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खास बातचीत: डॉ. एमएल जाट बोले- यूरिया की अंधाधुंध डोज भारी, सुधारनी होगी मिट्टी की सेहत

Sat, 02 May 2026 10:29 AM IST
Krishan Singh विश्वास भारद्वाज, शिमला।
विश्वास भारद्वाज, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Sat, 02 May 2026 10:29 AM IST
सार

अमर उजाला से विशेष बातचीत में डॉ. जाट ने कहा कि यदि किसान मौजूदा अनुशंसित तकनीकों और मृदा स्वास्थ्य कार्ड के अनुसार उर्वरकों का उपयोग करें तो आज की तारीख में ही रासायनिक खादों की खपत करीब 25 फीसदी तक कम की जा सकती है।

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Exclusive Interview: Dr. ML Jat Says Indiscriminate Doses of Urea Take a Heavy Toll; Soil Health Must Be Resto
डीएआरई के सचिव डॉ. एमएल जाट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक एवं डीएआरई (कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग) के सचिव डॉ. एमएल जाट ने कहा कि देश में रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग खेती की उत्पादकता बढ़ाने के बजाय कई बार नुकसानदायक साबित हो रहा है। उन्होंने कहा कि किसानों में अब भी यह धारणा बनी हुई है कि केवल यूरिया और डीएपी के अधिक इस्तेमाल से ही पैदावार बढ़ेगी, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। अमर उजाला से विशेष बातचीत में डॉ. जाट ने कहा कि यदि किसान मौजूदा अनुशंसित तकनीकों और मृदा स्वास्थ्य कार्ड के अनुसार उर्वरकों का उपयोग करें तो आज की तारीख में ही रासायनिक खादों की खपत करीब 25 फीसदी तक कम की जा सकती है।

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डॉ. जाट ने कहा कि पीएम-प्रणाम योजना से मिट्टी की सेहत सुधारने पर काम शुरू किया गया है। कई क्षेत्रों में मिट्टी में माइक्रो न्यूट्रिएंट्स और सेकेंडरी न्यूट्रिएंट्स की कमी होती है, लेकिन किसान उसकी पूर्ति करने के बजाय यूरिया की अतिरिक्त बोरी डाल देते हैं, जो काउंटर प्रोडक्टिव साबित होता है। उन्होंने कहा कि खेती में संतुलित पोषण की जरूरत है, न कि केवल नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों की अधिक मात्रा की। उन्होंने बताया कि देशभर में विभिन्न कृषि संस्थानों और राज्यों के कृषि विभागों की ओर से चलाए जा रहे अभियान का उद्देश्य किसानों को यह समझाना है कि जितनी जरूरत हो उतनी ही खाद डालें। पड़ोसी को देखकर या अनुमान से खाद डालने की प्रवृत्ति बदलनी होगी। मिट्टी परीक्षण और सोयल हेल्थ कार्ड के आधार पर उर्वरकों का इस्तेमाल करना समय की जरूरत है।

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ऑर्गेनिक और बायोलॉजिकल स्रोतों में बड़ी संभावना
डॉ. जाट ने कहा कि देश में ऑर्गेनिक मैन्योर, कंपोस्ट, ग्रीन मैन्योर और बायो फर्टिलाइजर जैसे विकल्पों की अपार संभावनाएं हैं। इसके अलावा फसल प्रणाली में दलहन को शामिल करने और इंटरक्रॉपिंग जैसी तकनीकों से भी रासायनिक खादों पर निर्भरता कम की जा सकती है। उन्होंने कहा कि न्यूट्रिएंट यूज एफिशिएंसी बढ़ाने के लिए नई किस्मों और तकनीकों पर भी काम हो रहा है।
 

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खाद देने की नई तकनीक से बढ़ेगी पैदावार
उन्होंने कहा कि फर्टिगेशन सिंचाई के साथ उर्वरक जैसी तकनीकों से उर्वरकों की उपयोग दक्षता बढ़ाई जा सकती है। सिंचाई के साथ उर्वरक देने से खाद की बर्बादी कम होती है और पौधों को सीधे पोषण मिलता है। डॉ. जाट ने कहा कि भविष्य में नए फर्टिलाइजर मॉलिक्यूल और उन्नत तकनीकें इस दिशा में और मददगार साबित होंगी।

भारत अपनी जरूरतों के हिसाब से बना रहा मॉडल
खादों के मामले में आत्मनिर्भरता पर पूछे गए सवाल के जवाब में डॉ. जाट ने कहा कि भारत किसी दूसरे देश की नकल नहीं कर रहा, बल्कि अपनी कृषि परिस्थितियों और छोटे किसानों की जरूरतों के अनुरूप मॉडल विकसित कर रहा है। उन्होंने कहा कि देश में जैविक और बायोलॉजिकल स्रोतों की क्षमता को बढ़ाकर तथा उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देकर आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से काम किया जा रहा है।

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