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32 साल बाद इंसाफ: फर्जी एनकाउंटर मामले में पंजाब पुलिस के 2 पूर्व अधिकारी दोषी, 1993 में मार दिए थे दो निर्दोष

Mon, 03 Mar 2025 07:16 PM IST
अंकेश ठाकुर संवाद न्यूज एजेंसी, मोहाली (पंजाब)
संवाद न्यूज एजेंसी, मोहाली (पंजाब) Published by: अंकेश ठाकुर Updated Mon, 03 Mar 2025 07:16 PM IST
सार

वर्ष 1993 में पंजाब के तरनतारन में दो लोगों को पुलिस ने फर्जी एनकाउंटर में मार दिया था। 32 साल बाद पीड़ित परिवारों को इंसाफ मिला है। इस फर्जी एनकाउंटर मामले में मोहाली की सीबीआई की विशेष अदालत ने दो पूर्व पुलिस अधिकारियों को दोषी करार दिया है। 

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Two former Punjab Police officers convicted in 32 year old fake encounter case
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

सीबीआई कोर्ट मोहाली में सोमवार को वर्ष 1993 में हुए एक फर्जी एनकाउंटर मामले की सुनवाई हुई। अदालत ने पंजाब के तरनतारन के दो पूर्व पुलिस अधिकारी जिसमें पुलिस स्टेशन पट्टी के तत्कालीन एसएचओ सीता राम और तत्कालीन कांस्टेबल राज पाल को दोषी ठहराया है। दोनों दोषियों को 6 मार्च को सजा सुनाई जाएगी। घटना के 32 साल बाद सीबीआई कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है। सीबीआई के सरकारी वकील अनमोल नारंग के अनुसार दोषी सीता राम (80) को आईपीसी की धारा 302, 201 और 218 और राजपाल (57) को धारा 201 और 120-बी के तहत अपराध करने के लिए दोषी ठहराया गया है।

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वर्ष 1993 में तरनतारन पुलिस ने दो युवकों को मारा हुआ दिखाया था। इस मामले में 11 पुलिस अधिकारियों पर अपहरण, अवैध कारावास और हत्या का आरोप लगा था। सीबीआई ने इस मामले में 48 गवाहों का हवाला दिया था, लेकिन मुकदमे के दौरान केवल 22 गवाहों ने गवाही हुई। क्योंकि 23 गवाहों की देरी से सुनवाई के दौरान मृत्यु हो गई और इस कारण कुछ आरोपी बरी हो गए। इसी तरह चार आरोपी सरदूल सिंह, अमरजीत सिंह, दीदार सिंह और समीर सिंह की मुकदमे के लंबित रहने दौरान मृत्यु हो गई। वहीं 5 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।

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परिवार को नहीं सौंपे शव, कर दिया अंतिम संस्कार

सीबीआई ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के आधार पर जांच की जिसमें यह खुलासा हुआ कि 30 जनवरी 1993 को गुरदेव सिंह उर्फ देबा निवासी गलालीपुर जिला तरनतारन को एएसआई नोरंग सिंह प्रभारी पुलिस पोस्ट कैरों तरनतारन के नेतृत्व में पुलिस पार्टी ने उसके घर से हिरासत में लिया था। उसके बाद 5 फरवरी 1993 को एक अन्य युवक सुखवंत सिंह को एएसआई दीदार सिंह पुलिस स्टेशन पट्टी जिला तरनतारन के नेतृत्व में गांव बहमनीवाला जिला तरनतारन से हिरासत में लिया था। दोनों को 6 फरवरी 1993 को थाना पट्टी के भागूपुर इलाके में मुठभेड़ में मारा गया दिखा दिया। मुठभेड़ की मनगढ़ंत कहानी बनाई गई और थाना पट्टी तरनतारन में एफआईआर दर्ज की गई। दोनों मृतकों के शवों का लावारिस तरीके से अंतिम संस्कार कर दिया गया और उन्हें परिवारों को नहीं सौंपा गया। उस समय पुलिस ने दावा किया था कि दोनों हत्या, जबरन वसूली आदि के 300 मामलों में शामिल थे, लेकिन सीबीआई जांच के दौरान यह तथ्य गलत पाया गया।

20 साल तक केस में लगा रहा स्टे

वर्ष 2000 में जांच पूरी करने के बाद सीबीआई ने तरनतारन के 11 पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आरोप पत्र पेश किया था, जिनमें नोरंग सिंह तत्कालीन प्रभारी पुलिस पोस्ट कैरों, एएसआई दीदार सिंह, कश्मीर सिंह तत्कालीन डीएसपी पट्टी, सीता राम तत्कालीन एसएचओ पट्टी, दर्शन सिंह, गोबिंदर सिंह तत्कालीन एसएचओ वल्टोहा, एएसआई शमीर सिंह, एएसआई फकीर सिंह, कांस्टेबल सरदूल सिंह, कांस्टेबल राजपाल और कांस्टेबल अमरजीत सिंह शामिल थे। वर्ष 2001 में उनके खिलाफ आरोप तय किए गए थे, लेकिन उसके बाद पंजाब अशांत क्षेत्र अधिनियम 1983 के तहत आवश्यक मंजूरी की दलील के साथ आरोपियों की याचिकाओं के आधार पर उच्च न्यायालयों द्वारा मामला 2021 तक स्थगित रहा जिन्हें बाद में खारिज कर दिया गया। 

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30 साल बाद दर्ज हुआ अभियोजन पक्ष के गवाह का बयान

हैरानी की बात यह है कि सीबीआई द्वारा एकत्र किए गए सभी सबूत इस मामले की न्यायिक फाइल से गायब हो गए और कोर्ट द्वारा सूचित किए जाने के बाद माननीय उच्च न्यायालय के आदेश पर रिकॉर्ड का पुनर्निर्माण किया गया। अंत में घटना के 30 साल बाद वर्ष 2023 में पहले अभियोजन पक्ष के गवाह का बयान दर्ज किया गया। सीबीआई ने इस मामले में 1995 में पारित सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के आधार पर जांच की थी। सीबीआई ने प्रारंभिक जांच की और 27 नवंबर 1996 को ज्ञान सिंह नाम के एक व्यक्ति का बयान दर्ज किया। फरवरी 1997 में सीबीआई ने एएसआई नोरंग सिंह और पुलिस स्टेशन पट्टी के अन्य मुलाजिमों के खिलाफ नियमित मामला दर्ज किया था। यह मामला जिला अदालत में विचाराधीन था।

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