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बागवानों को बड़ी राहत, बगीचों में संक्रमण खत्म करेगा अमेरिकी रसायन

Sat, 25 Mar 2017 11:11 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला Updated Sat, 25 Mar 2017 11:11 PM IST
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Big relief for apple growers, govt nod for import of chloropicrin gas

हिमाचल के लाखों बागवानों को बड़ी राहत मिलने वाली है। भारत सरकार की मंजूरी के बाद अब सेब, नाशपाती और गुठलीदार फलों के बगीचों की मिट्टी में कई तरह के संक्रमण को तरल गैस खत्म करेगी। केंद्र सरकार ने अमेरिका की कंपनी ट्रिनिटी मैन्युफेक्चरिंग से क्लोरोपिकरिन रसायन के आयात करने को हिमाचल सरकार को मंजूरी दे दी है। इस रसायन के प्रयोग में इस्तेमाल होने वाली मशीनरी और उपकरण भी आयात किए जा रहे हैं।

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यह आयात एचपीएमसी के माध्यम से होगा। पुराने बगीचों को उखाड़ने के बाद नए बगीचे लगाने की प्रक्रिया में इस तरल गैस का इस्तेमाल होगा तो इससे स्पेस्फिक एप्पल रेपलेंट डिजीज का खात्मा किया जा सकेगा। राज्य सरकार ने यह मंजूरी भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के केंद्रीय कीटनाशी बोर्ड से ली है। यह जानकारी प्रधान सचिव बागवानी जेसी शर्मा ने दी है। उन्होंने कहा कि यह रसायन भारत में पंजीकृत नहीं है, इसलिए मिट्टी उपचार के लिए इसका आयात या उत्पादन अब तक नहीं किया सकता था। 
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जेसी शर्मा ने कहा कि इसे बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी सोलन के लिए परीक्षण उपलब्ध करवाया जा सकेगा। क्लोरोपिकरिन रसायन का प्रयोग सेब के बगीचों में दोबारा रोपण के दौरान गंभीर रोगों को रोकने के लिए किया जाता है। विश्व भर में उपयोग किया जाने वाला क्लोरोपिकरिन स्पेस्फिक एप्पल रेपलेंट डिजीज (एसएआरडी) के खिलाफ लड़ने वाला प्रभावशाली और उत्कृष्ट रसायन है। 1,134 करोड़ रुपये की विश्व बैंक पोषित हिमाचल प्रदेश बागवानी विकास योजना के तहत देश में रसायन के
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पंजीकरण के लिए जरूरी कदम उठाए गए हैं। केंद्र सरकार की ओर से क्लोरोपिकरिन रसायन के आयात की मंजूरी देने के बाद अब वर्तमान वर्ष में शिमला, सोलन और कुल्लू जिलों में इसे प्रयोग के लिए उपलब्ध करवाया जाएगा। इस फैसले से भारत में इस रसायन के पंजीकरण का मार्ग भी प्रशस्त होगा। शिमला, कुल्लू और मंडी जिलों के बागवानों के पुराने और जीर्ण बगीचों में नई किस्मों एवं रूट स्टॉकों को लगाने की जरूरत है। 


स्टील के सिलेंडरों में विदेशों से आएगी तरल गैस
यह रसायन तरल गैस के रूप में स्टील के सिलेंडरों में आयात की जाएगी। बगीचों में इसका प्रयोग मिट्टी में डेढ़ से दो फुट तक गहरा इंजेक्ट करके किया जाएगा। इसका इस्तेमाल हिमाचल सरकार की ओर से अधिकृत अधिकारी की देखरेख में ही होगा। मानव शरीर को नुकसान पहुंचने के मद्देनजर इसके इस्तेमाल को बड़ी सावधानी से करना होगा।

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