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धर्मशाला: स्कूल बसों में लगाए स्पीड गवर्नर निकले खराब, देना होगा 1.80 लाख मुआवजा

Fri, 30 May 2025 01:02 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, धर्मशाला
अमर उजाला ब्यूरो, धर्मशाला Published by: Krishan Singh Updated Fri, 30 May 2025 01:02 PM IST
सार

जिला उपभोक्ता आयोग ने कड़ा संज्ञान लेते हुए कंपनी और उसके स्थानीय रिटेलर को स्कूल में बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए कल्याण कोष में 1.80 लाख रुपये मुआवजा जमा करने के आदेश दिए हैं, साथ ही कंपनी को नौ फीसदी ब्याज सहित 18,000 रुपये भी लौटाने होंगे। 

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Dharamshala: Speed governors installed in school buses turned out to be faulty, will have to pay Rs. 1.80 la
उपभोक्ता आयोग ने निजी बसों के मामले में लिया संज्ञान। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

निजी स्कूल की छह बसों में लगाए स्पीड गर्वनर खराब निकले। इस मामले में जिला उपभोक्ता आयोग ने कड़ा संज्ञान लेते हुए कंपनी और उसके स्थानीय रिटेलर को स्कूल में बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए कल्याण कोष में 1.80 लाख रुपये मुआवजा जमा करने के आदेश दिए हैं, साथ ही कंपनी को नौ फीसदी ब्याज सहित 18,000 रुपये भी लौटाने होंगे। इसके अलावा 18,000 रुपये मुकद्दमेबाजी का खर्च देने को भी कहा है। ग्राहक के पक्ष में यह आदेश जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष हेमांशु मिश्रा, सदस्य आरती सूद और नारायण ठाकुर की अदालत ने दिए। इसके साथ ही राज्य शिक्षा निदेशक को आदेश दिया कि वह जिले की सभी स्कूल बसों में लगे स्पीड गवर्नरों की कार्यप्रणाली की जांच 15 अगस्त तक पूरी कर रिपोर्ट दें।

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धर्मशाला के सुधेड़ में एक निजी स्कूल के प्रधानाचार्य ने एक कंपनी और उसके स्थानीय रिटेलर के खिलाफ उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज करवाई थी। शिकायत के अनुसार स्कूल प्रबंधन ने छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए छह स्कूल बसों में स्पीड गवर्नर लगवाए। इसके लिए उन्होंने 36,000 रुपये का 50 प्रतिशत भुगतान 18,000 रुपये 25 जुलाई 2024 को जमा करवाया। इस दौरान सर्टिफिकेट 2 अगस्त 2024 का दिया गया, जबकि गाड़ियों में स्पीड गवर्नर लगाने का काम 16 अगस्त 2024 को किया। जांच के दौरान इनके प्रमाण पत्र में गलत जानकारी पाई गई।
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इन स्पीड गवर्नरों के स्थापित होने के बाद स्कूल बस चालकों ने रिपोर्ट दी कि स्पीड गवर्नर प्रभावी रूप से गति नियंत्रित नहीं कर रहे हैं और बसें 40 किमी प्रति घंटा की अधिकतम सीमा से कहीं अधिक गति से चल रही हैं। इससे छात्रों की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है। इस पर आयोग ने माना कि उपभोक्ता ने पूरी ईमानदारी से बच्चों की सुरक्षा के लिए उपकरण लगवाए हैं, जबकि स्पीड गवर्नर के ठीक से कार्य नहीं करने के चलते यह मामला सेवा में भारी कमी और निर्माण दोष के तहत पाया गया। साथ ही फर्जी दस्तावेज (गलत तारीख वाले प्रमाण पत्र) देना अनुचित व्यापारिक आचरण भी माना। इसके तहत सारी दलीलों के बाद आयोग ने उपभोक्ता के शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया।

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