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Ground Report: मौत के कुएं में बैठे मासूम, हर विधानसभा में 70% स्कूल जर्जर; विधायक बोले- जवाब नहीं देती सरकार
सार
राजस्थान के झालावाड़ में स्कूल भवन गिरने से हुई 7 बच्चों की मौत के बाद आज सरकार ने MLA लेड के अंतर्गत किसी भी योजना से निर्मित राजकीय संस्थानों विद्यालयों भवन आंगनबाड़ी भवनों की मरम्मत के कार्य करवाये जाने की स्वीकृति दे दी।
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राजस्थान में स्कूलों के भवनों की हालत खराब
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
झालावाड़ की सरकारी पाठशाला बच्चों के लिए मृत्युशाला बन गई। शुक्रवार को सरकारी स्कूल की जर्जर बिल्डिंग गिरने से 7 मासूम बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई। इस हादसे ने सरकारी तंत्र की लापरवाही को उजागर कर दिया। कई वर्षों से मरम्मत का इंतजार कर रही स्कूल की बिल्डिंग आखिरकार उन बच्चों पर ही गिर गई जो वहां पढ़ने गए थे। इस हादसे के बाद सरकार पूरे दिन बचाव की मुद्रा में नजर आई। मृतक बच्चों के परिवारों को 10-10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने का ऐलान किया गया।
शनिवार को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की ओर से एक अहम अपील जारी की गई। उन्होंने सभी विधायकों से कहा है कि वे अपने क्षेत्र के जर्जर स्कूल भवनों, आंगनबाड़ी केंद्रों और अन्य सरकारी संस्थानों की मरम्मत के लिए अपने MLA लेड फंड से राशि जारी करें। अब तक इस फंड का इस्तेमाल भवनों की मरम्मत में नहीं हो सकता था, लेकिन सरकार ने नियमों में बदलाव कर दिया है। अब विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MLA लेड) के तहत सरकारी स्कूलों और आंगनबाड़ी भवनों की मरम्मत करवाई जा सकेगी। इसके साथ ही डांग, मगरा और मेवात क्षेत्रीय विकास योजना में मरम्मत कार्यों के लिए अनुमत राशि की सीमा 15% से बढ़ाकर 20% कर दी गई है।
सरकार के पास कोई ठोस प्लान नहीं?
झालावाड़ के दर्दनाक स्कूल हादसे के बाद अब एक बड़ा सवाल उठ रहा है- क्या सरकार के पास सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत सुधारने का कोई ठोस प्लान है? हादसे के बाद सरकार ने विधायक निधि (MLA लैड) से मरम्मत कराने की बात कही है, लेकिन यह समाधान "ऊंट के मुंह में जीरा" जैसा है। असल में, एक विधानसभा क्षेत्र में औसतन 200 से 250 सरकारी स्कूल होते हैं। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी खराब है- वहां करीब 70% स्कूलों की हालत जर्जर बताई जा रही है। ऐसे में MLA लैड के केवल 5 करोड़ रुपये से सभी स्कूलों की मरम्मत करना संभव नहीं है।
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योजनाओं की हालत भी खराब
विधायकों का कहना है कि शिक्षा विभाग ऐसा अकेला विभाग है, जिसके पास ब्लॉक या जिला स्तर पर स्कूलों की मरम्मत के लिए कोई स्थायी फंड ही नहीं होता। पहले कभी-कभी समग्र शिक्षा अभियान (समसा योजना) से कुछ राशि मिलती थी, लेकिन इस बार वह भी नहीं आई।
बजट सत्र में किए थे बड़े वादे, लेकिन जमीन पर नहीं दिखा असर
राजस्थान सरकार ने इस साल के बजट सत्र में शिक्षा क्षेत्र को लेकर कई बड़े ऐलान और वादे किए थे, लेकिन हालात बताने को काफी हैं कि वो कितने पूरे हुए।
क्या कहा था सरकार ने?
राइजिंग राजस्थान कार्यक्रम में सरकार ने दावा किया था कि शिक्षा क्षेत्र में 14,500 करोड़ रुपये के 250 एमओयू (समझौते) किए गए हैं। इन समझौतों में स्कूलों में नई बिल्डिंग, क्लासरूम और साइंस लैब बनाने का वादा किया गया था।
इस साल का स्कूली बजट:
दानदाताओं ने करोड़ों दिए, पर काम नहीं आए
सरकार के अलावा राजस्थान में दानदाताओं की तरफ से भी स्कूलों में गुणवत्ता सुधार के लिए बड़ी राशि दान की जाती है। शिक्षा मंत्री ने खुद विधानसभा को बताया था कि भामाशारों के जरिए शिक्षा की गुणवत्ता सुधार के लिए 500 करोड़ रुपए से ज्यादा का सहयोग भी प्राप्त हुआ। लेकिन सरकारी नियम कायदों के चलते यह पैसा खर्च ही नहीं हो पाता। दान के पैसे पर वित्त विभाग के जीएफंडआर के नियम लागू होते हैं। ऐसे में कोई भी प्रधाननाध्यापक खर्च करने से डरता है क्योंकि उन्हें ऑडिट पैरा बनने के डर रहता है।
जानें किसने क्या कहा?
परबतसर विधायक रामनिवास गावड़िया का कहना है कि उनकी विधानसभा में कुल 232 स्कूल हैं, जिनमें से 32 स्कूलों की हालत इतनी खराब है कि कभी भी उनकी इमारतें गिर सकती हैं। करीब 70 फीसदी स्कूलों की स्थिति खराब है, लेकिन सरकार की ओर से मरम्मत के लिए कोई फंड नहीं आ रहा। पहले नाबार्ड योजना से पैसा आता था, लेकिन पिछले चार साल से वह भी बंद है। समसा योजना से भी अब कोई फंड नहीं मिला है।
इसी तरह शिव विधानसभा के विधायक रविंद्र सिंह ने बताया कि उनकी क्षेत्र में 155 स्कूल ऐसे हैं जिनके भवन जर्जर हालत में हैं। उन्होंने इस मुद्दे पर हाल ही में शिक्षा मंत्री मदन दिलावर को पत्र भी लिखा है। उनका कहना है कि यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं है, लेकिन सच्चाई यही है कि सरकार की तरफ से मरम्मत के लिए किसी तरह की कोई सहायता नहीं मिल रही। पहले तो एमएलए लैड फंड से भी स्कूलों की मरम्मत की इजाजत नहीं थी, लेकिन अब वे अपने क्षेत्र के सक्षम लोगों से सहायता मांग रहे हैं और कुछ पैसा विधायक निधि से भी लगा रहे हैं।
शाहपुरा विधायक मनीष यादव का कहना है कि उन्होंने डेढ़ साल पहले ही शाहपुरा के हर स्कूल भवन और कक्षा-कक्ष की स्थिति की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर सरकार को भेज दी थी। हर उस जगह को चिन्हित किया गया जहां मरम्मत की सख्त जरूरत थी। इसके बावजूद आज तक सरकार ने एक नया पैसा भी जारी नहीं किया। उन्होंने यह मुद्दा विधानसभा में 9 जनवरी 2024 को भी उठाया था। तब सरकार ने जवाब में कहा था कि उनके क्षेत्र के 101 स्कूलों के 343 कक्षा-कक्षों की मरम्मत जरूरी है। उन्होंने 18 जून 2025 को भी यह सवाल दोहराया, तब सरकार ने जवाब दिया कि हर साल वार्षिक योजना बनाकर रिपोर्ट भारत सरकार को भेजी जाती है और स्वीकृति मिलने पर ही काम शुरू होता है।
भरतपुर विधायक और पूर्व शिक्षाविद सुभाष गर्ग ने कहा कि अभी तक किसी भी जिला शिक्षा अधिकारी ने यह जानकारी नहीं दी कि स्कूल भवन जर्जर हो चुके हैं। झालावाड़ में जो दुखद हादसा हुआ है, उस पर उन्होंने कहा कि हम हमेशा हादसे के बाद ही जागते हैं। सरकार की पांच प्राथमिकताओं में शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली और सड़क शामिल हैं। एक विधायक को सिर्फ 5 करोड़ रुपये का फंड मिलता है, जो इस काम के लिए बहुत कम है। समसा विभाग के अधिकारियों को जर्जर स्कूल भवनों की सूची तैयार करनी चाहिए। उनकी अपनी विधानसभा में भी ज्यादातर स्कूलों की हालत खराब है। उन्होंने कहा कि सिर्फ एमएलए लैड से समाधान नहीं हो सकता। अगर वे पूरा विधायक फंड भी स्कूलों पर खर्च कर दें तो भी हालात नहीं सुधरेंगे। इसके लिए सरकार को हर विधानसभा के लिए कम से कम 25 करोड़ रुपये का विशेष फंड जारी करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स टालने चाहिए और प्राथमिकता शिक्षा और स्वास्थ्य को देनी चाहिए।
शिक्षा मंत्री ज्यादातर समय बयानों को लेकर विवादों में
बीते डेढ वर्षों में शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ज्यादातर समय अपने विवादित बयानों को लेकर ही चर्चा में रहे हैं। कभी महिला शिक्षिकाओं के कपड़ों को लेकर बयान देकर, पुस्तकों के विवाद को लेकर विवादों में रहे।
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शनिवार को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की ओर से एक अहम अपील जारी की गई। उन्होंने सभी विधायकों से कहा है कि वे अपने क्षेत्र के जर्जर स्कूल भवनों, आंगनबाड़ी केंद्रों और अन्य सरकारी संस्थानों की मरम्मत के लिए अपने MLA लेड फंड से राशि जारी करें। अब तक इस फंड का इस्तेमाल भवनों की मरम्मत में नहीं हो सकता था, लेकिन सरकार ने नियमों में बदलाव कर दिया है। अब विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MLA लेड) के तहत सरकारी स्कूलों और आंगनबाड़ी भवनों की मरम्मत करवाई जा सकेगी। इसके साथ ही डांग, मगरा और मेवात क्षेत्रीय विकास योजना में मरम्मत कार्यों के लिए अनुमत राशि की सीमा 15% से बढ़ाकर 20% कर दी गई है।
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सरकार के पास कोई ठोस प्लान नहीं?
झालावाड़ के दर्दनाक स्कूल हादसे के बाद अब एक बड़ा सवाल उठ रहा है- क्या सरकार के पास सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत सुधारने का कोई ठोस प्लान है? हादसे के बाद सरकार ने विधायक निधि (MLA लैड) से मरम्मत कराने की बात कही है, लेकिन यह समाधान "ऊंट के मुंह में जीरा" जैसा है। असल में, एक विधानसभा क्षेत्र में औसतन 200 से 250 सरकारी स्कूल होते हैं। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी खराब है- वहां करीब 70% स्कूलों की हालत जर्जर बताई जा रही है। ऐसे में MLA लैड के केवल 5 करोड़ रुपये से सभी स्कूलों की मरम्मत करना संभव नहीं है।
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योजनाओं की हालत भी खराब
विधायकों का कहना है कि शिक्षा विभाग ऐसा अकेला विभाग है, जिसके पास ब्लॉक या जिला स्तर पर स्कूलों की मरम्मत के लिए कोई स्थायी फंड ही नहीं होता। पहले कभी-कभी समग्र शिक्षा अभियान (समसा योजना) से कुछ राशि मिलती थी, लेकिन इस बार वह भी नहीं आई।
बजट सत्र में किए थे बड़े वादे, लेकिन जमीन पर नहीं दिखा असर
राजस्थान सरकार ने इस साल के बजट सत्र में शिक्षा क्षेत्र को लेकर कई बड़े ऐलान और वादे किए थे, लेकिन हालात बताने को काफी हैं कि वो कितने पूरे हुए।
क्या कहा था सरकार ने?
राइजिंग राजस्थान कार्यक्रम में सरकार ने दावा किया था कि शिक्षा क्षेत्र में 14,500 करोड़ रुपये के 250 एमओयू (समझौते) किए गए हैं। इन समझौतों में स्कूलों में नई बिल्डिंग, क्लासरूम और साइंस लैब बनाने का वादा किया गया था।
इस साल का स्कूली बजट:
- प्रारंभिक शिक्षा (कक्षा 1 से 8 तक) के लिए: ₹23,298 करोड़
- माध्यमिक शिक्षा (कक्षा 9 से 12 तक) के लिए: ₹17,693 करोड़
- स्कूल निर्माण और मरम्मत के लिए पूंजीगत व्यय (कैपिटल एक्सपेंडिचर):
- इस साल सरकार ने स्कूल निर्माण और सुविधाओं के लिए ₹2,388 करोड़ का बजट रखा है।
- इसमें से ₹1,427 करोड़ राज्य सरकार देगी और ₹962 करोड़ केंद्र से मदद मिलेगी।
- पिछले साल (2024-25) में यह बजट ₹2,556 करोड़ था, लेकिन बाद में इसे घटाकर ₹2,325 करोड़ कर दिया गया, यानी ₹231 करोड़ की कटौती हुई।
दानदाताओं ने करोड़ों दिए, पर काम नहीं आए
सरकार के अलावा राजस्थान में दानदाताओं की तरफ से भी स्कूलों में गुणवत्ता सुधार के लिए बड़ी राशि दान की जाती है। शिक्षा मंत्री ने खुद विधानसभा को बताया था कि भामाशारों के जरिए शिक्षा की गुणवत्ता सुधार के लिए 500 करोड़ रुपए से ज्यादा का सहयोग भी प्राप्त हुआ। लेकिन सरकारी नियम कायदों के चलते यह पैसा खर्च ही नहीं हो पाता। दान के पैसे पर वित्त विभाग के जीएफंडआर के नियम लागू होते हैं। ऐसे में कोई भी प्रधाननाध्यापक खर्च करने से डरता है क्योंकि उन्हें ऑडिट पैरा बनने के डर रहता है।
जानें किसने क्या कहा?
परबतसर विधायक रामनिवास गावड़िया का कहना है कि उनकी विधानसभा में कुल 232 स्कूल हैं, जिनमें से 32 स्कूलों की हालत इतनी खराब है कि कभी भी उनकी इमारतें गिर सकती हैं। करीब 70 फीसदी स्कूलों की स्थिति खराब है, लेकिन सरकार की ओर से मरम्मत के लिए कोई फंड नहीं आ रहा। पहले नाबार्ड योजना से पैसा आता था, लेकिन पिछले चार साल से वह भी बंद है। समसा योजना से भी अब कोई फंड नहीं मिला है।
इसी तरह शिव विधानसभा के विधायक रविंद्र सिंह ने बताया कि उनकी क्षेत्र में 155 स्कूल ऐसे हैं जिनके भवन जर्जर हालत में हैं। उन्होंने इस मुद्दे पर हाल ही में शिक्षा मंत्री मदन दिलावर को पत्र भी लिखा है। उनका कहना है कि यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं है, लेकिन सच्चाई यही है कि सरकार की तरफ से मरम्मत के लिए किसी तरह की कोई सहायता नहीं मिल रही। पहले तो एमएलए लैड फंड से भी स्कूलों की मरम्मत की इजाजत नहीं थी, लेकिन अब वे अपने क्षेत्र के सक्षम लोगों से सहायता मांग रहे हैं और कुछ पैसा विधायक निधि से भी लगा रहे हैं।
शाहपुरा विधायक मनीष यादव का कहना है कि उन्होंने डेढ़ साल पहले ही शाहपुरा के हर स्कूल भवन और कक्षा-कक्ष की स्थिति की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर सरकार को भेज दी थी। हर उस जगह को चिन्हित किया गया जहां मरम्मत की सख्त जरूरत थी। इसके बावजूद आज तक सरकार ने एक नया पैसा भी जारी नहीं किया। उन्होंने यह मुद्दा विधानसभा में 9 जनवरी 2024 को भी उठाया था। तब सरकार ने जवाब में कहा था कि उनके क्षेत्र के 101 स्कूलों के 343 कक्षा-कक्षों की मरम्मत जरूरी है। उन्होंने 18 जून 2025 को भी यह सवाल दोहराया, तब सरकार ने जवाब दिया कि हर साल वार्षिक योजना बनाकर रिपोर्ट भारत सरकार को भेजी जाती है और स्वीकृति मिलने पर ही काम शुरू होता है।
भरतपुर विधायक और पूर्व शिक्षाविद सुभाष गर्ग ने कहा कि अभी तक किसी भी जिला शिक्षा अधिकारी ने यह जानकारी नहीं दी कि स्कूल भवन जर्जर हो चुके हैं। झालावाड़ में जो दुखद हादसा हुआ है, उस पर उन्होंने कहा कि हम हमेशा हादसे के बाद ही जागते हैं। सरकार की पांच प्राथमिकताओं में शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली और सड़क शामिल हैं। एक विधायक को सिर्फ 5 करोड़ रुपये का फंड मिलता है, जो इस काम के लिए बहुत कम है। समसा विभाग के अधिकारियों को जर्जर स्कूल भवनों की सूची तैयार करनी चाहिए। उनकी अपनी विधानसभा में भी ज्यादातर स्कूलों की हालत खराब है। उन्होंने कहा कि सिर्फ एमएलए लैड से समाधान नहीं हो सकता। अगर वे पूरा विधायक फंड भी स्कूलों पर खर्च कर दें तो भी हालात नहीं सुधरेंगे। इसके लिए सरकार को हर विधानसभा के लिए कम से कम 25 करोड़ रुपये का विशेष फंड जारी करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स टालने चाहिए और प्राथमिकता शिक्षा और स्वास्थ्य को देनी चाहिए।
शिक्षा मंत्री ज्यादातर समय बयानों को लेकर विवादों में
बीते डेढ वर्षों में शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ज्यादातर समय अपने विवादित बयानों को लेकर ही चर्चा में रहे हैं। कभी महिला शिक्षिकाओं के कपड़ों को लेकर बयान देकर, पुस्तकों के विवाद को लेकर विवादों में रहे।
- 1. महिला शिक्षिकाओं को लेकर बयान: नीमकाथाना के नृसिंहपुरी में कार्यक्रम को संबोधित करते कहा था कि स्कूलों पर कई शिक्षिका अच्छे कपड़े नहीं पहन कर जाती। वे पूरे शरीर को दिखाकर चलती हैं। जिसका बच्चों पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता।
- 2.स्कूल सिलेबस को लेकर: कक्षा 11 व 12 में पढ़ाई जाने वाली बुक- आजादी के बाद का स्वर्णिम इतिहास- को कोर्स से हटाने को लेकर कहा कि अगर कोई जहर खरीद ले तो उसे खाना जरूरी थोड़े है।
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