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बीएससी नर्सिंग की छात्राओं ने ली अंगदान करने की शपथ
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सिस्टर निवेदिता कॉलेज में कार्यक्रम आयोजित, अंग निकालने से शरीर नहीं होता क्षत विक्षत : डॉ. यशपाल
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। आईजीएमसी के सिस्टर निवेदिता गवर्नमेंट नर्सिंग कॉलेज में शुक्रवार को स्टेट आर्गन एंड टिशु ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (सोटो) की प्रदेश इकाई की ओर से अंगदान विषय पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया।
कार्यक्रम में बीएससी नर्सिंग द्वितीय वर्ष की 55 छात्राओं ने अंगदान करने की शपथ ली। आई बैंक के डॉ. यशपाल रांटा ने नर्सिंग छात्राओं को अंग दान के बारे में जागरूक किया। उन्होंने बताया कि लोग मृत्यु के बाद भी अपने अंगदान करके जरूरतमंद का जीवन बचा सकते हैं। डॉ. यशपाल ने बताया कि हृदय को 4 से 6 घंटे, फेफड़े को 4 से 8 घंटे, इंटेस्टाइन को 6 से 10 घंटे, यकृत को 12 से 15 घंटे, पैनक्रियाज को 12 से 14 घंटे और किडनी को 24 से 48 घंटे के भीतर जीवित व्यक्ति के शरीर में डाला जा सकता है।
गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और दुर्घटना में ब्रेन डेड होने होने वाले मरीजों के अंग भी दान किए जा सकते हैं। उन्होंने छात्राओं से अनुरोध करते हुए कहा कि समाज के विभिन्न वर्गों में अंगदान को लेकर जागरूकता फैलाएं। कहा कि जिस व्यक्ति के शरीर से अंगों को निकाला जाता है, उस शरीर को क्षत-विक्षत नहीं किया जाता। कॉर्निया निकालने के बाद आर्टिफिशियल आंखें मृत शरीर में लगा दी जाती है ताकि शरीर भद्दा नजर ना आए।
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अंग प्रत्यारोपण से 25 साल तक बढ़ जाता है जीवन
आईजीएमसी के प्रशासनिक अधिकारी डॉ. शोमिन धीमान ने कहा कि अंग प्रत्यारोपण वाले लाभार्थी मरीज सहजता से 20 से 25 साल तक अपना जीवन जी सकते हैं। समाज में अंगदान को लेकर अलग-अलग भ्रांतियां फैली हुई हैं। भ्रांतियों को समय रहते दूर किया जाना चाहिए। इस अवसर पर आईजीएमसी की ग्रीफ काउंसलर डॉ. सारिका, आईईसी रामेश्वरी और प्रोग्राम अस्सिटेंट भारती कश्यप मौजूद रहीं।
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संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। आईजीएमसी के सिस्टर निवेदिता गवर्नमेंट नर्सिंग कॉलेज में शुक्रवार को स्टेट आर्गन एंड टिशु ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (सोटो) की प्रदेश इकाई की ओर से अंगदान विषय पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया।
कार्यक्रम में बीएससी नर्सिंग द्वितीय वर्ष की 55 छात्राओं ने अंगदान करने की शपथ ली। आई बैंक के डॉ. यशपाल रांटा ने नर्सिंग छात्राओं को अंग दान के बारे में जागरूक किया। उन्होंने बताया कि लोग मृत्यु के बाद भी अपने अंगदान करके जरूरतमंद का जीवन बचा सकते हैं। डॉ. यशपाल ने बताया कि हृदय को 4 से 6 घंटे, फेफड़े को 4 से 8 घंटे, इंटेस्टाइन को 6 से 10 घंटे, यकृत को 12 से 15 घंटे, पैनक्रियाज को 12 से 14 घंटे और किडनी को 24 से 48 घंटे के भीतर जीवित व्यक्ति के शरीर में डाला जा सकता है।
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गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और दुर्घटना में ब्रेन डेड होने होने वाले मरीजों के अंग भी दान किए जा सकते हैं। उन्होंने छात्राओं से अनुरोध करते हुए कहा कि समाज के विभिन्न वर्गों में अंगदान को लेकर जागरूकता फैलाएं। कहा कि जिस व्यक्ति के शरीर से अंगों को निकाला जाता है, उस शरीर को क्षत-विक्षत नहीं किया जाता। कॉर्निया निकालने के बाद आर्टिफिशियल आंखें मृत शरीर में लगा दी जाती है ताकि शरीर भद्दा नजर ना आए।
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अंग प्रत्यारोपण से 25 साल तक बढ़ जाता है जीवन
आईजीएमसी के प्रशासनिक अधिकारी डॉ. शोमिन धीमान ने कहा कि अंग प्रत्यारोपण वाले लाभार्थी मरीज सहजता से 20 से 25 साल तक अपना जीवन जी सकते हैं। समाज में अंगदान को लेकर अलग-अलग भ्रांतियां फैली हुई हैं। भ्रांतियों को समय रहते दूर किया जाना चाहिए। इस अवसर पर आईजीएमसी की ग्रीफ काउंसलर डॉ. सारिका, आईईसी रामेश्वरी और प्रोग्राम अस्सिटेंट भारती कश्यप मौजूद रहीं।