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फर्जी डिग्री पर 14 साल नौकरी: हाईकोर्ट ने शिक्षिका की अपील खारिज
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चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने फर्जी शैक्षणिक योग्यता से सरकारी नौकरी पाने के मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गैर-मौजूद संस्थान से मिली डिग्री वैध नहीं मानी जा सकती। 14 साल तक सेवा करने वाली प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण (ईटीटी) शिक्षिका की अपील खारिज कर दी गई।
हाईकोर्ट ने शिक्षिका को सेवा से हटाने के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि लंबे समय तक नौकरी करने या बाद में मान्य योग्यता हासिल करने से फर्जी नियुक्ति वैध नहीं होती। यह निर्णय मनजीत कौर बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य मामले में दिया गया। शिक्षिका ने अपनी नियुक्ति बचाने के लिए लंबी सेवा का हवाला दिया था। उसने बाद में हासिल की गई बीएड की डिग्री का तर्क भी दिया था।
नियोक्ता विभाग को बाद में पता चला कि नियुक्ति के लिए प्रस्तुत डिप्लोमा फर्जी था। जांच में सामने आया कि जिस संस्थान से योग्यता का दावा किया गया, उसका अस्तित्व ही नहीं था। विभाग ने आरोपपत्र जारी कर शिक्षिका को सेवा से हटा दिया था।
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एकल पीठ और खंडपीठ का फैसला :
शिक्षिका ने विभाग के इस आदेश को हाईकोर्ट की एकल पीठ में चुनौती दी थी। एकल पीठ ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी। पीठ ने माना कि गैर-मौजूद संस्थान से डिप्लोमा वैध योग्यता नहीं हो सकता। इसके बाद शिक्षिका ने खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की। खंडपीठ ने भी शिक्षिका की अपील को खारिज कर दिया।
फर्जी डिप्लोमा की वैधता :
शिक्षिका ने अपील में दलील दी कि डिप्लोमा हासिल करने की प्रक्रिया उसके अनुसार वास्तविक थी। उसने 14 साल तक सेवा करने का भी तर्क दिया। खंडपीठ ने सवाल उठाया कि अस्तित्वहीन संस्थान का डिप्लोमा कैसे स्वीकार किया जा सकता है। इसी फर्जी डिप्लोमा के आधार पर शिक्षिका ने भर्ती में पात्रता प्राप्त की थी। अदालत ने कहा कि बाद की योग्यता से मूल फर्जीवाड़े को वैध नहीं किया जा सकता।
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हाईकोर्ट ने शिक्षिका को सेवा से हटाने के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि लंबे समय तक नौकरी करने या बाद में मान्य योग्यता हासिल करने से फर्जी नियुक्ति वैध नहीं होती। यह निर्णय मनजीत कौर बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य मामले में दिया गया। शिक्षिका ने अपनी नियुक्ति बचाने के लिए लंबी सेवा का हवाला दिया था। उसने बाद में हासिल की गई बीएड की डिग्री का तर्क भी दिया था।
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नियोक्ता विभाग को बाद में पता चला कि नियुक्ति के लिए प्रस्तुत डिप्लोमा फर्जी था। जांच में सामने आया कि जिस संस्थान से योग्यता का दावा किया गया, उसका अस्तित्व ही नहीं था। विभाग ने आरोपपत्र जारी कर शिक्षिका को सेवा से हटा दिया था।
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एकल पीठ और खंडपीठ का फैसला :
शिक्षिका ने विभाग के इस आदेश को हाईकोर्ट की एकल पीठ में चुनौती दी थी। एकल पीठ ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी। पीठ ने माना कि गैर-मौजूद संस्थान से डिप्लोमा वैध योग्यता नहीं हो सकता। इसके बाद शिक्षिका ने खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की। खंडपीठ ने भी शिक्षिका की अपील को खारिज कर दिया।
फर्जी डिप्लोमा की वैधता :
शिक्षिका ने अपील में दलील दी कि डिप्लोमा हासिल करने की प्रक्रिया उसके अनुसार वास्तविक थी। उसने 14 साल तक सेवा करने का भी तर्क दिया। खंडपीठ ने सवाल उठाया कि अस्तित्वहीन संस्थान का डिप्लोमा कैसे स्वीकार किया जा सकता है। इसी फर्जी डिप्लोमा के आधार पर शिक्षिका ने भर्ती में पात्रता प्राप्त की थी। अदालत ने कहा कि बाद की योग्यता से मूल फर्जीवाड़े को वैध नहीं किया जा सकता।