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जलवायु परिवर्तन का खतराः हिमाचल में इन इलाकों की ओर शिफ्ट हो रहा सेब बागवानी क्षेत्र

Wed, 29 Nov 2017 09:23 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला Updated Wed, 29 Nov 2017 09:23 AM IST
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apple belt shifting to upper area in himachal due to global warming

देशभर के कुल सेब उत्पादन की 21.53 फीसदी पैदावार करने वाले हिमाचल में सेब बागवानी बड़ा संकट झेल रही है। जलवायु परिवर्तन की वजह से हर साल सेब के चिलिंग आवर में छह घंटे की कमी हो रही है। 

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सोलन नौणी विश्वविद्यालय के पर्यावरण शिक्षा विभाग के प्रमुख प्रोफेसर एसके भारद्वाज ने यह बात मंगलवार को होटल हॉलीडे होम में प्रदेश सरकार की ओर से जलवायु परिवर्तन पर आयोजित राज्य स्तरीय मीडिया कार्यशाला के दौरान कही। 
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भारद्वाज ने कहा कि न सिर्फ चिलिंग आवर में कमी आ रही है बल्कि जलवायु परिवर्तन की वजह से धीरे-धीरे सेब बागवानी का क्षेत्र ऊंचाई वाले इलाकों की ओर शिफ्ट हो रहा है। 
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भले ही पिछले सालों में प्रदेश के ज्यादा क्षेत्रों में लोगों ने सेब बाग लगाए लेकिन गुणवत्ता और पैदावार के लिहाज से सेब की बागवानी के लिए जलवायु परिवर्तन खतरा बना हुआ है। जलवायु परिवर्तन का ही नतीजा है कि ओलावृष्टि बढ़ रही है।

कृत्रिम झीलें बनी लोगों के लिए खतरा

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हिमकास्ट के वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. एसएस रंधावा ने बताया कि किस तरह जलवायु परिवर्तन की वजह से ग्लेशियर पिघल रहे हैं और कृत्रिम झीलें बन रही हैं जो लोगों के लिए खतरा बन गया है। 

प्रदेश के पर्यावरण, विज्ञान एवं तकनीकी विभाग, सेंटर फॉर मीडिया स्टडीस, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय व जर्मन एजेंसी फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन (जीआईजेड) की ओर से आयोजित संयुक्त कार्यशाला की शुरुआत पर्यावरण, विज्ञान व तकनीकी विभाग की निदेशक अर्चना शर्मा ने स्टेट एक्शन प्लान बनाने

की जानकारी के साथ की। पर्यावरण विज्ञान व तकनीकी विभाग के प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. सुरेश अत्री ने जलवायु परिवर्तन पर बने प्रदेश एक्शन प्लान व सरकार के प्रयासों की जानकारी दी। इसके बाद मीडिया से जुड़े लोगों ने कार्यशाला के अंतिम सेशन में अपने अनुभव साझा किए।

दस वर्ष से बर्फबारी में भारी कमी

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मौसम विज्ञान केंद्र शिमला के निदेशक डॉ. मनमोहन सिंह ने बताया कि हिमाचल में जलवायु परिवर्तन की वजह से लगातार बर्फबारी के ट्रेंड और तापमान में बदलाव आ रहा है। पिछले दस सालों में बर्फबारी में भारी कमी तो आई है, साथ ही बर्फबारी के दायरे में आने वाले क्षेत्र भी कम हो रहे हैं। 

स्टेट एक्शन प्लान का प्रसार करने पर जोर
कार्यशाला के दौरान जीआईजेड के वरिष्ठ पॉलिसी सलाहकार कीर्तिमान अवस्थी ने हैरानी जताई कि राज्य सरकार की ओर से तैयार किए गए स्टेट एक्शन प्लान के बारे में मीडिया तक को जानकारी नहीं है।

ऐसी कोई भी रणनीति तब तक काम नहीं कर सकती जब तक उसे मीडिया और उसके जरिये आम लोगों तक न पहुंचाया जा सके। उम्मीद जताई कि यह प्लान ही नहीं बल्कि ज्यादा से ज्यादा जानकारी व डाटा मीडिया के साथ साझा कर लोगों को जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए सकारात्मक तरीके से काम करना चाहिए।

सेब पर जलवायु परिवर्तन का असर

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- 1995 से जलवायु परिवर्तन के चलते किन्नौर के 2200-2500 मीटर ऊंचाई पर पहुंची सेब बागवानी।
- बीस साल में 9.40 टन प्रति हेक्टेयर घटा सेब का उत्पादन।
- जलवायु परिवर्तन से छोटा हुआ सेब का आकार।
- चिलिंग आवर्स घटने से सेब की गुणवत्ता पर भी पड़ा असर।
- शिमला, कुल्लू, चंबा, किन्नौर व स्पिति के ऊंचाई वाले इलाकों तक सीमित हो गया सेब का उत्पादन।
- जलवायु परिवर्तन के चलते 1500-2000 मीटर की ऊंचाई भी सेब बागवानी के लिए नहीं रही मुफीद।
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