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Shimla: जलवायु परिवर्तन का असर, शिमला शहर में देवदार के पेड़ों से परागण गायब, भविष्य के लिए यह बड़ी चेतावनी

Sat, 16 Nov 2024 01:21 PM IST
Krishan Singh हर्षित शर्मा, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला
हर्षित शर्मा, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Sat, 16 Nov 2024 01:21 PM IST
सार

शिमला के जंगलों में इस साल देवदार के पेड़ों में परागण करने वाले नर शंकु (मेल कोन्स) का निर्माण नहीं हुआ।

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climate change Effects: pollination of deodar trees in Shimla city disappears
देवदार के जंगल। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के जंगलों में इस साल देवदार के पेड़ों में परागण करने वाले नर शंकु (मेल कोन्स) का निर्माण नहीं हुआ। इससे पराग कण भी नहीं निकले हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह असामान्यता जलवायु परिवर्तन के कारण पौधों के प्राकृतिक चक्र में आई गंभीर गड़बड़ी को दर्शाती है। देवदार पेड़ों की परागण प्रक्रिया में मेल कोन्स मुख्य भूमिका निभाते हैं जो हर साल अक्तूबर के आरंभ में परिपक्व होकर पीले पराग कण छोड़ते हैं।

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यह पराग हवा के साथ मादा शंकुओं तक पहुंचकर प्रजनन चक्र को पूरा करता है और नए बीजों का उत्पादन संभव होता है। मेल कोन्स की अनुपस्थिति से इस साल यह पूरी प्रक्रिया बाधित हो गई है, जिससे अगले साल बीज उत्पादन में कमी आ सकती है। इस घटना को हिमालयन फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक गंभीरता से ले रहे हैं और इसे क्षेत्र की वनस्पति और जैव विविधता के लिए खतरे की घंटी मानते हैं।
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वैज्ञानिकों का है ये मानना
वैज्ञानिकों का मानना है कि देवदार पेड़ों में मेल कोन्स नहीं बनने का प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन हो सकता है। कुछ सालों में शिमला और उसके आसपास के इलाकों में मौसम में असामान्य परिवर्तन देखने को मिले हैं। तापमान में वृद्धि और लंबे सूखे की अवधि ने पौधों के प्राकृतिक चक्र में असंतुलन पैदा कर दिया है। यह असंतुलन सिर्फ देवदार तक सीमित नहीं है बल्कि सेब, बुरांस, सरसों और अन्य कृषि फसलों में भी इसका असर देखा जा रहा है। तापमान असामान्य रूप से बढ़ता है या बारिश कम होती है, तो पौधे सही समय पर परागण नहीं कर पाते। इससे उनका उत्पादन बाधित होता है। वनस्पतियों का यह प्रजनन चक्र बाधित होने से हिमाचल के जंगलों में देवदार के पेड़ों का धीरे-धीरे घटने का खतरा बढ़ सकता है। देवदार के पेड़ हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और इनका प्रजनन प्रभावित होने से वन्य जीवन और जैव विविधता में गिरावट आ सकती है।

यह भविष्य के लिए बड़ी चेतावनी
हिमालयन फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक संदीप शर्मा ने कहा कि यह कमी प्राकृतिक चक्र का एक हिस्सा हो सकती है, लेकिन इसका प्रभाव दीर्घकालिक रहा तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। देवदार के पेड़ न केवल पर्यावरण में संतुलन बनाए रखते हैं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को सहारा देते हैं। वहीं हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. पीएस नेगी ने बताया कि देवदार के पेड़ों में परागण में यह रुकावट जलवायु परिवर्तन की ओर इशारा करती है। यदि यह समस्या जारी रही तो प्रदेश के जंगलों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। कहा कि इस साल परागण में कमी से अगले साल बीज उत्पादन पर असर पड़ेगा जो वनस्पति कवर के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

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