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बिलासपुर: डीजे के शोर में गुम हो गए होली के पारंपरिक फाग गीत, समय के साथ बदला अंदाज

Tue, 03 Mar 2026 05:00 AM IST
Krishan Singh अनिल ठाकुर, संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर।
अनिल ठाकुर, संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर। Published by: Krishan Singh Updated Tue, 03 Mar 2026 05:00 AM IST
सार

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में होली का स्वरूप पारंपरिक रंग छोड़ आधुनिकता की ओर बढ़ गया है। 

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Bilaspur: Traditional Holi songs lost in the noise of DJ, style changed with time
बरमाणा के लघट में महिलाओं ने गाए फाग गीत गाती । - फोटो : संवाद

विस्तार

समय के साथ होली का अंदाज बदला है। हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में होली का स्वरूप पारंपरिक रंग छोड़ आधुनिकता की ओर बढ़ गया है। सबसे बड़ा बदलाव पारंपरिक फाग गीतों की जगह डीजे संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के रूप में देखा जा रहा है। पहले महिलाओं की टोलियां होली के दिन इन गीतों को गाती थीं। पुरुष और बच्चे भी ढोल की थाप पर गांव-गांव घूमकर इस उत्सव को मनाते थे। अब यह संस्कृति लुप्त होती जा रही है। यह टोलियां न के बराबर ही दिखती हैं। पहले होली का मतलब ढोलक की थाप, मंजीरे की झंकार और फाग गीतों की मधुर स्वर लहरियां होती थी। आंगन में बैठकर गीत गाए जाते, बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता और फिर गुलाल लगाया जाता। गीतों में हास्य, व्यंग्य और लोक संस्कृति की झलक मिलती थी। होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का प्रतीक हुआ करती थी। घरों में मालपुआ, जलेबी, पकौड़े और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते। अब यह सब गायब है।

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अब ढोलक और फाग की जगह बड़े स्पीकर और डीजे सेट ने ले ली है। बिलासपुर शहर के पूर्णम मॉल परिसर और छात्र पाठशाला मैदान, घुमारवीं के पुराने बस स्टैंड जैसे गिने चुने स्थानों पर युवा डीजे की धुनों पर रंगों के साथ झूमते नजर आते हैं। फिल्मी गीतों, रीमिक्स और पंजाबी बीट्स पर होली मनाना युवाओं के लिए आकर्षण बन गया है। सोशल मीडिया का प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई देता है। युवा सेल्फी, रील्स और वीडियो बनाकर त्योहार को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर साझा कर रहे हैं। अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी मोटरसाइकिल जुलूस निकालने का चलन बढ़ गया है। हालांकि, कुछ गांवों में आज भी महिलाएं फाग गीतों की परंपरा को जीवित रखने का प्रयास कर रही हैं। बुजुर्गों का मानना है कि त्योहार की आत्मा उसकी परंपराओं में बसती है। यदि फाग गीत, ढोलक और सामूहिक बैठकों की परंपरा समाप्त हो गई तो होली केवल रंगों और शोर तक सीमित रह जाएगी। संवाद
 

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अब डीजे का शोर ज्यादा
पहले ढोलक की थाप पर हम सब फाग गाते थे। अब डीजे का शोर ज्यादा है। बच्चों को हमारी परंपरा भी सिखानी चाहिए। होली भाईचारे और अपनेपन का त्योहार है। बच्चों को आधुनिकता के साथ अपनी संस्कृति को लेकर चलना जरूरी है।- सुनीता देवी,भदरोग

गांव की चौपाल वाली होली की बात ही अलग थी। आज बदलाव आ गया है, पर परंपरा बची रहनी चाहिए। अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि वो अपने बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़कर रखें। -सुरेश कुमार, बिनौला

डीजे के साथ होली मनाना मजेदार होता है। हम लोग हर्बल रंगों का इस्तेमाल भी कर रहे हैं और पानी की बचत का ध्यान रखते हैं। समय के साथ चलना युवा पीढ़ी जानती है। त्योहार का मकसद वही है, सिर्फ उसे मनाने का सलीका बदला है।- अभिषेक ठाकुर

नई और पुरानी होली दोनों की अपनी खूबसूरती है। अगर दोनों का संतुलन रहे तो त्योहार और भी सुंदर लगेगा। पुरानी और नई पीढ़ी दोनों को संतुलन बनाकर चलना जरूरी है।- इंजीनियर अश्विनी सुहील

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