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एमसी को झटका, अब केंद्र सरकार ने भी नहीं दी ग्रांट
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नगर निगम को हर साल केंद्र सरकार से मिलती है 30 करोड़ रुपये की डेवलपमेंट ग्रांट
क्रॉसर
मई में मिलती है पहली किस्त, अभी तक नहीं मिली
शहर में नए काम करवाने में एमसी के हाथ खड़े
तनख्वाह के लिए भी राज्य सरकार के भरोसे
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। भाजपा शासित नगर निगम को एक और झटका लगा है। प्रदेश सरकार की मर्ज एरिया ग्रांट के बाद अब केंद्र सरकार से मिलने वाली 30 करोड़ रुपये की ग्रांट भी अटक गई है। केंद्र से पैसा न मिलने के कारण कंगाली से जूझ रहे नगर निगम के पास अब नए काम करवाने के लिए पैसा तक नहीं बचा है।
हालत यह है कि करोड़ों रुपये के कामों की कई फाइलों की टेंडर प्रक्रिया फिलहाल रोक दी है। नगर निगम प्रशासन के अनुसार केंद्र सरकार की ओर से हर साल डेवलपमेंट ग्रांट के तौर पर करीब 30 करोड़ रुपये की ग्रांट जारी होती है। ग्रांट की पहली किस्त अप्रैल मई में जारी हो जाती है जबकि दूसरी किस्त साल के अंत तक मिलती है। इस बार साल खत्म होने जा रहा है लेकिन अभी तक पहली किस्त भी नहीं आई है। पैसा न मिलने के कारण नगर निगम ने पार्षदों की ओर से आए कई कामों की फाइलें होल्ड कर दी हैं।
निगम का अपना खजाना भी खाली है, ऐसे में इन कामों को करवाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। इससे पहले राज्य सरकार की ओर से शहर के नए वार्डों के लिए मिलने वाली मर्ज एरिया ग्रांट न मिलने से भी निगम को नुकसान उठाना पड़ा है। मर्ज एरिया के लिए राज्य सरकार पहले तीन करोड़ रुपये देती थी, दो साल पहले यह बजट घटाकर एक करोड़ किया था। अब इस साल यह एक करोड़ भी निगम को नहीं दिया।
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दो मदों में मिलती है केंद्रीय ग्रांट
केंद्र सरकार की ओर से मिलने वाली यह ग्रांट दो मदों टाइड और अनटाइड के तौर पर दी जाती है। दोनों के लिए 50 फीसदी बजट तय होता है। टाइड मदों का पैसा पेयजल समेत कुछेक कामों पर ही खर्च किया जा सकता है जबकि अनटाइड मद का पैसा बाकी आम कामों पर भी खर्चा जा सकता है। नगर निगम दावा कर रहा है कि शहर में काम करवाने के लिए पैसों की कमी नहीं है। स्मार्ट सिटी से करोड़ों के काम चल रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि स्मार्ट सिटी का पैसा कुछेक प्रोजेक्टों पर ही खर्च हो सकता है। बाकी काम निगम फंड से करवाए जाते हैं।
खजाना खाली, सरकार के पैसों से दे रहे तनख्वाह
नगर निगम का खजाना लगभग खाली हो गया है। राज्य सरकार की ओर से मिलने वाले अनुदान से कर्मचारियों की तनख्वाह दी जा रही है। नगर निगम के पास अब आय के तौर पर सिर्फ प्रॉपर्टी टैक्स से हर साल 15 से 20 करोड़ रुपये आ रहा है। पानी के बिलों से कंपनी कमाई कर रही है तो कूड़ा बिल से सैहब सोसायटी को पैसा दिया जा रहा है।
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क्रॉसर
मई में मिलती है पहली किस्त, अभी तक नहीं मिली
शहर में नए काम करवाने में एमसी के हाथ खड़े
तनख्वाह के लिए भी राज्य सरकार के भरोसे
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। भाजपा शासित नगर निगम को एक और झटका लगा है। प्रदेश सरकार की मर्ज एरिया ग्रांट के बाद अब केंद्र सरकार से मिलने वाली 30 करोड़ रुपये की ग्रांट भी अटक गई है। केंद्र से पैसा न मिलने के कारण कंगाली से जूझ रहे नगर निगम के पास अब नए काम करवाने के लिए पैसा तक नहीं बचा है।
हालत यह है कि करोड़ों रुपये के कामों की कई फाइलों की टेंडर प्रक्रिया फिलहाल रोक दी है। नगर निगम प्रशासन के अनुसार केंद्र सरकार की ओर से हर साल डेवलपमेंट ग्रांट के तौर पर करीब 30 करोड़ रुपये की ग्रांट जारी होती है। ग्रांट की पहली किस्त अप्रैल मई में जारी हो जाती है जबकि दूसरी किस्त साल के अंत तक मिलती है। इस बार साल खत्म होने जा रहा है लेकिन अभी तक पहली किस्त भी नहीं आई है। पैसा न मिलने के कारण नगर निगम ने पार्षदों की ओर से आए कई कामों की फाइलें होल्ड कर दी हैं।
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निगम का अपना खजाना भी खाली है, ऐसे में इन कामों को करवाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। इससे पहले राज्य सरकार की ओर से शहर के नए वार्डों के लिए मिलने वाली मर्ज एरिया ग्रांट न मिलने से भी निगम को नुकसान उठाना पड़ा है। मर्ज एरिया के लिए राज्य सरकार पहले तीन करोड़ रुपये देती थी, दो साल पहले यह बजट घटाकर एक करोड़ किया था। अब इस साल यह एक करोड़ भी निगम को नहीं दिया।
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दो मदों में मिलती है केंद्रीय ग्रांट
केंद्र सरकार की ओर से मिलने वाली यह ग्रांट दो मदों टाइड और अनटाइड के तौर पर दी जाती है। दोनों के लिए 50 फीसदी बजट तय होता है। टाइड मदों का पैसा पेयजल समेत कुछेक कामों पर ही खर्च किया जा सकता है जबकि अनटाइड मद का पैसा बाकी आम कामों पर भी खर्चा जा सकता है। नगर निगम दावा कर रहा है कि शहर में काम करवाने के लिए पैसों की कमी नहीं है। स्मार्ट सिटी से करोड़ों के काम चल रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि स्मार्ट सिटी का पैसा कुछेक प्रोजेक्टों पर ही खर्च हो सकता है। बाकी काम निगम फंड से करवाए जाते हैं।
खजाना खाली, सरकार के पैसों से दे रहे तनख्वाह
नगर निगम का खजाना लगभग खाली हो गया है। राज्य सरकार की ओर से मिलने वाले अनुदान से कर्मचारियों की तनख्वाह दी जा रही है। नगर निगम के पास अब आय के तौर पर सिर्फ प्रॉपर्टी टैक्स से हर साल 15 से 20 करोड़ रुपये आ रहा है। पानी के बिलों से कंपनी कमाई कर रही है तो कूड़ा बिल से सैहब सोसायटी को पैसा दिया जा रहा है।