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पंजाब: सियासी दलों के समीकरण बिगाड़ सकता है 'वारिस पंजाब दे !', ग्रामीण परिवेश के मालवा में बढ़ रहा प्रभाव
Sat, 29 Aug 2026 10:59 AM IST
Sharukh Khan
सुशील कुमार, अमर उजाला, सुनाम ऊधम सिंह वाला/पटियाला
सुशील कुमार, अमर उजाला, सुनाम ऊधम सिंह वाला/पटियाला
Published by: Sharukh Khan
Updated Sat, 29 Aug 2026 10:59 AM IST
सार
'वारिस पंजाब दे' सियासी दलों के समीकरण बिगाड़ सकता है। ग्रामीण परिवेश के मालवा में प्रभाव बढ़ रहा है। दो संसदीय सीटों पर जीत की गूंज अभी तक सुनाई दे रही है।
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रखड़ पुण्या में वारिस पंजाब दे अकाली दल की काॅन्फ्रेंस
- फोटो : संवाद
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विस्तार
पंजाब में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच अकाली दल वारिस पंजाब दे के राजनीतिक दल के रूप में सामने आने से सियासी समीकरण बदलने की चर्चा तेज हो गई है। ग्रामीण मालवा में संगठन की सक्रियता बढ़ रही है और युवाओं के बीच इसके कार्यक्रमों में भीड़ दिखाई दे रही है।
दो संसदीय सीटों पर 2024 में मिली जीत के बाद संगठन का प्रभाव खासकर पंथक क्षेत्रों में चर्चा का विषय बना हुआ है।2024 के लोकसभा चुनाव में डिब्रूगढ़ जेल में बंद अमृतपाल सिंह ने खड़ूर साहिब से निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत दर्ज की थी। उन्होंने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 1,97,120 वोटों से हराया।
वहीं फरीदकोट सुरक्षित सीट से सरबजीत सिंह खालसा ने 70,053 वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। इन नतीजों ने पंथक मुद्दों और पारंपरिक दलों के प्रति असंतोष के बीच नए राजनीतिक आधार की ओर संकेत किया था।
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दो संसदीय सीटों पर 2024 में मिली जीत के बाद संगठन का प्रभाव खासकर पंथक क्षेत्रों में चर्चा का विषय बना हुआ है।2024 के लोकसभा चुनाव में डिब्रूगढ़ जेल में बंद अमृतपाल सिंह ने खड़ूर साहिब से निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत दर्ज की थी। उन्होंने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 1,97,120 वोटों से हराया।
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वहीं फरीदकोट सुरक्षित सीट से सरबजीत सिंह खालसा ने 70,053 वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। इन नतीजों ने पंथक मुद्दों और पारंपरिक दलों के प्रति असंतोष के बीच नए राजनीतिक आधार की ओर संकेत किया था।
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मालवा में 69 विधानसभा सीटें हैं। ऐसे में संगठन का बढ़ता प्रभाव कई सीटों पर पारंपरिक दलों के समीकरण प्रभावित कर सकता है।
नशा विरोध और पंथक मुद्दों पर जोर
राजनीतिक जानकारों के अनुसार ग्रामीण और पंथक सोच रखने वाले युवाओं में संगठन का प्रभाव बढ़ा है। नशे के खिलाफ अभियान बंदी सिंहों की रिहाई और सिख पहचान जैसे मुद्दों पर मुखर रुख इसके समर्थन का आधार बन रहा है। हालांकि संगठन के सामने चुनौतियां भी हैं।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार ग्रामीण और पंथक सोच रखने वाले युवाओं में संगठन का प्रभाव बढ़ा है। नशे के खिलाफ अभियान बंदी सिंहों की रिहाई और सिख पहचान जैसे मुद्दों पर मुखर रुख इसके समर्थन का आधार बन रहा है। हालांकि संगठन के सामने चुनौतियां भी हैं।
खालसा राज जैसी सख्त बयानबाजी से शहरी और मध्यमार्गी मतदाताओं के बीच दूरी की आशंका है। अमृतपाल सिंह और उनके सहयोगियों पर कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई का असर भी संगठन पर पड़ रहा है। अब चुनौती यह है कि 2024 का जनसमर्थन विधानसभा चुनाव में स्थायी राजनीतिक आधार बन पाता है या नहीं।