ज्वालामाई की आग बुझा कर मंदिर को बनाया खंडहर
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आपको ये सुनकर हैरानी जरूर होगी लेकिन ऐसी मान्यता है कि हिमाचल के कांगड़ा स्थित मां ज्वाला से भी बड़ी एक और ज्वालामाई थी। इसकी लपटें कहीं बड़ी और ताकतवर थी। कई किताबों में भी इसका उल्लेख किया गया है।
कई लोग इसे हिमाचल के कांगड़ा स्थित मां ज्वालाजी की बड़ी बहन या बड़ी ज्वालामाई कहा करते थे। यहां भी काफी संख्या में श्रद्घालु पहुंचते थे। लोगों की आस्था काफी गहरी थी। हिमाचल की ज्वालाजी के बारे में कहा जाता है कि अकबर ने खुद ब खुद लगातार जलने वाली मां की ज्वाला को बुझाने का प्रयास किया था।
उसने लोहे के सात बड़े तवों से यहां आग की लपटों को बुझाने की कोशिश की थी। मगर वह नाकाम रहा था। आखिरकार उसने सोने का छत्र मां को समर्पित किया और खुद भी मां के चमत्कार को मानने लगा था। मगर दूसरी ज्वालामाई के साथ कुछ और ही हुआ।
रूस के बाकू में थी ज्वालामाई
हम जिसकी बात कर रहे हैं वो ज्वालामाई रूस के बाकू में थी। इसे बाकू की ज्वालामाई भी कहा जाता था। अजरबैजान स्थित इस ज्वालामाई की लपटें बेहद विशालकाय होती थी। हिंदू लोगों की आस्था इस ज्वालामाई में बेहद गहरी थी।
17वीं और 18वीं शताब्दी के बीच ये ज्वालामाई बेहद विख्यात थी। पाकिस्तान, भारत समेत एशिया के विभिन्न क्षेत्रों से हिंदू इस पवित्र स्थल की यात्रा पर जाते थे। मगर क्योंकि ये प्राकृतिक गैस के भंडार वाला क्षेत्र था इसलिए यहां गैस निकालने का काम शुरू हो गया।
बड़े पैमाने पर गैस का दोहन होने लगा। सोवियत शासनकाल में बोलशेविक को लगा कि ज्वालामाई की ये लपटें इस गैस क्षेत्र के लिए खतरनाक है।
ऐसे खत्म हो गई बाकू की ज्वालामाई
सोवियत शासन में फैसला लिया गया कि यदि इस ज्वालामाई को ऐसे ही रखा गया तो इससे बड़ा हादसा हो सकता है। यहां गैस का दोहन और बढ़ाया गया और ज्वालामाई की लपटों को भी बुझा लिया गया।
ये लपटें इसलिए भी बुझ गई क्योंकि जो गैस ज्वालामाई के गुबंदों में पहुंचती थी वो खत्म हो गई थी। कहा जाता है कि 1969 के आसपास ये ज्वाला पूरी तरह खत्म हो गई। इस क्षेत्र को म्यूजियम में तबदील कर दिया गया।
आज बाकू की ज्वालामाई पूरी तरह खत्म की जा चुकी है। यहां से गैस की एक मेन पाइप लाइन बाकू शहर के लिए जोड़ी गई है।
मां ज्वाला को नहीं बुझा पाया था अकबर
वहीं, हिमाचल की मां ज्वाला के बारे में कुछ और मान्यता है। कहा जाता है कि अकबर ने जब मां ज्वालाजी की ख्याति सुनी तो वह भी यहां आ पहुंचा। उसने इस मंदिर को तोड़ने और आग की लपटों को बुझाने की कोशिश की।
लेकिन वह इसमें पूरी तरह नाकाम हुआ। अकबर भी हैरान था। उसने मां की शक्ति को मान लिया और माफी मांगते हुए वापस भी चला गया। इसी तरह कई और राजाओं ने भी मां ज्वाला की लपटों की शक्ति न मानते हुए इसे बुझाने की कोशिश की मगर सभी नाकाम हुए।
आज लोगों की इस मंदिर में इतनी आस्था है कि दूर दूर से लोग यहां आते हैं। मा ज्वाला आग के रूप में हमेशा अपने भक्तों को दर्शन देती है।