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Himachal: औषधीय व विलुप्त हो रहे पौधों से महकेंगे 75 स्कूल, विकसित होंगे हर्बल गार्डन

Mon, 07 Oct 2024 11:15 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Mon, 07 Oct 2024 11:15 AM IST
सार

प्रदेश के 75 स्कूल जल्द ही औषधीय और विलुप्त होती प्रजातियों के पौधों से महकेंगे। 

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75 schools will smell of medicinal and extinct plants, herbal gardens will be developed
स्कूल हर्बल गार्डन(फाइल) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश के 75 स्कूल जल्द ही औषधीय और विलुप्त होती प्रजातियों के पौधों से महकेंगे। हर्बल गार्डन विकसित करने के लिए आयुष विभाग ने चयनित स्कूलों को 18.75 लाख रुपये जारी कर दिए हैं। हर स्कूल को 25-25 हजार रुपये का बजट दिया है। स्कूल परिसर के 500 वर्ग मीटर भूमि पर पौधे लगाए जाएंगे। हर स्कूल को चार साल तक 7,000 रुपये का वार्षिक रखरखाव अनुदान भी मिलेगा। स्कूलों को अपने परिसरों में हर्बल गार्डन स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य औषधीय पौधों की खेती करना, उनके उपयोग के बारे में छात्रों के ज्ञान को बढ़ाना और पर्यावरण जागरूकता को बढ़ावा देना है।

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स्कूलों को हर्बल गार्डन के लिए 500 वर्ग मीटर भूमि निर्धारित करनी होगी। प्रत्येक गार्डन में स्थानीय कृषि-जलवायु क्षेत्र के आधार पर दुर्लभ, लुप्तप्राय: और संकटग्रस्त प्रजातियों सहित औषधीय पौधों की 10-15 प्रजातियां लगाई जाएंगी। छात्र औषधीय पौधों को रोपने, पानी देने और लेबल लगाने में सक्रिय रूप से भाग लेंगे। इससे उन्हें उन प्रजातियों के स्वास्थ्य लाभों के बारे में व्यावहारिक अनुभव और ज्ञान प्राप्त होगा। पर्यावरण के अनुकूल प्रथाओं को बढ़ावा देते हुए पौधों की वृद्धि को बढ़ाने के लिए वर्मी-कम्पोस्ट और जैविक उर्वरकों के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा। इस पहल में पौधों की लेबलिंग की व्यवस्था है जहां छात्र पाैधे की प्रजाति जान पाएंगे।

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किस जिले के कितने स्कूलों मंे होगा निर्माण
कांगड़ा जिले में सबसे अधिक 21, मंडी-शिमला में 8-8, कुल्लू-सोलन में 6-6, बिलासपुर-ऊना-सोलन में 5-5, चंबा-हमीरपुर में 4-4, किन्नौर में 2 और लाहौल-स्पीति जिला के एक स्कूल में हर्बल गार्डन बनाया जाएगा। स्कूलों को अभिभावक-शिक्षक संघों (पीटीए) और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के सहयोग से छुट्टियों के दौरान भी बगीचों के साल भर रखरखाव को सुनिश्चित करने का काम सौंपा है। 

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पारंपरिक चिकित्सा और पर्यावरण जागरूकता को बढ़ावा देने की दिशा में यह कदम उठाया गया है। इसका उद्देश्य छात्रों को प्रकृति की उपचार शक्ति से जोड़ने और उन्हें पारंपरिक औषधीय ज्ञान देना है। वे प्रकृति को भी जान पाएंगे।-डॉ. अमरजीत कुमार शर्मा, उच्च शिक्षा निदेशक 

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