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राजस्थान: दुर्लभ बीमारियों के मरीजों की परेशानी पर हाईकोर्ट सख्त, केंद्र-राज्य सरकार से तीन सप्ताह में जवाब तल
Tue, 13 Oct 2026 09:09 PM IST
तरुणेंद्र कुमार चतुर्वेदी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जोधपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जोधपुर
Published by: तरुणेंद्र कुमार चतुर्वेदी
Updated Tue, 13 Oct 2026 09:09 PM IST
सार
राजस्थान हाईकोर्ट ने मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और अन्य दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों के इलाज व जांच में आ रही समस्याओं पर केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने पांच प्रमुख बिंदुओं पर तीन सप्ताह के भीतर बिंदुवार जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
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राजस्थान हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
राजस्थान हाईकोर्ट ने मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और अन्य दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों की समस्याओं पर कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने केंद्र और राज्य सरकार को दुर्लभ बीमारियों से जुड़े पांच प्रमुख बिंदुओं पर तीन सप्ताह के भीतर बिंदुवार जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
स्वावलंबन फाउंडेशन की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि 21 नवंबर, 2025 को निर्धारित पांच बिंदुओं पर दोनों सरकारों की ओर से अपेक्षित जवाब अब तक प्रस्तुत नहीं किया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सचिन आचार्य, अधिवक्ता चयन बोथरा और सार्थक आसोपा ने पक्ष रखते हुए प्रदेश में दुर्लभ बीमारियों के इलाज और जांच व्यवस्था में मौजूद गंभीर खामियों की ओर ध्यान आकर्षित किया।
जांच और उपचार केंद्रों की कमी
याचिका में बताया गया कि राजस्थान में एम्स जोधपुर को दुर्लभ बीमारियों के लिए एकमात्र सेंटर ऑफ एक्सीलेंस घोषित किया गया है। इसके बावजूद वहां आनुवंशिक जांच की समुचित सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसके कारण मरीजों को मजबूरी में निजी प्रयोगशालाओं का सहारा लेना पड़ता है।
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निजी लैब में जांच कराने से मरीजों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है और जांच रिपोर्ट मिलने में भी काफी देरी होती है। इस विलंब का सीधा असर बीमारी की सटीक पहचान और समय पर उपचार शुरू होने की प्रक्रिया पर पड़ता है। इसके अलावा, सुदूर और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले मरीजों को इलाज के लिए जोधपुर तक लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे उनकी परेशानी और बढ़ जाती है। जयपुर के जेके लोन अस्पताल का मुद्दा उठाते हुए याचिका में कहा गया कि वहां दुर्लभ बीमारियों के इलाज के स्थान पर विभागीय और प्रशासनिक कार्य किए जा रहे हैं।
वयस्क मरीजों के सामने आर्थिक संकट
राज्य में लागू मुख्यमंत्री आयुष्मान बाल संबल योजना की सीमाओं पर सवाल उठाते हुए न्यायालय को बताया गया कि इसमें केवल 63 सूचीबद्ध दुर्लभ बीमारियों के उपचार का ही प्रावधान किया गया है। इसमें जीएनई मायोपैथी, बेकर मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और लिम्ब गर्डल मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसी गंभीर और दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।
इसके साथ ही, इस योजना का लाभ केवल 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों तक ही सीमित रखा गया है। 18 वर्ष से अधिक आयु के वयस्क मरीज इस योजना के दायरे से बाहर होने के कारण गंभीर चिकित्सकीय और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। याचिका में स्पष्ट किया गया कि दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित वयस्कों के लिए पुनर्वास, डे-केयर तथा दीर्घकालिक देखभाल की कोई ठोस सरकारी प्रणाली मौजूद नहीं है, जिससे मरीज और उनके परिवार बेबस हैं।
डे-केयर केंद्र और अन्य राज्यों का मॉडल
मस्कुलर डिस्ट्रॉफी की स्थिति बिगड़ने पर कई मरीज पूरी तरह से बिस्तर पर निर्भर हो जाते हैं। ऐसे मरीजों की नियमित देखभाल के लिए जिला स्तर पर सुसज्जित डे-केयर केंद्र स्थापित करने का सुझाव दिया गया है। इन केंद्रों पर प्रशिक्षित सहायक कर्मचारियों के माध्यम से 24 घंटे देखभाल सुविधाएं उपलब्ध कराने की आवश्यकता जताई गई है।
ये भी पढ़ें- अंधे कत्ल का पर्दाफाश: बांसवाड़ा से लापता छात्रा को रतलाम में गला दबाकर मारा, आरोपी प्रेमी यूपी से गिरफ्तार
साथ ही इन केंद्रों के सुचारू संचालन और निगरानी के लिए जिला कलेक्टर को नोडल अधिकारी बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। सुनवाई के दौरान केरल, तमिलनाडु और हरियाणा जैसे राज्यों का उदाहरण दिया गया, जहां दुर्लभ बीमारियों के मरीजों को आर्थिक सहायता और सहायक उपचार सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं। केंद्र सरकार ने सभी पांचों मुद्दों पर अपना विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। राज्य सरकार को भी 1 अक्तूबर, 2022 को प्रस्तुत कार्ययोजना पर हुई प्रगति का ब्योरा शपथ-पत्र के माध्यम से जमा करने का आदेश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद तय की गई है।
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स्वावलंबन फाउंडेशन की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि 21 नवंबर, 2025 को निर्धारित पांच बिंदुओं पर दोनों सरकारों की ओर से अपेक्षित जवाब अब तक प्रस्तुत नहीं किया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सचिन आचार्य, अधिवक्ता चयन बोथरा और सार्थक आसोपा ने पक्ष रखते हुए प्रदेश में दुर्लभ बीमारियों के इलाज और जांच व्यवस्था में मौजूद गंभीर खामियों की ओर ध्यान आकर्षित किया।
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जांच और उपचार केंद्रों की कमी
याचिका में बताया गया कि राजस्थान में एम्स जोधपुर को दुर्लभ बीमारियों के लिए एकमात्र सेंटर ऑफ एक्सीलेंस घोषित किया गया है। इसके बावजूद वहां आनुवंशिक जांच की समुचित सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसके कारण मरीजों को मजबूरी में निजी प्रयोगशालाओं का सहारा लेना पड़ता है।
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निजी लैब में जांच कराने से मरीजों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है और जांच रिपोर्ट मिलने में भी काफी देरी होती है। इस विलंब का सीधा असर बीमारी की सटीक पहचान और समय पर उपचार शुरू होने की प्रक्रिया पर पड़ता है। इसके अलावा, सुदूर और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले मरीजों को इलाज के लिए जोधपुर तक लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे उनकी परेशानी और बढ़ जाती है। जयपुर के जेके लोन अस्पताल का मुद्दा उठाते हुए याचिका में कहा गया कि वहां दुर्लभ बीमारियों के इलाज के स्थान पर विभागीय और प्रशासनिक कार्य किए जा रहे हैं।
वयस्क मरीजों के सामने आर्थिक संकट
राज्य में लागू मुख्यमंत्री आयुष्मान बाल संबल योजना की सीमाओं पर सवाल उठाते हुए न्यायालय को बताया गया कि इसमें केवल 63 सूचीबद्ध दुर्लभ बीमारियों के उपचार का ही प्रावधान किया गया है। इसमें जीएनई मायोपैथी, बेकर मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और लिम्ब गर्डल मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसी गंभीर और दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।
इसके साथ ही, इस योजना का लाभ केवल 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों तक ही सीमित रखा गया है। 18 वर्ष से अधिक आयु के वयस्क मरीज इस योजना के दायरे से बाहर होने के कारण गंभीर चिकित्सकीय और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। याचिका में स्पष्ट किया गया कि दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित वयस्कों के लिए पुनर्वास, डे-केयर तथा दीर्घकालिक देखभाल की कोई ठोस सरकारी प्रणाली मौजूद नहीं है, जिससे मरीज और उनके परिवार बेबस हैं।
डे-केयर केंद्र और अन्य राज्यों का मॉडल
मस्कुलर डिस्ट्रॉफी की स्थिति बिगड़ने पर कई मरीज पूरी तरह से बिस्तर पर निर्भर हो जाते हैं। ऐसे मरीजों की नियमित देखभाल के लिए जिला स्तर पर सुसज्जित डे-केयर केंद्र स्थापित करने का सुझाव दिया गया है। इन केंद्रों पर प्रशिक्षित सहायक कर्मचारियों के माध्यम से 24 घंटे देखभाल सुविधाएं उपलब्ध कराने की आवश्यकता जताई गई है।
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साथ ही इन केंद्रों के सुचारू संचालन और निगरानी के लिए जिला कलेक्टर को नोडल अधिकारी बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। सुनवाई के दौरान केरल, तमिलनाडु और हरियाणा जैसे राज्यों का उदाहरण दिया गया, जहां दुर्लभ बीमारियों के मरीजों को आर्थिक सहायता और सहायक उपचार सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं। केंद्र सरकार ने सभी पांचों मुद्दों पर अपना विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। राज्य सरकार को भी 1 अक्तूबर, 2022 को प्रस्तुत कार्ययोजना पर हुई प्रगति का ब्योरा शपथ-पत्र के माध्यम से जमा करने का आदेश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद तय की गई है।