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ऑकलैंड हाउस स्कूल के बाहर छात्र-अभिभावक मंच का प्रदर्शन
Fri, 22 Mar 2019 11:31 PM IST
अरविन्द ठाकुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
Published by: अरविन्द ठाकुर
Updated Fri, 22 Mar 2019 11:31 PM IST
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निजी स्कूलों की फीस मनमानी के खिलाफ चल रहे छात्र-अभिभावक मंच का संघर्ष अब उग्र होेने लगा है। मंच को हालांकि शिक्षा विभाग ने जल्द कदम उठाने का आश्वासन दिया है लेकिन अभिभावकों का कहना है कि उन्हें धरातल पर कार्रवाई चाहिए। शुक्रवार को मंच ने ऑकलैंड हाउस ब्वॉयज स्कूल के बाहर प्रदर्शन किया। शिक्षा विभाग के लूट को बंद करने और निजी स्कूलों पर नकेल कसने को लेकर जारी आदेशों को जमीनी स्तर पर लागू न करने पर स्कूलों के बाहर दूसरे चरण के तहत प्रदर्शन शुरू किए हैं।
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मंच के संयोजक विजेंद्र मेहरा, सह संयोजक बिंदु जोशी और फालमा चौहान की अगुवाई में जुटेे प्रदर्शनकारियों ने स्कूल प्रशासन और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। कहा कि अभिभावकों से फीस, टूअर और पिकनिक के नाम पर स्कूल प्रबंधन लूट खसोट कर रहा है। बारह से सवा एक बजे तक चले इस प्रदर्शन के दौरान प्रदेश सरकार हाय-हाय, निक्कमी सरकार हाय हाय.. नारे भी लगाए। अभिभावकों ने ऑकलैंड ब्वॉयज स्कूल की फीस बुकलेट भी मौके पर जलाई।
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मंच ने साफ किया कि यदि स्कूलों ने बढ़ाई फीस कम करने के लिए कार्रवाई न की तो आने वाले समय में आंदोलन और उग्र होगा। प्रदर्शन में बाबू राम, एचएस पंवर, नीलम, सीमा, संगीता, रामू, पवन, सुमन, कौशल्या, रीता, जसबीर, अनु, सतपाल और सन्नी सहित कई लोग शामिल हुए। मंच संयोजक ने कहा कि शिक्षा निदेशक ने 18 मार्च को निदेशालय में मंच पदाधिकारियों के साथ बैठक कर लिए फैसलों के बाद आदेश जरूर जारी किए लेकिन इन्हें जमीनी स्तर पर लागू करने तथा निजी स्कूलों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। मेहरा ने कहा कि मंच अब हर स्कूल के बाहर प्रदर्शन करेगा।
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सेंट ल्यूक्स ने बारह हजार घटाई फीस
मंच के पदाधिकारियों ने कहा कि अभिभावकों के आंदोलन के बाद शिमला में अंकुर डे स्कूल और सोलन में सेंट ल्यूक्स ने बारह हजार तक की फीस कम की है। राजधानी शिमला के बड़े नामी स्कूल ऐसा क्यों नहीं कर सकते।
शिक्षा विभाग के नियम सभी के लिए एक होते हैं। अन्य स्कूलों की फीस बढ़ोतरी को भी कम करने के लिए कार्रवाई की जाए। शिक्षा निदेशालय की 18 मार्च को अधिसूचना जारी कर फीस कम करने को कहा था। लेकिन ऑकलैंड हाउस स्कूल ने बीते रोज बुकलेट जारी कर फीस बढ़ाकर जमा करने का फरमान जारी कर दिया है। शिक्षा विभाग यदि अपने ही आदेशों को लागू नहीं कर सकता है, तो आने वाले समय में निजी स्कूल बेलगाम हो जाएंगे।
पांच करोड़ तक कमाई, शिक्षकों को नहीं पूरा वेतन
शिमला। मंच का दावा है कि प्रदेश में लगे उद्योगों में उद्योगपति भी सालाना पांच करोड़ शुद्ध लाभ नहीं कमा रहे। शहर के कई स्कूल सालभर में आठ करोड़ तक फीस वसूल लेते हैं। इनके संचालन में औसतन खर्चा तीन करोड़ तक आता है। शिक्षकों और कर्मचारियों को पूरा वेतन और डीए तक नहीं दिया जा रहा। ऐसे में स्कूल आराम से पांच करोड़ का शुद्ध लाभ कमा रहे हैं। विजेंद्र ने कहा कि अल्प संख्यकों की आड़ में स्कूल सरकारी और न्यायालय के आदेश नहीं मान रहे। राजधानी के स्कूलों में अल्पसंख्यकों के बच्चों की संख्या महज पांच फीसदी है।
विभाग के आदेशों को ठेंगा दिखा रहे स्कूल
छात्र-अभिभावक मंच की सह संयोजक बिंदु जोशी ने कहा कि शिक्षा विभाग द्वारा जारी आदेशों को निजी स्कूल नहीं मान रहे हैं। आदेश जारी कर विभाग औपचारिकता पूरी न करें, इसे सख्ती से लागू करवाना सुनिश्चित करें। प्रदेश में 1997 में निजी स्कूल संचालन को कानून बना, 2003 में इसके नियम बने, 2016 में उच्च न्यायालय ने निजी स्कूलों की लूट रोकने को आदेश जारी किए, 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया, 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने निजी स्कूलों की फीस तथा इसके संचालन के आदेश जारी किए। इन सभी आदेशों और कानूनों को शिक्षा विभाग निजी स्कूलों में लागू करवाने में नाकाम रहा है।
निजी स्कूल संचालकों की बैठक 24 को
निजी स्कूलों के संचालकों और प्रबंधकों की 24 मार्च को कालीबाड़ी हॉल में बैठक होगी। इस बैठक में निजी स्कूलों को संचालित करने में पेश आ रही दिक्कतों पर चरचा की जाएगी और इन्हें दूर करने के लिए प्रदेश सरकार के समक्ष उठाने को मसौदा तैयार किया जाएगा। हिमाचल पब्लिक स्कूल वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष दिनेश शर्मा ने कहा कि यह बैठक अहम है। इसलिए प्रदेश भर में स्कूल संचालकों से इस बैठक में भाग लेने का आवाहन किया है।
अभिभावकों को धमकाते हैं स्कूल प्रबंधक
फालमा चौहान ने कहा कि मनमानी कर रहे निजी स्कूलों के फैसलों का विरोध करने या पिकनिक, टूअर पर बच्चा न भेजने की बात करने पर निजी स्कूल अभिभावकों को दूसरे स्कूल में बच्चे को पढ़ाने की धमकी देते हैं। उन्होंने और विजेंद्र मेहरा ने कहा कि आम जनता सरकार को चुनती है, वही सरकार स्कूलों को कई तरह की रियायतें देती है। सरकार निजी स्कूलों को संचालित करने को कुछ कानून बनाती है विभाग लागू करते हैं। तो यह हर अभिभावक का हक है कि वह जहां चाहे अपने बच्चे को पढ़ाए। फीस को कम करने की वह मांग कर सकता है।