{"_id":"571774614f1c1bc6568b45c7","slug":"wheat-crop-lack-of-migrant-workers-farmers-faridkot-jalandhar-punjab","type":"story","status":"publish","title_hn":"गेहूं की कटाई के लिए प्रवासी मजदूरों का अभाव ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गेहूं की कटाई के लिए प्रवासी मजदूरों का अभाव
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदकोट
Updated Wed, 20 Apr 2016 05:52 PM IST
विज्ञापन
गेंहू
- फोटो : demo
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सोने के रंग वाली गेहूं की कटाई का काम दिनों दिन तेज हो रहा है लेकिन इस बार गेहूं की कटाई के लिए प्रवासी मजदूरों के अभाव से भी किसान काफी दिक्कतें झेल रहे हैं और उन्हें महंगे दामों पर कंबाइन मशीनों से कटाई करवानी पड़ रही है।
इस मामले में किसान बख्तौर सिंह ने कहा कि कोई समय था जब अप्रैल के शुरू में ही प्रवासी मजदूरों की टोलियां पंजाब के गांवों में नजर आने लगती थी, लेकिन इस साल रेलवे स्टेशनों पर इक्का दुक्का प्रवासी मजदूरों की टोलियां दिखाई देती हैं।
बिहार और यूपी से खेती का काम करने वाले मजदूर इन दिनों अपने प्रदेशों में ही काम मिलने की वजह से पंजाब नहीं आते। किसान जगरूप सिंह के अनुसार इस बार भी प्रवासी मजदूरों की कमी कारण गेहूं की कटाई प्रभावित हो रही है। मजदूरों की कमी के कारण किसान गेहूं की हाथों से कटाई करने से असमर्थ हैं और उन्हें मजबूरीवश महंगे दामों पर कंबाइन मशीनों से कटाई करवानी पड़ रही है।
विज्ञापन
किसान निर्मल सिंह के अनुसार पिछले समय के दौरान लाखों की तादाद में प्रवासी मजदूर रोजगार की खोज में पंजाब आते रहे थे लेकिन इनमें से जो मजदूर पक्के तौर पर यहां बस गए हैं, वे खेत मजदूरी की जगह राजगीरी, ठेकेदारी इत्यादि कामों पर लग चुके हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक 1991 में पंजाब में 12 लाख किसान कृषि करते थे और अब यह संख्या 10 लाख रह गई है और हर साल ही हजारों किसान कृषि का धंधा छोड़ रहे हैं।
उधर फसलों की हाथ से कटाई न होने की वजह से लाखों रुपये लगाके बनाए गए थ्रैशर भी बेकार हो चुके हैं। फसल काटने में उपयोग आने वाली दांतियां व टोको के दंदे निकालने वाले मिस्त्री बलदेव सिंह का कहना है कि अप्रैल के शुरू में ही किसान दांतियां खरीदने लग जाते थे और टोका के दंदे निकलवाने के लिए लाइनें लग जाती थीं। गेहूं की कटाई शुरू होने पर उनके लिए दिन और रात का फर्क खत्म हो जाता था, लेकिन अब हाथ से कटाई न के बराबर होने के कारण इन दिनों वह ग्राहकों का इंतजार करते रहते हैं।
विज्ञापन
इस मामले में किसान बख्तौर सिंह ने कहा कि कोई समय था जब अप्रैल के शुरू में ही प्रवासी मजदूरों की टोलियां पंजाब के गांवों में नजर आने लगती थी, लेकिन इस साल रेलवे स्टेशनों पर इक्का दुक्का प्रवासी मजदूरों की टोलियां दिखाई देती हैं।
विज्ञापन
बिहार और यूपी से खेती का काम करने वाले मजदूर इन दिनों अपने प्रदेशों में ही काम मिलने की वजह से पंजाब नहीं आते। किसान जगरूप सिंह के अनुसार इस बार भी प्रवासी मजदूरों की कमी कारण गेहूं की कटाई प्रभावित हो रही है। मजदूरों की कमी के कारण किसान गेहूं की हाथों से कटाई करने से असमर्थ हैं और उन्हें मजबूरीवश महंगे दामों पर कंबाइन मशीनों से कटाई करवानी पड़ रही है।
विज्ञापन
किसान निर्मल सिंह के अनुसार पिछले समय के दौरान लाखों की तादाद में प्रवासी मजदूर रोजगार की खोज में पंजाब आते रहे थे लेकिन इनमें से जो मजदूर पक्के तौर पर यहां बस गए हैं, वे खेत मजदूरी की जगह राजगीरी, ठेकेदारी इत्यादि कामों पर लग चुके हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक 1991 में पंजाब में 12 लाख किसान कृषि करते थे और अब यह संख्या 10 लाख रह गई है और हर साल ही हजारों किसान कृषि का धंधा छोड़ रहे हैं।
उधर फसलों की हाथ से कटाई न होने की वजह से लाखों रुपये लगाके बनाए गए थ्रैशर भी बेकार हो चुके हैं। फसल काटने में उपयोग आने वाली दांतियां व टोको के दंदे निकालने वाले मिस्त्री बलदेव सिंह का कहना है कि अप्रैल के शुरू में ही किसान दांतियां खरीदने लग जाते थे और टोका के दंदे निकलवाने के लिए लाइनें लग जाती थीं। गेहूं की कटाई शुरू होने पर उनके लिए दिन और रात का फर्क खत्म हो जाता था, लेकिन अब हाथ से कटाई न के बराबर होने के कारण इन दिनों वह ग्राहकों का इंतजार करते रहते हैं।