रा में है तो केवल परंपरा के कारण हर साल इनका इस्तेमाल करना उचित नहीं है। उत्कृष्ट बागवानी केंद्र शिलारू के विषय विशेषज्ञ डॉ. कुलाल सिंह मेहता ने कहा कि हिमाचल में बागवानों के लिए मिट्टी की जांच की सुविधाएं उपलब्ध हैं। बागवानों को विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र, विभागीय और अन्य प्रयोगशालाओं में मिट्टी की जांच करवानी चाहिए।
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स्वस्थ मिट्टी ही अच्छे पेड़ों और बेहतर गुणवत्ता के लिए जरूरी
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। जिले में सेब तुड़ान का काम लगभग अंतिम चरण में है या खत्म हो चुका है। बागवानी विशेषज्ञों ने बागवानों को अभी से अगली फसल की तैयारी शुरू करने की सलाह दी है।
विशेषज्ञों ने बागवानों को बगीचों में खाद का इस्तेमाल करने से पहले मिट्टी की जांच करवाने को कहा है। बागवानी विभाग के विशेषज्ञ डॉ. कुलाल सिंह मेहता ने कहा कि सामान्य तौर पर बागवान फसल खत्म होने के बाद रूटीन खाद का इस्तेमाल करते हैं। विभाग ने बागवानों को ऐसा न करने की सलाह दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि बगीचों में खाद और पोषक तत्वों के प्रबंधन से पहले बागवानों को मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में मिट्टी की जांच करवानी चाहिए, यह अगले साल की अच्छी फसल की नींव है। स्वस्थ मिट्टी ही स्वस्थ पेड़ और बेहतर गुणवत्ता वाले फल के लिए जरूरी है। बागवान अक्सर बीमारी आने पर दवाओं के छिड़काव को लेकर सक्रिय हो जाते हैं, लेकिन मिट्टी की जांच को नजरअंदाज कर देते हैं। सेब के अच्छे आकार और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के लिए केवल फूल आने के बाद किए जाने वाले छिड़काव पर्याप्त नहीं हैं। पेड़ की जड़ स्वस्थ होगी तो वह पानी और पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से ग्रहण कर पाएगी।
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मिट्टी की जांच में पीएच, जैविक कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की स्थिति जरूर देखनी चाहिए। आवश्यकता के अनुसार कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर, जिंक और बोरॉन की भी जांच करवाई जा सकती है। इसके बाद मिट्टी की जांच रिपोर्ट को केवल कागज तक सीमित न रखें बल्कि उसके आधार पर बगीचे में खाद और पोषक तत्वों का प्रबंधन करें। पोषक तत्व की कमी हो उसी की पूर्ति की जाए और यदि कोई तत्व पहले से अधिक मात्रा में मौजूद है तो बिना जरूरत उसे दोबारा न डालें। हर साल एक जैसी खाद डालने के बजाय मिट्टी की जरूरत के अनुसार पोषण देना वैज्ञानिक बागवानी है। विशेषज्ञों का कहना है कि सेब के लिए करीब 5.8 से 6.8 तक का पीएच उपयुक्त माना जाता है। यदि मिट्टी अधिक अम्लीय है तो बागवान अपनी मर्जी से चूना डालने के बजाय मिट्टी की जांच रिपोर्ट और आवश्यकता के आधार पर ही इसकी मात्रा तय करें।
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बगीचों में जैविक पदार्थ बढ़ाने पर दें जोर
विशेषज्ञों ने बगीचे में जैविक पदार्थ बढ़ाने पर भी जोर दिया है। अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद और गुणवत्तापूर्ण कंपोस्ट का इस्तेमाल किया जा सकता है। बगीचे से निकलने वाली घास, पत्तियों और उपयुक्त जैविक अवशेषों को जलाने के बजाय उनसे कंपोस्ट तैयार करने की सलाह दी है। इससे बगीचे के कचरे को खाद में बदला जा सकता है और मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में मदद मिलेगी। विशेषज्ञों ने कहा कि अधिक खाद डालने का मतलब अधिक उत्पादन नहीं होता। यदि मिट्टी में फास्फोरस या पोटाश पहले से पर्याप्त मात्रा में है तो केवल परंपरा के कारण हर साल इनका इस्तेमाल करना उचित नहीं है। उत्कृष्ट बागवानी केंद्र शिलारू के विषय विशेषज्ञ डॉ. कुलाल सिंह मेहता ने कहा कि हिमाचल में बागवानों के लिए मिट्टी की जांच की सुविधाएं उपलब्ध हैं। बागवानों को विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र, विभागीय और अन्य प्रयोगशालाओं में मिट्टी की जांच करवानी चाहिए।