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Shimla News: अक्षय तृतीया पर 24 साल बाद बना अक्षय योग

Tue, 29 Apr 2025 11:59 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Tue, 29 Apr 2025 11:59 PM IST
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Akshay Yoga is formed after 24 years on Akshaya Tritiya
शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर बिना मुहूर्त देख पूरा दिन लोग कर सकते हैं खरीदारी और धार्मिक कार्य
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चंद्रमा, गुरु के साथ युति करके बनाएंगे गज केसरी योग
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। अक्षय तृतीया वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर बुधवार 30 अप्रैल को मनाई जाएगी। वैदिक पंचांग के अनुसार इस अक्षय तृतीया पर 24 साल बाद अक्षय योग और गजकेसरी योग बन रहे हैं जोकि अत्यंत शुभ हैं। इस दिन हर मुहूर्त शुभ होता है इस अवसर पर माता लक्ष्मी की पूजा अर्चना और मांगलिक कार्य करना शुभ होता है।

इससे पहले 2001 में ऐसे योग बने थे। चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में गुरु के साथ युति करके गजकेसरी योग भी बना रहा है। अक्षय तृतीय तिथि अबूझ मुहूर्त होती है, यानी इस दिन कोई भी मांगलिक कार्य विवाह संस्कार, गृह प्रवेश, आभूषण खरीदारी, वाहन खरीदना बिना मुहूर्त देखे हो सकते हैं। इस दिन मां लक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा करने, घी का दीपक जलाने, कमल का फूल अर्पित करने और खीर का भोग लगाने से विशेष कृपा प्राप्त होती है। साथ ही ओम श्रीं महालक्ष्म्यै नम: मंत्र का जाप करने से धन और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। भविष्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया पर दान पुण्य अक्षय बन जाता है। साथ ही इस दिन किया गया पाप भी अक्षय बन जाता है।
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सुबह 6:10 से दोपहर 12:35 बजे तक अत्यंत शुभ मुहूर्त
गंज बाजार स्थित राधा-कृष्ण मंदिर के पंडित उमेश चंद्र नौटियाल ने बताया कि वैदिक पंचांग के अनुसार इस दिन किसी भी समय कोई शुभ कार्य किया जा सकता है लेकिन सुबह 6:10 से दोपहर 12:35 बजे तक अत्यंत शुभ मुहूर्त है। उन्होंने बताया कि इसी पावन दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी का जन्म हुआ था जिससे यह दिन और भी पुण्यकारी बन जाता है।
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जैन धर्म में अक्षय तृतीया का महत्व
अक्षय तृतीया हिंदू धर्म और जैन धर्म के लिए सबसे शुभ दिनों में से एक है। शिमला की श्वेतांबर जैन सभा के सचिव कुलभूषण जैन ने बताया कि इस दिन जैन धर्म के पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जिन्हें भगवान आदिनाथ के नाम से जाना जाता है ने अपना पहला आहार ग्रहण किया था। इस दिन से पहली आहार-चर्या पद्धति की स्थापना हुई जो जैन भिक्षुओं के लिए भोजन तैयार करने और परोसने की एक प्रक्रिया है। इसकी शुरुआत तब हुई जब राजा ऋषभदेव ने सबकुछ छोड़ दिया और जैन भिक्षु बन गए। मुनि ऋषभदेव ने छह महीने तक बिना भोजन और पानी के ध्यान किया। छह महीने के बाद वह आहार ग्रहण करने के लिए निकल पड़े। एक साल के बाद मुनि ऋषभदेव को हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस ने वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि यानी अक्षय तृतीया के दिन गन्ने के रस का पहला आहार दिया था। तब से अक्षय तृतीया जैन धर्म में सबसे शुभ दिन बन गया। इसके बाद मुनि ऋषभदेव पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव बने।
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