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रवा गांव में खेत बचे न मवेशी
Updated Mon, 14 Aug 2017 10:48 PM IST
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कोटरोपी (मंडी)। कोटरोपी हादसा बस यात्रियों के साथ ही रवां और कोटरोपी गांव के लोगों को ताउम्र के जख्म दे गया है। रवां गांव में सात परिवारों के आशियाने जमींदोज हो गए हैं। 40 मवेशी मलबे में दब गए है।
इन गांवों के परिवारों का एक भी सदस्य नौकरीपेशा नहीं है। सब खेती पर निर्भर हैं। लेकिन, अब खेत ही नहीं रहे तो खेती कहां होगी। रवां गांव कोटरोपी पहाड़ी के ठीक नीचे सटा था। इस गांव के सभी परिवार खेती पर ही निर्भर थे। वहीं, एनएच से सटे कोटरोपी गांव के तीन परिवारों ने भी मकान खाली कर दिए हैं। रवां गांव के लोगों की मानें तो शनिवार दोपहर बाद उन्हें पहाड़ी दरकने का अंदेशा हो गया था। इसके बाद उन्होंने घर छोड़कर जंगल में शरण ले ली थी। लेकिन, उन्हें यह अंदाजा तक नहीं था कि इतनी बड़ी त्रासदी हो गई। उनके सारा सामान, अनाज तथा जरूरी चीजें मवेशियों समेत मलबे में तबाह हो गई हैं। बच्चों के सर्टिफिकेट तक घरों में ही रह गए थे।
हालांकि, सरकार ने इन्हें जमीन और मुआवजा देने का आश्वासन दिया है। फिलहाल इन्हें यहां से पंचायत भवन और स्कूल में शिफ्ट किया गया है। लेकिन, यहां पर कब तक इन्हें आसरा मिल पाएगा यह भी सवाल है। क्योंकि, सोमवार से स्कूल खुल जाएगा और पंचायत भवन भी इन्हें ज्यादा दिन ठहराना संभव नहीं है।
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अंदाजा नहीं था इतना भयानक होगा मंजर : राजेश
रवां गांव के युवक राजेश कुमार ने कहा कि घर से उन्हें सर्टिफिकेट निकालने का मौका तक नहीं मिला। घटना का अंदेशा हो गया था। शनिवार को दोपहर बाद ही घर छोड़ दिया था। लेकिन, यह अंदाजा नहीं था कि यह हादसा इतना भयावह और भयंकर होगा कि उन्हें मौका तक नहीं मिलेगा।
अब कहां करेंगे खेती : गोरखू राम
बेघर गोरखू राम ने कहा कि जहां खेती करते थे, वहां न खेत बचे न घर। अब पंचायत भवन और अंबेडकर भवन में कितने दिन रहेंगे। जीने का एक ही आसरा खेत थे। अब खेती कहां करेंगे।
वन में रहने नहीं देता विभाग : चूड़ी देवी
रवां गांव की चूड़ी देवी ने कहा कि जंगल से सुबह जब घर की ओर देखा तो मलबा ही नजर आया। अब कहां जाएंगे कोई पता नहीं है। जब कभी यहां पर घटना का खतरा लगता था, जंगलों में ही जाते थे। लेकिन, वन विभाग जंगल में रहने नहीं देता है।
सरकार ही एक आसरा
बुजुर्ग तोखू राम ने कहा कि हर तरफ मलबा ही नजर आ रहा है। जिन खेतों को 25 वर्षों में खून पसीने से खेती के लिए तैयार किया, आज वहां मलबा ही नजर आ रहा है। अब कहां जाएं समझ नहीं आ रहा। सरकार ही एक आसरा है। जहां जगह मिलेगी, वहां रह लेंगे।
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इन गांवों के परिवारों का एक भी सदस्य नौकरीपेशा नहीं है। सब खेती पर निर्भर हैं। लेकिन, अब खेत ही नहीं रहे तो खेती कहां होगी। रवां गांव कोटरोपी पहाड़ी के ठीक नीचे सटा था। इस गांव के सभी परिवार खेती पर ही निर्भर थे। वहीं, एनएच से सटे कोटरोपी गांव के तीन परिवारों ने भी मकान खाली कर दिए हैं। रवां गांव के लोगों की मानें तो शनिवार दोपहर बाद उन्हें पहाड़ी दरकने का अंदेशा हो गया था। इसके बाद उन्होंने घर छोड़कर जंगल में शरण ले ली थी। लेकिन, उन्हें यह अंदाजा तक नहीं था कि इतनी बड़ी त्रासदी हो गई। उनके सारा सामान, अनाज तथा जरूरी चीजें मवेशियों समेत मलबे में तबाह हो गई हैं। बच्चों के सर्टिफिकेट तक घरों में ही रह गए थे।
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हालांकि, सरकार ने इन्हें जमीन और मुआवजा देने का आश्वासन दिया है। फिलहाल इन्हें यहां से पंचायत भवन और स्कूल में शिफ्ट किया गया है। लेकिन, यहां पर कब तक इन्हें आसरा मिल पाएगा यह भी सवाल है। क्योंकि, सोमवार से स्कूल खुल जाएगा और पंचायत भवन भी इन्हें ज्यादा दिन ठहराना संभव नहीं है।
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अंदाजा नहीं था इतना भयानक होगा मंजर : राजेश
रवां गांव के युवक राजेश कुमार ने कहा कि घर से उन्हें सर्टिफिकेट निकालने का मौका तक नहीं मिला। घटना का अंदेशा हो गया था। शनिवार को दोपहर बाद ही घर छोड़ दिया था। लेकिन, यह अंदाजा नहीं था कि यह हादसा इतना भयावह और भयंकर होगा कि उन्हें मौका तक नहीं मिलेगा।
अब कहां करेंगे खेती : गोरखू राम
बेघर गोरखू राम ने कहा कि जहां खेती करते थे, वहां न खेत बचे न घर। अब पंचायत भवन और अंबेडकर भवन में कितने दिन रहेंगे। जीने का एक ही आसरा खेत थे। अब खेती कहां करेंगे।
वन में रहने नहीं देता विभाग : चूड़ी देवी
रवां गांव की चूड़ी देवी ने कहा कि जंगल से सुबह जब घर की ओर देखा तो मलबा ही नजर आया। अब कहां जाएंगे कोई पता नहीं है। जब कभी यहां पर घटना का खतरा लगता था, जंगलों में ही जाते थे। लेकिन, वन विभाग जंगल में रहने नहीं देता है।
सरकार ही एक आसरा
बुजुर्ग तोखू राम ने कहा कि हर तरफ मलबा ही नजर आ रहा है। जिन खेतों को 25 वर्षों में खून पसीने से खेती के लिए तैयार किया, आज वहां मलबा ही नजर आ रहा है। अब कहां जाएं समझ नहीं आ रहा। सरकार ही एक आसरा है। जहां जगह मिलेगी, वहां रह लेंगे।