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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस : दिव्यांग बच्चों के जीवन में रंग भरने को छोड़ दी नौकरी, बोलीं- पूरा हुआ मेरा सपना
Mon, 08 Mar 2021 11:24 AM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Mon, 08 Mar 2021 11:24 AM IST
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अर्चना आडवाणी
- फोटो : अमर उजाला
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अर्चना आडवाणी ने इलेक्ट्रानिक्स से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के दौरान सोचा था कि किसी कंपनी में जॉब करके आगे बढे़ंगी। उनके मन में ऐसे लोगों की सेवा की भावना भी कहीं दबी थी, जो समाज से ठुकराए और आर्थिक रूप से कमजोर हैं, लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह लोगों के लिए क्या कर सकती हैं।
डिग्री मिलने के बाद वह एक पब्लिक स्कूल में टीचर हो गईं। उन्हें शॉपिंग का भी शौक है। इसी शॉपिंग के दौरान उन्हें एक दिन ऐसी चीज मिल गई कि उनकी दुनिया ही बदल गई। उसी दिन से वह शारीरिक व आर्थिक रूप से अक्षम ऐसे लोगों को सक्षम बनाने में जुटी हैं। इस काम के लिए उन्होंने स्कूल की नौकरी भी छोड़ दी।
अर्चना उस दिन को याद करते हुए बताती है कि आज से करीब चार वर्ष पूर्व रावतपुर क्रासिंग के पास स्थित शॉपिंग काम्प्लेक्स में वह शॉपिंग करने गई थीं। वहां पर कुछ दिव्यांग बच्चों ने अपने हाथों से बनाई चीजों का स्टाल लगा रखा था। इन बच्चाें से मिलने के बाद ही उन्होंने वहीं पर संकल्प लिया कि अब इन्हीं की सेवा में पूरा जीवन देना है।
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सभी दिव्यांग बच्चों को कॉम्प्लेक्स में स्थित आइसक्रीम पार्लर ले गईं। वह बताती है कि जिस समय बच्चे खुशी से आइसक्रीम खा रहे थे, उनकी आंखों में खुशी के आंसू तैरने लगे। जो वह सोचती थीं आज वही सब उनकी सामने था। अर्चना उसी दिन से दिव्यांग डेवलपमेंट सोसाइटी से जुड़ गईं।
उन्होंने नौकरी छोड़ दी। अब घर पर ही बच्चों की ट्यूशन लेती हैं, जो आय होती है, वे इन बच्चों की जरूरतों को पूरा करने में भी खर्च करती हैं। उनका कहना है कि दिव्यांग बच्चों को आत्म निर्भर बनाने का प्रयास सोसाइटी की तरफ से किया जाता है। यहां से प्रशिक्षित कुछ दिव्यांगों की एक रेस्टोरेंट में जॉब लगी। कुछ अपने बल पर खाद्य, सजावट व अन्य तरह की वस्तुएं बनाते हैं।
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डिग्री मिलने के बाद वह एक पब्लिक स्कूल में टीचर हो गईं। उन्हें शॉपिंग का भी शौक है। इसी शॉपिंग के दौरान उन्हें एक दिन ऐसी चीज मिल गई कि उनकी दुनिया ही बदल गई। उसी दिन से वह शारीरिक व आर्थिक रूप से अक्षम ऐसे लोगों को सक्षम बनाने में जुटी हैं। इस काम के लिए उन्होंने स्कूल की नौकरी भी छोड़ दी।
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अर्चना उस दिन को याद करते हुए बताती है कि आज से करीब चार वर्ष पूर्व रावतपुर क्रासिंग के पास स्थित शॉपिंग काम्प्लेक्स में वह शॉपिंग करने गई थीं। वहां पर कुछ दिव्यांग बच्चों ने अपने हाथों से बनाई चीजों का स्टाल लगा रखा था। इन बच्चाें से मिलने के बाद ही उन्होंने वहीं पर संकल्प लिया कि अब इन्हीं की सेवा में पूरा जीवन देना है।
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सभी दिव्यांग बच्चों को कॉम्प्लेक्स में स्थित आइसक्रीम पार्लर ले गईं। वह बताती है कि जिस समय बच्चे खुशी से आइसक्रीम खा रहे थे, उनकी आंखों में खुशी के आंसू तैरने लगे। जो वह सोचती थीं आज वही सब उनकी सामने था। अर्चना उसी दिन से दिव्यांग डेवलपमेंट सोसाइटी से जुड़ गईं।
उन्होंने नौकरी छोड़ दी। अब घर पर ही बच्चों की ट्यूशन लेती हैं, जो आय होती है, वे इन बच्चों की जरूरतों को पूरा करने में भी खर्च करती हैं। उनका कहना है कि दिव्यांग बच्चों को आत्म निर्भर बनाने का प्रयास सोसाइटी की तरफ से किया जाता है। यहां से प्रशिक्षित कुछ दिव्यांगों की एक रेस्टोरेंट में जॉब लगी। कुछ अपने बल पर खाद्य, सजावट व अन्य तरह की वस्तुएं बनाते हैं।