प्रदेश के सरकारी कर्मचारी नेताओं में गुटबाजी हावी, मुद्दे दरकिनार
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
प्रदेश के पौने दो लाख कर्मचारियों का नेतृत्व करने वाले नेता गुटों में बंटे हैं और मुलाजिमों के मुद्दे गायब हैं। कर्मचारी नेताओं में गुटबाजी इस कद्र हावी है कि कर्मचारियों के लंबित मसले हाशिए पर हैं। प्रदेश में भाजपा सरकार को बने डेढ़ साल होने वाले हैं और कर्मचारियों के मसले सुलझाने को संयुक्त सलाहकार समिति की बैठक तक नहीं बुलाई जा सकी है। नियमों के अनुसार सरकार को हर छह माह में जेसीसी बुलाना अनिवार्य है। कर्मचारी एकजुट होकर अपने प्रतिनिधियों को नहीं चुन पाए हैं तो सरकार जेसीसी बैठक कैसे बुला पाएगी।
प्रदेश में कर्मचारी महासंघ तीन गुटों में बंटा हुआ है। तीनों गुटों के नेता कर्मचारियों के हितों की कम और अपने हितों को साधने की जुगत में लगे हैं। महासंघ की कमान तीनों गुटों के नेता अपने हाथों में रखना चाहते हैं। अपने स्तर पर महासंघ के चुनाव कराने की होड़ लगी है। उद्यान निदेशालय सभागार में गत दिन महासंघ के अश्वनी गुट ने आनन-फानन में चुनाव करा दिए हैं। अश्वनी नए अध्यक्ष बन गए हैं। उनका दावा है कि महासंघ के चुनाव में सभी ब्लाकों, जिलों और विभागीय संघों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया है। कार्यकारिणी का विस्तार भी किया गया है।
भारतीय मजदूर संघ से संबद्ध हिमाचल प्रदेश अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ के चुनाव रविवार को सरकाघाट में सुरेंद्र ठाकुर की मौजूदगी में कराए गए हैं। इसमें इस महासंघ के नए अध्यक्ष एनआर ठाकुर बनाए गए हैं। नए अध्यक्ष कहते हैं कि जो नेता अपने स्तर पर चुनाव करा रहे हैं, उनसे बातचीत की जाएगी और उनको अपने संगठन के साथ जोड़ा जाएगा। प्रदेश अराजपत्रित कर्मचारी सेवाएं महासंघ संयोजक विनोद कुमार का दावा है कि उनका महासंघ कर्मचारियों की लड़ाई लड़ता रहा है। सुरेंद्र गुट के नेता भारतीय मजदूर संघ से जुड़े हैं। अश्वनी गुट ने दबाव बनाकर चुनाव कराए हैं। महासंघ के चुनाव 21 को बिलासपुर में हो रहे हैं। उन्होंने विभाग, ब्लाक और जिला स्तर पर चुनाव कराए हैं।
ये कर्मचारी मुद्दे अभी तक नहीं सुलझे
सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू नही हुई।
वेतन विसंगतियां दूर नहीं हुई।
कई पदों के लिए भर्ती एवं पदोन्नति नियमों नहीं बने।
टाइम स्केल का लाभ कर्मचारियों को नहीं मिला।
कर्मचारियों के लिए तबादला नीति नहीं बनी।