रक्षाबंधन पर प्रकृति से अनोखा रिश्ता: गोमय राखी में तुलसी-अश्वगंधा के बीज, मिट्टी में रखने पर उग सकते हैं पौधे
जयपुर ग्रामीण के आसलपुर में गाय के गोबर से ईको-फ्रेंडली राखियां तैयार की जा रही हैं। इनमें तुलसी, अश्वगंधा और कालमेघ के बीज शामिल हैं। राखियां पर्यावरण संरक्षण, गौ-संरक्षण, स्वदेशी उत्पादों और ग्रामीण महिलाओं को रोजगार से जोड़ रही हैं।
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रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा के संकल्प का प्रतीक है। इस बार जयपुर ग्रामीण के आसलपुर गांव में तैयार की जा रही अनोखी गोमय राखियां इस परंपरा को प्रकृति, गौ-संरक्षण और ग्रामीण रोजगार से जोड़ रही हैं। बाजार में फैंसी और रंग-बिरंगी राखियों की भरमार के बीच गाय के गोबर से तैयार की जा रही ये ईको-फ्रेंडली राखियां लोगों का ध्यान खींच रही हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने के आह्वान की भावना के अनुरूप तैयार की जा रही इन राखियों में स्थानीय हुनर के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी शामिल है। आसलपुर स्थित धेनु कृपा गौशाला के गोमय केंद्र में रक्षाबंधन के लिए विशेष रूप से इन रक्षा सूत्रों को तैयार किया जा रहा है। गाय के गोबर से बनी राखियों को प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक तरीके से सजाया जा रहा है। इन्हें आकर्षक बनाने के साथ-साथ पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल रखने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
इन गोमय राखियों की सबसे खास बात इनमें शामिल किए जा रहे पौधों के बीज हैं। तुलसी, अश्वगंधा और कालमेघ सहित विभिन्न पौधों के बीज राखियों में लगाए जा रहे हैं। रक्षाबंधन के बाद राखी को उतारकर मिट्टी में रखने पर अनुकूल परिस्थितियों में इन बीजों से पौधे उगने की संभावना है। इस तरह भाई की कलाई पर बंधा रक्षा सूत्र बाद में धरती पर हरियाली का संदेश दे सकता है।
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धेनु कृपा के पदाधिकारियों के अनुसार, गोमय राखियां तैयार करने के पीछे गौमाता के प्रति सम्मान और गौ-संरक्षण की भावना भी प्रमुख है। राखी के माध्यम से लोगों को गौ-संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय एवं स्वदेशी उत्पादों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग के साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
धेनु कृपा के मैनेजर मनोज कुमार के अनुसार, गोबर से बनी इन राखियों की अच्छी मांग देखने को मिल रही है। उनका कहना है कि स्थानीय और स्वदेशी उत्पादों को अपनाने से ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा मिलेगा और लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ेगी।
गोमय केंद्र की गतिविधियां केवल राखी बनाने तक सीमित नहीं हैं। यहां गोबर से नेकलेस, ईयर रिंग्स और कई तरह के सजावटी एवं उपयोगी उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं। खास बात यह है कि इस काम में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ रही है। सुमन योगी और सुनीता कुमावत सहित कई महिलाएं राखियों के निर्माण में जुटी हैं। उनके लिए यह काम गांव में रहकर रोजगार हासिल करने और नया हुनर सीखने का माध्यम बन रहा है।
गोमय रक्षासूत्र निर्माणकार सुमन योगी बताती हैं कि इस काम से उन्हें गांव में ही रोजगार मिल रहा है। रक्षाबंधन के बाद गणेश चतुर्थी और दीपावली के लिए भी गोमय से अलग-अलग उत्पाद तैयार किए जाएंगे। वहीं सुनीता कुमावत का कहना है कि गांव में रहकर काम करने और नए उत्पाद बनाना सीखने का अवसर उन्हें अच्छा लगता है।
गोमय केंद्र में आगामी त्योहारों की तैयारियां भी शुरू होने वाली हैं। गणेश चतुर्थी के लिए गोमय से गणेश प्रतिमाएं और दीपावली के लिए दीपक, गिफ्ट हैम्पर्स सहित कई उत्पाद तैयार किए जाएंगे। ऐसे में रक्षाबंधन से शुरू हुआ यह प्रयास पूरे त्योहारी सीजन में स्थानीय उत्पादों, पारंपरिक हुनर और ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा देने का माध्यम बन सकता है।
आसलपुर की यह गोमय राखी भाई-बहन के रिश्ते के साथ प्रकृति और गौ-संरक्षण का संदेश भी दे रही है। कलाई पर बंधा रक्षा सूत्र जब त्योहार के बाद मिट्टी में पहुंचकर पौधे के रूप में नई जिंदगी की संभावना पैदा करे, तो रक्षाबंधन का संदेश और व्यापक हो जाता है। प्रेम, आस्था, स्वदेशी सोच, गौ-सम्मान, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण रोजगार—आसलपुर की यह अनोखी राखी इन सभी भावनाओं को एक साथ जोड़ रही है।