रूस में भी स्थापित था 'मां ज्वाला' का अनोखा मंदिर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हिमाचल में शक्तिपीठ ज्वालाजी का मंदिर पूरी दुनिया में मशहूर है, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि ऐसा ही एक मंदिर रूस में भी था।
इसका जिक्र विख्यात घुमक्कड़ विद्वान राहुल सांकृत्यायन के यात्रा वृत्तांत में है। मशहूर घुमक्कड़ लेखक राहुल सांकृत्यायन ने करीब सात दशक पहले कांगड़ा के ज्वाला देवी मंदिर का दौरा किया था।
उन्होंने अपने यात्रा वृत्तांत में रूस के बाकू स्थित उस मंदिर का भी जिक्र किया, जहां निरंतर ज्वाला निकला करती थी। आसपास पेट्रोल के कुएं होने के कारण रूसी सरकार ने उस ज्वाला को बुझा दिया।
महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन ने किताब में किया खुलासा
तत्कालीन रूसी शासकों ने उस ज्वाला की गैस फैलने की आशंका जताकर मिटा दिया था। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक हिमाचल: एक सांस्कृतिक यात्रा में लिखा- रूस में भी कांगड़ा की ही तरह ज्वाला माई की उपस्थिति थी।
हिमाचल के ज्वालामाता मंदिर का वर्णन करते हुए सांकृत्यायन लिखते हैं- दिन के एक बजे हमारी बस ज्वालाजी अड्डे पर जा खड़ी हुई।
पास में एक नई विशाल और स्वच्छ धर्मशाला थी, पर हमें तो पहले माई का दर्शन करना था। पुजारी ने बतलाया- सोने की छत महाराजा रणजीत सिंह ने चढ़वाई और चांदी का द्वार उनके पुत्र की भक्ति का प्रतीक है।
अकबर की तरह नहीं थे रूस के शासक
सांकृत्यायन ने लिखा है -1935 में वहां पहुंचने से पहले ही बड़ी ज्वालामाई सुरधाम चली गई थीं। रूस के शासक अकबर की तरह नहीं थे।
उन्होंने कहा -चारों तरफ पेट्रोल के जबरदस्त क्षेत्र में इस गैसमयी ज्वाला का रहना खतरे से खाली नहीं है, इसलिए इसे बुझा देना ही अच्छा है। उन्होंने वैसा ही किया।
पुजारी ने महापंडित राहुल सांकृत्यायन को कथा भी बतलाई कि अकबर ने माई का तेज देखने के लिए लोहे के सात मोटे-मोटे तवों से ज्वाला को ढंककर बुझाना चाहा, पर माई सातों तवों को तोड़कर प्रकट हो गई। अकबर ने फिर नहर से पानी लाकर डाला, पर माई का बाल भी बांका न हो सका।
साधु ने कहा बड़ी ज्वाला माई तो रूस में है
राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि हमें इन कथाओं को सुनने की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि हम उन्हें पहले ही पढ़ चुके थे, जिनमें अकबर के देवी भक्त बन जाने की बात सामने आई थी। हां, उस समय 38 साल पहले सुनी बाकू (रूस) से लौटे उस तरुण साधु की बात याद आ रही थी जो कह रहा था कि बड़ी ज्वालामाई रूस में हैं।
कांगड़ा की ज्वालामाई तो छोटी ज्वालाजी हैं। शायद छोटी-बड़ी से उसका ख्याल छोटी बड़ी टेम (ज्वाला) से था, यहां टेमें छोटी-छोटी थीं, पर बाकू की ज्वालामाई की टेमें इससे बड़ी थीं। इसे मैं प्रत्यक्ष नहीं देख पाया।