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इंजीनियर की नौकरी ठुकरा अब करेंगी सरहदों की सुरक्षा
सुमित सिंह श्यौराण/चंडीगढ़
Updated Fri, 22 Mar 2013 01:23 AM IST
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जहां युवा इंजीनियरिंग करके मल्टीनेशनल कंपनियों में बड़े-बडे पैकेज के पीछे दौड़ते हैं, वहीं चंडीगढ़ की बेटी ने बीटेक के बाद सरहदों की सुरक्षा करने के लिए आर्मी में लेफ्टिनेंट बनकर मिसाल पेश की है।
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सेक्टर 29 निवासी पारुल शर्मा (23) ने अपने बचपन के सपने को साकार करते हुए लेफ्टिनेंट की ट्रेनिंग पूरी कर ली है और उन्हें पहली पोस्टिंग पश्चिम बंगाल में मिली है।
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सभी लड़कियों के लिए रोल मॉडल पारुल के लिए यह सफर इतना आसान नहीं था। इसके लिए उन्होंने एक साल तक 20-20 घंटे हर रोज प्रैक्टिस की है।
इतनी कड़ी ट्रेनिंग की वजह से चेन्नई में लगे कैंप से कई लड़कियां तो वापस अपने घर लौट आईं, लेकिन पारुल के सिर पर धुन सवार थी कि उन्हें तो अपनी मातृभूमि की सेवा में ही जीवन समर्पित करना है।
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मनौली की पहली लड़की पहुंची आर्मी में
बेटी के कंधों पर सितारे और सिर पर आर्मी की कैप देखकर एक अखबार में कार्यरत उनके पिता ललित शर्मा गर्व से फूले हुए हैं। सेक्टर-29 के मकान नंबर 3019 निवासी पारुल मूल रूप से मोहाली के मनौली गांव की हैं। पिता ललित शर्मा ने बताया कि पारुल अपने परिवार की नहीं, बल्कि गांव की भी पहली लड़की है, जो सरहदों की रक्षा करेगी।
जुड़वां बहनें भी चलेंगी उनकी ही राह पर
पारुल से छोटी जुड़वां बहनें भी अब सरहदों की सेवा करने की जिद पकड़े हुए हैं। उनका कहना है कि वे भी ग्रेजुएशन के बाद रक्षा सेवाओं में ही जाएंगी। ललित शर्मा ने कहा कि वे कभी भी अपनी बेटियों के सपनों की राह में नहीं आए। इसी का फल उन्हें आज मिल रहा है। चेन्नई से ट्रेनिंग के बाद घर लौटी पारुल का जोरदार स्वागत हुआ।
बेस्ट एथलीट ने देश सेवा को ही चुना
पारुल ने ट्रिब्यून मॉडल स्कूल-29 से 10वीं 78 फीसदी और गवर्नमेंट मॉडल सीनियर सेकेंडरी स्कूल-33 से 12वीं कक्षा 77 फीसदी अंकों के साथ की। उन्होंने आरआईएमटी, मंडी गोबिंदगढ़ से बीटेक की। इस दौरान ही उनका सिलेक्शन टेक महेंद्रा में भी हो गया।
इसी दौरान उनका आर्मी में भी नंबर आ गया, लेकिन उन्होंने देश सेवा को ही प्राथमिकता दी। स्कूल की हाउस कैप्टन और स्पोर्ट्स में बेस्ट एथलीट का खिताब पारुल के नाम रहा है। नॉवेल पढ़ना और सर्फिंग इनकी हॉबी है। अभिभावकों को ही पारुल अपना रोल मॉडल मानती हैं।
सुबह चार बजे से रात 12 बजे तक ट्रेनिंग
पारुल ने बताया कि आर्मी में लड़के और लड़की में कोई फर्क नहीं होता। 49 हफ्तों की ट्रेनिंग के दौरान 20 घंटे की कड़ी ट्रेनिंग से उन्हें गुजरना पड़ा। ट्रेनिंग कैंप सुबह 4 बजे से शुरू होकर रात 12 बजे तक चलता था। कैप में हथियारों से लेकर पहाड़ों और जंगलों में चलने तक की पूरी ट्रेनिंग दी जाती है।