टेक्नोमैक घोटाला: 2200 करोड़ टैक्स चोरी की जांच करेगी सीआईडी
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हिमाचल के सिरमौर जिले के माजरा थाने में 11 मार्च को दर्ज हुए करीब छह हजार करोड़ रुपये के इंडियन टेक्नोमैक कंपनी के घोटाले की जांच अब सीआईडी करेगी। पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर मामले की जांच सीआईडी को ट्रांसफर कर दी गई है। सिरमौर के एएसपी वीरेंद्र ठाकुर ने मामला सीआईडी को हस्तांतरित होने की पुष्टि की है।
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दरअसल, साल 2014 में टेक्नोमैक कंपनी के करीब 21 सौ करोड़ के घोटाले की बात सामने आने के बाद आबकारी एवं कराधान विभाग ने इसकी विभागीय स्तर पर जांच शुरू कर दी। दो साल तक जांच चलती रही, लेकिन विभाग ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इस बीच सीआईडी ने 2016 में घोटाले से संबंधित दो मामले दर्ज किए।
पहला 21 सौ करोड़ की टैक्स चोरी का और दूसरा साढ़े चार करोड़ के बिजली बिल चुकाने में हुए घोटाले से जुड़ा है। दोनों मामलों की जांच कर रही सीआईडी को हाल ही में कंपनी के कई और घोटालों की जानकारी मिली थी। इसके बाद कंपनी द्वारा खरीदी गई जमीन और लोन के लिए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करने के मुकदमे दर्ज करने की सीआईडी तैयारी कर रही थी।
इसी बीच, सिरमौर के आबकारी एवं कराधान अधिकारियों ने माजरा थाने में कंपनी के अधिकारियों के खिलाफ एक और मुकदमा दर्ज करा दिया। सूत्रों का कहना है कि चूंकि सीआईडी इसी कंपनी के इसी घोटाले से जुड़े 2016 में दर्ज एक मामले की जांच कर रही है, इसलिए दूसरा मामला भी उसी को दे दिया गया, ताकि जांच में विरोधाभास न हो।
डेढ़ साल बाद एफआईआर करने की अनुमति
इंडियन टेक्नोमैक कंपनी की ओर से सरकारी राजस्व पर लगाई गई हजारों करोड़ की चपत का खुलासा होने के लगभग डेढ़ साल तक आबकारी विभाग एफआईआर दर्ज नहीं कर पाया। इस घोटाले में जहां सरकार और विभाग की लेटलतीफी सामने आ रही है, वहीं राजनीतिक पहुंच की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
आशंका यह भी जताई जा रही है कि कंपनी के डायरेक्टरों की राजनीतिक पहुंच के चलते मामले में ढील बरती गई। वर्ष 2016 से शुरू हुई प्रक्रिया को वर्ष 2018 में अमलीजामा पहनाया जा सका।
टेक्नोमैक की कारगुजारियों का खुलासा वर्ष 2014 में आबकारी एवं कराधान विभाग की इकनॉमिक इंटेलिजेंस टीम ने किया था। इसके बाद आबकारी विभाग के टैक्स की रिकवरी को लड़ाई का दौर शुरू हुआ।
वर्ष 2014 में आबकारी एवं कराधान विभाग द्वारा उद्योग को सील करने के बाद कंपनी प्रबंधन हाईकोर्ट, ट्रिब्यूनल व सुप्रीमकोर्ट भी गए, लेकिन कंपनी को राहत नहीं मिली। बावजूद इसके रिकवरी करने करने में ढील बरती गई।
बिजली बोर्ड की ओर से सीआईडी में दर्ज करवाए गए जाली ट्रेजरी स्लिप के मामले की छानबीन कर रही सीआईडी से आबकारी विभाग ने मामला साझा किया तो मामले को प्रवर्तन निदेशालय को ट्रांसफर करने का सुझाव दिया गया।
इसका कारण यह रहा कि प्रवर्तन निदेशालय का क्षेत्राधिकार पूरा देश है। आर्थिक एवं आपराधिक मामले की जांच के लिए ईडी उपयुक्त एजेंसी है। लिहाजा, मामला ईडी को सौंपने की प्रक्रिया शुरू हुई।
एफआईआर दर्ज, गेंद सरकार के पाले में
चूंकि, इसके लिए पहले थाना में एफआईआर दर्ज करवानी थी। लिहाजा, एफआईआर दर्ज करने के लिए विभाग ने आलाधिकारियों से अनुमति मांगी। वर्ष 2016 से चली इस प्रक्रिया के तहत दिसंबर 2017 में फिर रिमांइडर भेजा गया।
इसके बाद एक मार्च 2018 को एफआईआर दर्ज करने की अनुमति दी गई। इसके तुरंत बाद 11 मार्च को पुलिस ने माजरा थाना में विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज करवाया।
अब सवाल यह है कि एफआईआर दर्ज कराने की अनुमति देने के लिए इतना वक्त क्यों लगा ? कहीं कंपनी के निदेशकों की राजनीतिक पहुंच के चलते तो यह मामला नहीं लटका? इन सवालों के जवाब मामला ईडी को ट्रांसफर होने के बाद होने वाली जांच में मिल सकते हैं।
टेक्नोमैक कंपनी के घपले का मामला ईडी को सौंपने की प्रक्रिया वर्ष 2016 में ही शुरू हो गई थी। एफआईआर दर्ज होने के बाद मामला ईडी तक पहुंचने में तेजी आएगी। आबकारी एवं कराधान विभाग ने भी इसको लेकर होमवर्क शुरू कर दिया है।
पूरी रिपोर्ट तैयार कर सरकार को भेजने की तैयारी चल रही है। सूत्र बताते हैं कि शराब ठेकों की नीलामी के चलते इसमें विलंब हो रहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि 31 मार्च के पश्चात आबकारी एवं कराधान विभाग यह मामला सरकार से उठा सकता है।
विभाग के सहायक आयुक्त जीडी ठाकुर ने बताया कि वर्ष 2016 से मामला ईडी को देने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। एफआईआर जरूरी थी, इसलिए एफआईआर की अनुमति मांगी गई। इसके बाद अब मामला ईडी को ट्रांसफर करने के लिए सरकार से अनुमति मांगी जाएगी।