फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Amar Ujala samvad karyakram held in Shimla, folk singers Sarla Dangi and Roshni Sharma enthralled the audience

Amar Ujala Samvad Shimla: खुद को खोज आगे बढ़ें महिलाएं, रूढ़ियों को तोड़कर नए रास्ते तलाशने होंगे

Fri, 07 Mar 2025 04:36 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Fri, 07 Mar 2025 04:36 PM IST
सार

अमर उजाला की ओर से गुरुवार को शिमला कार्यालय में 'साहित्य, कला एवं संस्कृति में महिलाओं की भागीदारी एवं भूमिका' विषय पर संवाद का आयोजन किया गया।

विज्ञापन
Amar Ujala samvad karyakram held in Shimla, folk singers Sarla Dangi and Roshni Sharma enthralled the audience
शिमला में हुआ अमर उजाला का संवाद कार्यक्रम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल में महिलाएं सृजन के जरिये समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। रूढियों को तोड़ कई महिलाओं ने मिसाल पेश की है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य पर अमर उजाला कार्यालय शिमला में आयोजित संवाद में साहित्य, कला एवं संस्कृति के क्षेत्र उल्लेखनीय काम कर रही प्रदेश की महिलाओं ने आधी आबादी की मजबूती के लिए कई संदेश दिए। कहा- स्त्री को कोई आगे नहीं बढ़ा सकता, उसे खुद बढ़ना होगा। रूढि़यों को तोड़ नए रास्तों को तलाशना होगा। घर की जिम्मेदारी के साथ नई पौध को नशे जैसी बुराइयों से बचाने के लिए भी आगे आना होगा। इस संवाद में साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में नाम कमाने वाली कई हस्तियों ने हिस्सा लिया।

विज्ञापन


विज्ञापन


खुद के अनुभव से लिखने की हिम्मत जुटाएं
लेखिका-शिक्षिका डॉ. कामायनी बिष्ट ने कहा कि प्रतिरोध, विरोध और कुरीतियों पर लेखन के बाद हिमाचल की महिला साहित्यकारों को स्त्री विमर्श पर अभी बहुत कुछ लिखना बाकी है। सेकेंड हैंड अंडरस्टैंडिंग के बजाय खेद अनुभव से लिखने की हिम्मत जुटा समाज को संदेश देना होगा। वरना फेसबुक पर वाहवाही लेते ही रह जाएंगी।
विज्ञापन
विज्ञापन




महिलाओं का चेतना संपन्न होना जरूरी
लेखिका डॉ. देवकन्या ठाकुर ने कहा कि हिमाचल में जिन विषयों पर नहीं लिखा गया, उन विषयों पर लिखना जरूरी है। महिला लेखक समय चुरा कर लिखती हैं। लेखन यथार्थवादी होना चाहिए। अभी भी महिलाएं हर महीने पांच दिन की बंदिश झेल रही हैं। महिलाओं को चेतना संपन्न होना जरूरी है।

घर के काम का भी जीडीपी में हो आकलन
साहित्यकार-अनुवादक डा. मीनाक्षी एफ. पॉल ने कहा कि स्त्री विमर्श को विदेश विशेषकर वामपंथ से जोड़ा जाता है। यह आदिकाल से ही महत्वपूर्ण रहा है। यह भीलनी का आत्मविश्वास ही था कि उसने प्रभु राम को जूठे बेर खिला दिए। द्रौपदी और सीता हमारे स्त्री विमर्श के उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि घर के काम का भी जीडीपी में आकलन होना चाहिए। इसके एवज में महिलाओं को सम्मान मिलना चाहिए।



किसी स्थिति में भुना चना न बनें महिलाएं
कवयित्री-लेखिका डॉ. श्वेता मिश्रा ने कहा कि महिलाओं को खुद को खोजना होगा, खुद के साथ ईमानदारी रखनी होगी और हमेशा अपने साथ संभावनाएं रखनी होंगी। श्वेता ने कहा कि हमें अपनी हदें खुद तय करनी हैं। हमें कच्चा चना बनना है जो पेड़ बन सकता है, न कि भुना चना जो संघर्षों की तपिश में जल जाता है।

सोशल मीडिया से महिलाओं के जीवन में बदलाव
लेखिका दीप्ति सारस्वत ने कहा कि मोबाइल, सोशल मीडिया और प्लाजो ने महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। तीन देवियों में मां सरस्वती इसलिए अधिक व्यापक हैं, क्योंकि वह बंधन से मुक्त हैं। महिला आज भी मासिक धर्म जैसी पुरानी रूढि़यों में जकड़ी हुई है। पुरानी रूढि़यों को छोड़ना होगा और नए को अपनाना होगा।



नई पीढ़ी को जागरूक करना जरूरी
साहित्य संपादन से जुड़ीं वंदना भागड़ा ने कहा कि सामाजिक बदलाव के लिए अगली पीढ़ी को जागरूक करना बेहद जरूरी है। बच्चों को भाषण नहीं चाहिए, उनकी चर्चा में सहभागिता बढ़ानी होगी और साहित्य से जोड़ना होगा। इसमें महिलाओं की विशेष भूमिका रहेगी।

लोकगायन से दें नशे के खिलाफ संदेश
लोकगायिका गीता भारद्वाज ने कहा कि एक समय मैंने भी प्रचलित लोकगीत इक आधिया मंगाई जा रे गीत भी गाया, लेकिन एक बेटी की मां बनने के बाद समझ रहीं हूं कि युवा पीढ़ी को नशे से बचाना कितना जरूरी है। आज लड़कियां भी चिट्टे के दलदल में फंस चुकी हैं। लोकगायन की जरिये नशे के खिलाफ संदेश देना होगा।



मिट्टी से जुड़े रहना ही हमारी पहचान
लेखिका स्नेह नेगी ने कहा कि पुरानी पीढ़ी गांव की थी, नई पीढ़ी फ्लैट की होकर रह गई है। मिट्टी से जुड़ कर ही हमारी अलग पहचान बन सकती है। किन्नौर में काश्त कम होने के कारण बहुपति प्रथा का प्रचलन था तो भी अंडरस्टैंडिंग अच्छी थी। आज विरोधाभास देखिए कि न्यूक्लियर परिवार हैं तो भी वे टूट रहे हैं। महिलाएं बच्चों को पढ़ाने के लिए अपनी मिट्टी से दूर हो रही हैं।

रंगमंच ने भी बदला परिदृश्य
रंगकर्मी श्रुति रोहटा ने कहा कि थियेटर आज महिलाओं की आवाज बन रहा है। थियेटर के माध्यम से महिलाओं की कहानियां समाज के सामने आ रही हैं। पहले रामलीला में भी महिलाओं के किरदार पुरुष निभाते थे। अब परिदृश्य बदल रहा है।

तुम बढ़ते रहे, मैं घटती रही
लेखिका मधु शर्मा कात्यायनी ने कहा कि आज भी एक महिला को गोष्ठी में जाने के लिए पति की आज्ञा लेनी पड़ती है। उन्होंने दीप्ति सारस्वत की एक कविता की पंक्ति सुनाई - तुम बढ़ते रहे, मैं घटती रही...। उन्होंने कहा कि महिलाओं का अपने पांवों पर खड़ा होना और आर्थिक रूप से सशक्त होना बहुत जरूरी है।

बराबरी का मिले हक, हर दिन महिला दिवस
लेखिका डॉ. कौशल्या ठाकुर ने कहा कि वैदिक काल से स्त्री पूजनीय है। वैदिक काल में महिलाएं शास्त्रार्थ भी करती थीं और कुशल गृहिणी भी थीं। नारियों का सम्मान था, बराबरी का दर्जा था। अब भी बराबरी का अधिकार दिया जाना चाहिए। महिला दिवस महज 8 मार्च को ही नहीं, हर दिन होना चाहिए।



बेटियां बन रही हैं परिवार का संबल
लेखिका वंदना राणा ने कहा कि महिलाओं के उत्थान के लिए उनका आत्मनिर्भर होना और आत्मविश्वासी होना जरूरी है। महिलाओं को जहां परिवार का सहयोग मिल रहा है, वहीं वे साहित्य सृजन कर रही हैं। स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं। नशा बेटों को बर्बाद कर रहा है और बेटियां परिवार का संबल बन रही हैं।

लोकगायन से सामाजिक बदलाव के प्रयास
लोकगायिका शारदा शर्मा ने कहा कि 50 रुपये प्रति प्रोग्राम से शुरू हुआ उनका सफर डेढ़ लाख रुपये के स्टेज शो तक पहुंचा। बच्चे होने पर मां के संघर्ष के साथ आगे बढ़ी। बच्चों को भी बड़ा किया और गायकी में भी खुद को आगे बढ़ाया। वह लोकगायकी से सामाजिक बदलाव के लिए आज भी प्रयासरत हैं। नशे के खिलाफ अभियान की जरूरत है।

खुद के लिए समय निकालना जरूरी
नृत्यकला में निपुण रिचा अवस्थी ने कहा कि जब उन्होंने नृत्य को बतौर प्रोफेशन चुना तो कहा गया कि क्या घटिया व्यवसाय चुना है, लेकिन मां ने साथ दिया। शादी हुई तो पति ने सहयोग दिया। घर में समस्याएं हैं लेकिन मंच पर भाव अलग दिखाने पड़ते हैं। खुद के लिए समय निकालना पड़ता है।

बच्चे होने के बाद खोले पंख
लेखिका राधा सिंह ने कहा कि सालों तक परिवार की जिम्मेदारी उठाती रहीं, बच्चे होने के बाद लगा कि मुझे भी पंख खोलने हैं। इसके बाद साहित्य सृजन के माध्यम से अपने उद्गारों को शब्द दिए। महिलाओं को सशक्त होना पड़ेगा।

लोगों के तानों के बीच पिता ने बढ़ाया आगे
लोकगायिका रोशनी शर्मा ने कहा कि छठी कक्षा से गायन का शौक था। स्कूल में थीं तो ढोलक भी बजाई। गीत संगीत में शौक के लिए ताने सुनने पड़े, लेकिन पिता ने कहा कि संगीत तीसरी विद्या है। इसके बाद एक के बाद एक पांच ऑडियो निकाले, जिन्हें लोगों ने बहुत प्यार दिया। उन्होंने बतौर लोकगायकी आर्थिक शोषण होने की भी बात उठाई।

मेरी सफलता के पीछे पति का हाथ
लोकगायिका सरला दांगी ने कहा - लोग कहते हैं कि सफल पुरुष के पीछे महिला का हाथ होता है। मेरी सफलता के पीछे पुरुष का हाथ रहा है। यानी मेरे पति का सहयोग रहा है। उन्होंने मुझे मंच पर खड़े होने का साहस मिला। पति गीतकार हैं, बड़े-बड़े गायकों के लिए लिखते हैं, मुझे भी गीत गाने के लिए प्रेरित किया। मेरे भाई कुलदीप शर्मा के साथ कोरस गाती थी। उन्होंने लोकसंगीत से जोड़ा।

खुद के उत्थान के साथ नई पीढ़ी को बचाना होगा
लोकगायिका आशा कंवर ने कहा कि महिलाओं को खुद ही आगे बढ़ना होगा। जब तक वे आगे नहीं आएंगी, उन्हें हाथ पकड़कर कोई आगे नहीं बढ़ाएगा। महिलाओं को खुद के उत्थान के साथ नशे के दलदल में धंसती अगली पीढ़ी को भी बचाना है। बच्चों को बचाने की जिम्मेवारी भी महिलाओं की है।

आत्मविश्वास ही पांव पर खड़ा करेगा
लोकगायिका रेणु भारद्वाज ने कहा कि लड़कियों के लिए सपोर्ट सिस्टम बहुत जरूरी है। उनका आत्मविश्वासी होना भी बहुत आवश्यक है। तभी वे सही मायने में स्वतंत्र और अपने पांवों पर खड़ी हो सकती हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed