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Shimla News: चेक बाउंस मामले में दोषी की सजा बरकरार
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निचली अदालत ने सुनाई थी तीन महीने की कैद और 3.50 लाख जुर्माने की सजा
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। कोर्ट ने चेक बाउंस के दोषी की अपील खारिज कर सजा को बरकरार रखा है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (सीबीआई) शिमला डॉ. परविंदर सिंह अरोड़ा की अदालत ने निचली अदालत की ओर से सुनाई गई तीन महीने की साधारण कैद और 3,50,000 रुपये के जुर्माने की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने फैसले में स्पष्ट किया कि यदि दोषी पर कोई दायित्व नहीं था तो उसे सुरक्षा के तौर पर दूसरा चेक देने की आवश्यकता ही नहीं थी। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता ने कानूनी तौर पर अपना पक्ष सिद्ध कर दिया है इसलिए निचली अदालत का फैसला सही है।
शिकायतकर्ता मैसर्स रूप सन्स के प्रोपराइटर कुलविंदर कौशल ने वर्ष 2019 में शिमला निवासी दोषी निर्मल मलाकर के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। दोषी ने दिसंबर 2018 में हार्डवेयर की दुकान से 2,68,202 रुपये का निर्माण सामग्री का सामान खरीदा। बकाया राशि के भुगतान के लिए दोषी ने दो चेक दिए, जिनमें से 68,192 रुपये का चेक तो पास हो गया था लेकिन दो लाख रुपये का दूसरा चेक बाउंस हो गया। सुनवाई के दौरान पाया गया कि दोषी ने न तो कोई सबूत पेश किया और न ही साक्ष्यों के जरिए अपनी बेगुनाही साबित कर पाया। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने दोषी की अपील खारिज कर दी।
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संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। कोर्ट ने चेक बाउंस के दोषी की अपील खारिज कर सजा को बरकरार रखा है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (सीबीआई) शिमला डॉ. परविंदर सिंह अरोड़ा की अदालत ने निचली अदालत की ओर से सुनाई गई तीन महीने की साधारण कैद और 3,50,000 रुपये के जुर्माने की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने फैसले में स्पष्ट किया कि यदि दोषी पर कोई दायित्व नहीं था तो उसे सुरक्षा के तौर पर दूसरा चेक देने की आवश्यकता ही नहीं थी। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता ने कानूनी तौर पर अपना पक्ष सिद्ध कर दिया है इसलिए निचली अदालत का फैसला सही है।
शिकायतकर्ता मैसर्स रूप सन्स के प्रोपराइटर कुलविंदर कौशल ने वर्ष 2019 में शिमला निवासी दोषी निर्मल मलाकर के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। दोषी ने दिसंबर 2018 में हार्डवेयर की दुकान से 2,68,202 रुपये का निर्माण सामग्री का सामान खरीदा। बकाया राशि के भुगतान के लिए दोषी ने दो चेक दिए, जिनमें से 68,192 रुपये का चेक तो पास हो गया था लेकिन दो लाख रुपये का दूसरा चेक बाउंस हो गया। सुनवाई के दौरान पाया गया कि दोषी ने न तो कोई सबूत पेश किया और न ही साक्ष्यों के जरिए अपनी बेगुनाही साबित कर पाया। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने दोषी की अपील खारिज कर दी।
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