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Shimla News: धरोहर पर सीलन की मार, फीकी पड़ने लगी टाउनहॉल की चमक
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धरोहरों के हाल
बारिश में टपकने लगती है छत, सड़
रही खिड़कियां, दीवारों पर छाई सीलन से धरोहर के खराब होने का खतरा
आठ करोड़ रुपये की लागत से हुआ है भवन का जीर्णोद्धार
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। राजधानी के मालरोड की पहचान और शहर की ऐतिहासिक धरोहरों में शुमार टाउनहॉल भवन साल-दर-साल अपनी चमक खो रहा है। आठ करोड़ रुपये की लागत से हुए जीर्णोद्धार के बावजूद भवन की स्थिति लगातार बिगड़ रही है।
बारिश के दौरान इसकी छत टपकने लगती है, जिससे ऊपरी मंजिल का लकड़ी का फर्श खराब हो रहा है। निचली मंजिल में महापौर कार्यालय के बाहर खाली पड़े दो कमरों की दीवारें सीलन के कारण बदरंग हो चुकी हैं और कई स्थानों पर प्लास्टर भी झड़ गया है। बारिश का पानी महापौर, उपमहापौर और उनके निजी सहायकों के कार्यालयों की खिड़कियों तक पहुंच रहा है। नमी के कारण लकड़ी की कई खिड़कियां सड़ चुकी हैं और कुछ अब नहीं खुल रही। भवन की बाहरी दीवारों पर लकड़ी का सुरक्षात्मक पेंट भी लगभग पूरी तरह उखड़ चुका है। भारी बारिश के दौरान उपमहापौर कार्यालय में टपकती छत के नीचे पानी रोकने के लिए बाल्टियां और डिब्बे रखने पड़ते हैं। गेयटी थियेटर की तुलना में टाउनहॉल की चमक अब काफी फीकी पड़ चुकी है। भवन में अंतिम बार वर्ष 2018 में रंग-रोगन किया था। अब नगर निगम ने दोबारा स्टेट हेरिटेज कमेटी से रंग-रोगन की अनुमति मांगी है। हालांकि, तीन महीने से यह प्रस्ताव लोक निर्माण विभाग और हेरिटेज कमेटी के बीच लंबित है।
ब्रिटिश शासनकाल से भवन से चल रहा है शहर का प्रशासन
मालरोड स्थित इस ऐतिहासिक भवन का निर्माण 1860 के दशक में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान हुआ था। बाद में इसका पुनर्निर्माण किया और वर्ष 1908 में इसे वर्तमान स्वरूप मिला। ब्रिटिश शासन के दौरान यहीं से प्रशासन संचालित होता था। आजादी के बाद भी यह भवन प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र बना रहा। वर्ष 1986 में नगर निगम में लोकतांत्रिक चुनाव व्यवस्था लागू होने के बाद महापौर, उपमहापौर और निगम अधिकारियों के कार्यालय यहीं स्थापित किए। वर्तमान में हाईकोर्ट के आदेश के तहत भवन के ग्राउंड फ्लोर पर हाई एंड कैफे संचालित हो रहा है, जबकि पहली मंजिल पर महापौर और उप महापौर के कार्यालय हैं। दूसरी मंजिल का अधिकांश हिस्सा तथा एटिक फ्लोर पिछले सात वर्षों से खाली पड़ा है।
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आठ करोड़ के जीर्णोद्धार पर उठ रहे सवाल
वर्ष 2014 में टाउनहॉल के जीर्णोद्धार का निर्णय लिया था। पर्यटन विभाग ने करीब आठ करोड़ रुपये की लागत से पांच वर्षों तक इस भवन का संरक्षण एवं जीर्णोद्धार कराया। वर्ष 2019 में भवन दोबारा उपयोग के लिए खोला गया लेकिन इसके कुछ ही समय बाद निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे। छत से पानी टपकने और खिड़कियों से बारिश का पानी कार्यालयों में प्रवेश करने जैसी शिकायतें महापौर और उपमहापौर कई बार संबंधित विभागों के समक्ष उठा चुके हैं। दूसरी ओर, शिमला आने वाले पर्यटक इस ऐतिहासिक इमारत के सामने तस्वीरें तो खिंचवाते हैं, लेकिन इसकी जर्जर होती स्थिति देखकर हैरानी भी जताते हैं।
अब आगे क्या
नगर निगम ने स्टेट हेरिटेज कमेटी से भवन के रंग-रोगन की अनुमति मांगी है। निगम प्रशासन का कहना है कि भवन की ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए इसके अंदर और बाहर दोनों हिस्सों का संरक्षण किया जाएगा। महापौर सुरेंद्र चौहान ने कहा कि अनुमति मिलते ही रंग-रोगन और आवश्यक मरम्मत का कार्य शुरू कर दिया जाएगा, ताकि इस ऐतिहासिक धरोहर की खो रही चमक को फिर से लौटाया जा सके।
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बारिश में टपकने लगती है छत, सड़
रही खिड़कियां, दीवारों पर छाई सीलन से धरोहर के खराब होने का खतरा
आठ करोड़ रुपये की लागत से हुआ है भवन का जीर्णोद्धार
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। राजधानी के मालरोड की पहचान और शहर की ऐतिहासिक धरोहरों में शुमार टाउनहॉल भवन साल-दर-साल अपनी चमक खो रहा है। आठ करोड़ रुपये की लागत से हुए जीर्णोद्धार के बावजूद भवन की स्थिति लगातार बिगड़ रही है।
बारिश के दौरान इसकी छत टपकने लगती है, जिससे ऊपरी मंजिल का लकड़ी का फर्श खराब हो रहा है। निचली मंजिल में महापौर कार्यालय के बाहर खाली पड़े दो कमरों की दीवारें सीलन के कारण बदरंग हो चुकी हैं और कई स्थानों पर प्लास्टर भी झड़ गया है। बारिश का पानी महापौर, उपमहापौर और उनके निजी सहायकों के कार्यालयों की खिड़कियों तक पहुंच रहा है। नमी के कारण लकड़ी की कई खिड़कियां सड़ चुकी हैं और कुछ अब नहीं खुल रही। भवन की बाहरी दीवारों पर लकड़ी का सुरक्षात्मक पेंट भी लगभग पूरी तरह उखड़ चुका है। भारी बारिश के दौरान उपमहापौर कार्यालय में टपकती छत के नीचे पानी रोकने के लिए बाल्टियां और डिब्बे रखने पड़ते हैं। गेयटी थियेटर की तुलना में टाउनहॉल की चमक अब काफी फीकी पड़ चुकी है। भवन में अंतिम बार वर्ष 2018 में रंग-रोगन किया था। अब नगर निगम ने दोबारा स्टेट हेरिटेज कमेटी से रंग-रोगन की अनुमति मांगी है। हालांकि, तीन महीने से यह प्रस्ताव लोक निर्माण विभाग और हेरिटेज कमेटी के बीच लंबित है।
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ब्रिटिश शासनकाल से भवन से चल रहा है शहर का प्रशासन
मालरोड स्थित इस ऐतिहासिक भवन का निर्माण 1860 के दशक में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान हुआ था। बाद में इसका पुनर्निर्माण किया और वर्ष 1908 में इसे वर्तमान स्वरूप मिला। ब्रिटिश शासन के दौरान यहीं से प्रशासन संचालित होता था। आजादी के बाद भी यह भवन प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र बना रहा। वर्ष 1986 में नगर निगम में लोकतांत्रिक चुनाव व्यवस्था लागू होने के बाद महापौर, उपमहापौर और निगम अधिकारियों के कार्यालय यहीं स्थापित किए। वर्तमान में हाईकोर्ट के आदेश के तहत भवन के ग्राउंड फ्लोर पर हाई एंड कैफे संचालित हो रहा है, जबकि पहली मंजिल पर महापौर और उप महापौर के कार्यालय हैं। दूसरी मंजिल का अधिकांश हिस्सा तथा एटिक फ्लोर पिछले सात वर्षों से खाली पड़ा है।
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आठ करोड़ के जीर्णोद्धार पर उठ रहे सवाल
वर्ष 2014 में टाउनहॉल के जीर्णोद्धार का निर्णय लिया था। पर्यटन विभाग ने करीब आठ करोड़ रुपये की लागत से पांच वर्षों तक इस भवन का संरक्षण एवं जीर्णोद्धार कराया। वर्ष 2019 में भवन दोबारा उपयोग के लिए खोला गया लेकिन इसके कुछ ही समय बाद निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे। छत से पानी टपकने और खिड़कियों से बारिश का पानी कार्यालयों में प्रवेश करने जैसी शिकायतें महापौर और उपमहापौर कई बार संबंधित विभागों के समक्ष उठा चुके हैं। दूसरी ओर, शिमला आने वाले पर्यटक इस ऐतिहासिक इमारत के सामने तस्वीरें तो खिंचवाते हैं, लेकिन इसकी जर्जर होती स्थिति देखकर हैरानी भी जताते हैं।
अब आगे क्या
नगर निगम ने स्टेट हेरिटेज कमेटी से भवन के रंग-रोगन की अनुमति मांगी है। निगम प्रशासन का कहना है कि भवन की ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए इसके अंदर और बाहर दोनों हिस्सों का संरक्षण किया जाएगा। महापौर सुरेंद्र चौहान ने कहा कि अनुमति मिलते ही रंग-रोगन और आवश्यक मरम्मत का कार्य शुरू कर दिया जाएगा, ताकि इस ऐतिहासिक धरोहर की खो रही चमक को फिर से लौटाया जा सके।