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Ludhiana News: सिख जत्थों को पाकिस्तान जाने से रोकने पर राजनीतिक विवाद गहराया

Wed, 17 Sep 2025 06:15 PM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Wed, 17 Sep 2025 06:15 PM IST
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Preventing Sikh groups from going to Pakistan sparks political controversy
-सुरक्षा कारणों से पहले भी स्थगित की जाती रहीं हैं तीर्थयात्राएं
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कंवरपाल
हलवारा। गुरु नानक जयंती पर सिख जत्थों को पाकिस्तान जाने की अनुमति न देने के केंद्र सरकार के फैसले ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। यह पहला मौका नहीं है बल्कि विभाजन के बाद से पाकिस्तान स्थित सिख तीर्थों की यात्रा बार-बार बाधित हुई है। 1947 में जब उपमहाद्वीप हिंसा की चपेट में था तो कई ऐतिहासिक गुरुद्वारे सीमा के पार पाकिस्तानी हिस्से में ही रह गए थे। उसके बाद दशकों तक वहां पहुंच पाना लगभग असंभव हो गया था। इस दौरान समुदाय उजड़ गए, पुल नष्ट हो गए और सीमाओं पर सैन्यीकरण कर दिया गया।ननकाना साहिब और करतारपुर साहिब की लालसा प्रार्थना तक ही सीमित रह गई और श्रद्धालु अपने तीर्थ स्थलों के दर्शनों को तरसते रहे ।
1965 के युद्ध के बाद जस्सर पुल जैसे क्रॉसिंग के नष्ट हो जाने के बाद तीर्थयात्रा लगभग बंद हो गई थी। जून 2019 में भारत की ओर से सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए एक जत्थे को मंजूरी न देने पर लगभग 150 तीर्थयात्रियों को अटारी में रोक दिया गया। 2019 में धूमधाम से खोला गया करतारपुर कॉरिडोर कोविड-19 महामारी के कारण 20 महीने तक बंद रहा।मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के मद्देनजर गलियारा अचानक बंद कर दिया गया और उसी दिन 150 तीर्थयात्रियों को वापस भेज दिया गया। जून 2025 में भारत सरकार ने गुरु अर्जन देव जी की पुण्यतिथि के लिए लाहौर जाने वाले जत्थे को अनुमति देने से इन्कार कर दिया।
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जब भी राष्ट्रीय सुरक्षा दांव पर लगी है, धार्मिक भावनाओं की गहराई की परवाह किए बिना तीर्थयात्राएं स्थगित की जाती रहीं हैं। पाकिस्तान का दोहरा खेल चलता रहा है और सिख धर्मस्थलों के संरक्षक के रूप में उसकी उदारता बस दिखावा है। अपने ही अल्पसंख्यकों के साथ पाकिस्तान का व्यवहार बेहद खराब और द्वेषपूर्ण रहा है। यात्रा पर जाने वाले जत्थों का पाकिस्तानी धरती पर बार-बार खालिस्तान समर्थित दुष्प्रचार से सामना होता रहा है।
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हालिया प्रतिबंध पहलगाम आतंकवादी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद लगाया गया है जो सीमा पार उग्रवाद के चरम पर होने के तौर पर देखा जाना चाहिए। ऐसी परिस्थितियों में नागरिकों के बड़े समूहों को पाकिस्तान भेजना लापरवाही मानी जा रही है। इसकी तुलना क्रिकेट मैचों से करना भ्रामक है। खिलाड़ी विशेष सुरक्षा के तहत अक्सर तटस्थ स्थानों पर यात्रा करते हैं जबकि तीर्थ यात्रियों के समूह हमेशा बिखरे हुए रहते हैं। यही बिखराव उनकी धार्मिक यात्रा को असुरक्षित बनाता है।


सरकार मानती है कि सिख समुदाय हर संकट में देश के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहा है। सिख समुदाय बखूबी जानता है कि देश का कर्तव्य सबसे पहले जीवन और अपने नागरिकों की रक्षा करना है। 1947 में हुए विभाजन ने तीर्थयात्राओं को बाधित किया था। उसके बाद हुए युद्ध और सीमा पार से पनपे आतंकवाद के कारण यात्राएं स्थगित की गई हैं। समझना जरूरी है कि तीर्थ यात्रा पर सरकार की ओर से लगाया मौजूदा प्रतिबंध आस्था का अपमान नहीं बल्कि जिम्मेदारी की पुन: पुष्टि है। धर्मस्थल पवित्र हैं और रहेंगे लेकिन नागरिकों की सुरक्षा और राष्ट्र की संप्रभुता भी सर्वोपरि बनी रहेगी।
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