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Shimla News: शोभायात्रा के साथ जैईश्वरी माता धरेच मेला शुरू
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निसंतान दंपतियों की सूनी गोद भरती हैं जैईश्वरी माता
जुन्गा (शिमला)। धरेच के केलियाघाट में जैईश्वरी माता का आठ दिवसीय मेला रविवार को श्रद्धा और उल्लास के साथ शुरू हुआ। दुर्गाष्टमी (आठयो) के पावन अवसर पर माता के प्राचीन मंदिर धरेच से पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ भव्य शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा केलिया घाट स्थित माता के प्राचीन मंदिर में संपन्न हुई। इसमें क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर माता का आशीर्वाद प्राप्त किया।
देवी के वजीर खानदान से संबंधित हरिचंद शर्मा ने बताया कि केलिया घाट स्थित मंदिर में प्रतिवर्ष शरद नवरात्र की दुर्गाष्टमी से शरद पूर्णिमा तक मेले का आयोजन किया जाता है। दुर्गाष्टमी के दिन जैईश्वरी माता धरेच से केलिया घाट स्थित प्राचीन मंदिर मौड़ में विराजमान होती हैं। यहां माता चतुर्दशी तक श्रद्धालुओं को दर्शन देती हैं, जबकि शरद पूर्णिमा के अवसर पर वापस अपने मूल मंदिर धरेच में प्रवेश करती हैं। माता के प्रति गहरी आस्था के चलते क्षेत्र के अलावा दूरदराज से भी श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। मेले के दौरान बड़ी संख्या में लोग अपने छोटे बच्चों का मुंडन संस्कार करवाने आते हैं।
हरिचंद शर्मा ने बताया कि जैईश्वरी नगरकोटी माता निसंतान दंपतियों की सूनी गोद भरती हैं जिसके चलते हर वर्ष असंख्य दंपती मनोकामना पूर्ण होने पर मंदिर में पहुंचते हैं। मंदिर में चावल के दाने प्रसाद के रूप में दिए जाते हैं, जिन्हें श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक अपने घरों में सहेजकर रखते हैं।
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माता के केलिया घाट पहुंचने के बाद मंदिर में सात जागरों की परंपरा निभाई जाती है। इनमें एक जागरा मंदिर समिति की ओर से आयोजित किया जाता है, जबकि छह जागरे बगोल, धारठी, सौंथल, रिहाड़, बटनाली और खगनाल गांवों की ओर से दिए जाते हैं। उन्होंने बताया कि अतीत में मंदिर में बलि प्रथा प्रचलित थी, जिसे वजीर मोती राम शर्मा ने सर्वोच्च न्यायालय का आदेश आने से पहले ही बंद करवा दिया था।
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जुन्गा (शिमला)। धरेच के केलियाघाट में जैईश्वरी माता का आठ दिवसीय मेला रविवार को श्रद्धा और उल्लास के साथ शुरू हुआ। दुर्गाष्टमी (आठयो) के पावन अवसर पर माता के प्राचीन मंदिर धरेच से पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ भव्य शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा केलिया घाट स्थित माता के प्राचीन मंदिर में संपन्न हुई। इसमें क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर माता का आशीर्वाद प्राप्त किया।
देवी के वजीर खानदान से संबंधित हरिचंद शर्मा ने बताया कि केलिया घाट स्थित मंदिर में प्रतिवर्ष शरद नवरात्र की दुर्गाष्टमी से शरद पूर्णिमा तक मेले का आयोजन किया जाता है। दुर्गाष्टमी के दिन जैईश्वरी माता धरेच से केलिया घाट स्थित प्राचीन मंदिर मौड़ में विराजमान होती हैं। यहां माता चतुर्दशी तक श्रद्धालुओं को दर्शन देती हैं, जबकि शरद पूर्णिमा के अवसर पर वापस अपने मूल मंदिर धरेच में प्रवेश करती हैं। माता के प्रति गहरी आस्था के चलते क्षेत्र के अलावा दूरदराज से भी श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। मेले के दौरान बड़ी संख्या में लोग अपने छोटे बच्चों का मुंडन संस्कार करवाने आते हैं।
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हरिचंद शर्मा ने बताया कि जैईश्वरी नगरकोटी माता निसंतान दंपतियों की सूनी गोद भरती हैं जिसके चलते हर वर्ष असंख्य दंपती मनोकामना पूर्ण होने पर मंदिर में पहुंचते हैं। मंदिर में चावल के दाने प्रसाद के रूप में दिए जाते हैं, जिन्हें श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक अपने घरों में सहेजकर रखते हैं।
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माता के केलिया घाट पहुंचने के बाद मंदिर में सात जागरों की परंपरा निभाई जाती है। इनमें एक जागरा मंदिर समिति की ओर से आयोजित किया जाता है, जबकि छह जागरे बगोल, धारठी, सौंथल, रिहाड़, बटनाली और खगनाल गांवों की ओर से दिए जाते हैं। उन्होंने बताया कि अतीत में मंदिर में बलि प्रथा प्रचलित थी, जिसे वजीर मोती राम शर्मा ने सर्वोच्च न्यायालय का आदेश आने से पहले ही बंद करवा दिया था।