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पंजाब कांग्रेस की कहानी: हर प्रधान के साथ बदला गुटों का चेहरा, नहीं बदली तकरार; तीन दशक से जारी चुनाैती
Fri, 02 Oct 2026 08:55 AM IST
Nivedita
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
Published by: Nivedita
Updated Fri, 02 Oct 2026 08:55 AM IST
सार
पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी एक स्थायी चुनाैती बनता जा रहा है। करीब तीन दशकों से विवाद के चेहरे और मुद्दे बदलते रहे, लेकिन गुटबाजी खत्म नहीं हुई।
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पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
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पंजाब कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष बदलते रहे, लेकिन संगठन के भीतर गुटबाजी और एक-दूसरे की टांग खिंचाई का सिलसिला नहीं टूटा। पिछले करीब तीन दशकों के इतिहास को देखें तो हर दौर में विवाद का चेहरा जरूर बदला, लेकिन प्रदेश कांग्रेस को एकजुट रखने की चुनौती बनी रही।
कभी प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री आमने-सामने आए, कभी मुख्यमंत्री और प्रदेश संगठन के बीच टकराव हुआ और कभी एक ही पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर खेमेबंदी खुलकर सामने आई। 1997 से लेकर राजा वड़िंग तक प्रदेश कांग्रेस की कमान संभालने वाले प्रमुख चेहरों के कार्यकाल को देखें तो यह सिलसिला लगातार दिखाई देता है।
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कभी प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री आमने-सामने आए, कभी मुख्यमंत्री और प्रदेश संगठन के बीच टकराव हुआ और कभी एक ही पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर खेमेबंदी खुलकर सामने आई। 1997 से लेकर राजा वड़िंग तक प्रदेश कांग्रेस की कमान संभालने वाले प्रमुख चेहरों के कार्यकाल को देखें तो यह सिलसिला लगातार दिखाई देता है।
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राजिंदर कौर भट्ठल : शुरुआत ही खेमेबंदी से…
1997 में राजिंदर कौर भट्ठल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनीं। इसके बाद उनका टकराव अमरिंदर सिंह के साथ सामने आया। 1998 में कांग्रेस विधायक दल के नेतृत्व को लेकर दोनों के बीच विवाद बढ़ा और आगे चलकर यही खींचतान पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का स्थायी हिस्सा बन गई। भट्ठल और अमरिंदर के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई कई वर्षों तक चलती रही।
कैप्टन अमरिंदर सिंह : अध्यक्ष से मुख्यमंत्री बनने तक विरोधी खेमा…
1999 में अमरिंदर सिंह ने प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाली। 2002 में कांग्रेस सत्ता में आई और अमरिंदर मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी पार्टी के भीतर असंतोष खत्म नहीं हुआ। राजिंदर कौर भट्ठल के साथ उनका टकराव इतना बढ़ा कि 2005 में कांग्रेस के करीब दो दर्जन विधायकों के उनके नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाने की खबरें सामने आईं। हाईकमान को मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। यानी संगठन की कमान बदलने से गुटबाजी खत्म नहीं हुई, बल्कि सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री बनाम असंतुष्ट नेताओं का नया समीकरण सामने आ गया।
हरविंदर सिंह हंसपाल : अपेक्षाकृत शांत दौर, लेकिन गुट बने रहे…
2002 से 2005 तक हरविंदर सिंह हंसपाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे। उनके कार्यकाल में बाद के वर्षों जैसी खुली लड़ाई नहीं दिखाई दी, लेकिन पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं के प्रभाव और संगठन में नियुक्तियों को लेकर असंतोष बना रहा। हंसपाल के बाद शमशेर सिंह दूल्लो को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया।
शमशेर सिंह दूल्लो : संगठन और सरकार के बीच दूरी…
2005 से 2007 तक दूल्लो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे। उनके समय भी संगठन के भीतर टिकटों और नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आए। बाद के वर्षों में दूल्लो ने अपनी ही कांग्रेस सरकारों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आवाज उठाने में भी संकोच नहीं किया। 2020 के जहरीली शराब मामले में उन्होंने तत्कालीन कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार पर सवाल उठाए और स्वतंत्र जांच की मांग की। इससे साफ हुआ कि कांग्रेस में असहमति केवल संगठन के भीतर पद और टिकट तक सीमित नहीं रही, बल्कि अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज उठाने तक पहुंचती रही।
राजिंदर कौर भट्ठल : वापसी के बाद भी टकराव की राजनीति…
2007 में भट्ठल दोबारा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनीं। यह वह दौर था जब कांग्रेस पंजाब की सत्ता से बाहर हो चुकी थी और पार्टी को दोबारा खड़ा करने की चुनौती थी। लेकिन नेतृत्व को लेकर खींचतान खत्म नहीं हुई। प्रदेश संगठन में अलग-अलग नेताओं के प्रभाव और भविष्य के नेतृत्व को लेकर अंदरूनी समीकरण चलते रहे।
1997 में राजिंदर कौर भट्ठल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनीं। इसके बाद उनका टकराव अमरिंदर सिंह के साथ सामने आया। 1998 में कांग्रेस विधायक दल के नेतृत्व को लेकर दोनों के बीच विवाद बढ़ा और आगे चलकर यही खींचतान पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का स्थायी हिस्सा बन गई। भट्ठल और अमरिंदर के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई कई वर्षों तक चलती रही।
कैप्टन अमरिंदर सिंह : अध्यक्ष से मुख्यमंत्री बनने तक विरोधी खेमा…
1999 में अमरिंदर सिंह ने प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाली। 2002 में कांग्रेस सत्ता में आई और अमरिंदर मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी पार्टी के भीतर असंतोष खत्म नहीं हुआ। राजिंदर कौर भट्ठल के साथ उनका टकराव इतना बढ़ा कि 2005 में कांग्रेस के करीब दो दर्जन विधायकों के उनके नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाने की खबरें सामने आईं। हाईकमान को मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। यानी संगठन की कमान बदलने से गुटबाजी खत्म नहीं हुई, बल्कि सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री बनाम असंतुष्ट नेताओं का नया समीकरण सामने आ गया।
हरविंदर सिंह हंसपाल : अपेक्षाकृत शांत दौर, लेकिन गुट बने रहे…
2002 से 2005 तक हरविंदर सिंह हंसपाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे। उनके कार्यकाल में बाद के वर्षों जैसी खुली लड़ाई नहीं दिखाई दी, लेकिन पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं के प्रभाव और संगठन में नियुक्तियों को लेकर असंतोष बना रहा। हंसपाल के बाद शमशेर सिंह दूल्लो को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया।
शमशेर सिंह दूल्लो : संगठन और सरकार के बीच दूरी…
2005 से 2007 तक दूल्लो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे। उनके समय भी संगठन के भीतर टिकटों और नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आए। बाद के वर्षों में दूल्लो ने अपनी ही कांग्रेस सरकारों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आवाज उठाने में भी संकोच नहीं किया। 2020 के जहरीली शराब मामले में उन्होंने तत्कालीन कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार पर सवाल उठाए और स्वतंत्र जांच की मांग की। इससे साफ हुआ कि कांग्रेस में असहमति केवल संगठन के भीतर पद और टिकट तक सीमित नहीं रही, बल्कि अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज उठाने तक पहुंचती रही।
राजिंदर कौर भट्ठल : वापसी के बाद भी टकराव की राजनीति…
2007 में भट्ठल दोबारा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनीं। यह वह दौर था जब कांग्रेस पंजाब की सत्ता से बाहर हो चुकी थी और पार्टी को दोबारा खड़ा करने की चुनौती थी। लेकिन नेतृत्व को लेकर खींचतान खत्म नहीं हुई। प्रदेश संगठन में अलग-अलग नेताओं के प्रभाव और भविष्य के नेतृत्व को लेकर अंदरूनी समीकरण चलते रहे।
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मोहिंदर सिंह केपी : नेतृत्व संकट के बीच संगठन…
2008 से 2010 तक मोहिंदर सिंह केपी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे। यह दौर अकाली-भाजपा सरकार के खिलाफ कांग्रेस को मजबूत करने का था, लेकिन संगठन के भीतर नेतृत्व को लेकर पूरी तरह एकराय नहीं बन सकी। 2010 में एक बार फिर अमरिंदर सिंह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने।
अमरिंदर सिंह की वापसी : बाजवा से सीधा टकराव….
2010 से 2013 तक अमरिंदर सिंह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे। 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद हाईकमान ने नेतृत्व में बदलाव किया और प्रताप सिंह बाजवा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। इसके बाद पंजाब कांग्रेस का सबसे खुला संगठनात्मक संघर्ष सामने आया। बाजवा अध्यक्ष थे, जबकि अमरिंदर सिंह पार्टी के भीतर अपनी अलग राजनीतिक ताकत बनाए हुए थे। 2015 तक दोनों के समर्थक खेमों में बंटे नजर आए। अमरिंदर समर्थकों ने बाजवा को हटाने और अमरिंदर को दोबारा नेतृत्व देने की मांग को लेकर अभियान चलाया। अंततः नवंबर 2015 में बाजवा ने प्रदेश अध्यक्ष पद छोड़ दिया और अमरिंदर सिंह को फिर कमान मिल गई।
2008 से 2010 तक मोहिंदर सिंह केपी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे। यह दौर अकाली-भाजपा सरकार के खिलाफ कांग्रेस को मजबूत करने का था, लेकिन संगठन के भीतर नेतृत्व को लेकर पूरी तरह एकराय नहीं बन सकी। 2010 में एक बार फिर अमरिंदर सिंह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने।
अमरिंदर सिंह की वापसी : बाजवा से सीधा टकराव….
2010 से 2013 तक अमरिंदर सिंह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे। 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद हाईकमान ने नेतृत्व में बदलाव किया और प्रताप सिंह बाजवा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। इसके बाद पंजाब कांग्रेस का सबसे खुला संगठनात्मक संघर्ष सामने आया। बाजवा अध्यक्ष थे, जबकि अमरिंदर सिंह पार्टी के भीतर अपनी अलग राजनीतिक ताकत बनाए हुए थे। 2015 तक दोनों के समर्थक खेमों में बंटे नजर आए। अमरिंदर समर्थकों ने बाजवा को हटाने और अमरिंदर को दोबारा नेतृत्व देने की मांग को लेकर अभियान चलाया। अंततः नवंबर 2015 में बाजवा ने प्रदेश अध्यक्ष पद छोड़ दिया और अमरिंदर सिंह को फिर कमान मिल गई।
सुनील जाखड़ : सरकार बनी, लेकिन कप्तान-सिद्धू टकराव नहीं रुका…
2017 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद सुनील जाखड़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने। चुनाव में पार्टी को जीत मिली, लेकिन सरकार बनने के बाद संगठन के भीतर नया टकराव शुरू हो गया। मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच मतभेद लगातार बढ़ते गए। 2019 में सिद्धू ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। 2021 में कोटकपूरा गोलीकांड की जांच और सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर भी कांग्रेस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया। हाईकमान ने नेताओं की शिकायतें सुनने के लिए समिति बनाई और अंततः जुलाई 2021 में जाखड़ की जगह नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया।
नवजोत सिंह सिद्धू : प्रधान बने तो मुख्यमंत्री बदल गया…
सिद्धू के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के साथ उनका टकराव और तेज हो गया। सितंबर 2021 में अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और चरणजीत सिंह चन्नी मुख्यमंत्री बने। इसके बाद सिद्धू और चन्नी के बीच भी मतभेद सामने आने लगे। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी में चन्नी और सिद्धू दो अलग राजनीतिक केंद्रों के रूप में दिखाई दिए। हाईकमान को हस्तक्षेप करते हुए चन्नी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करना पड़ा। चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और सिद्धू ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।
अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग : नया चेहरा, पुरानी बीमारी…
अप्रैल 2022 में राजा वड़िंग को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। उम्मीद थी कि 2022 की हार के बाद पार्टी में नई ऊर्जा आएगी और पुराने गुट खत्म होंगे। लेकिन वड़िंग के कार्यकाल में भी संगठन के भीतर मतभेद सामने आते रहे। भारत भूषण आशु और वड़िंग के बीच संगठनात्मक भूमिका को लेकर मतभेदों की चर्चा हुई। 2026 में यह खींचतान फिर खुलकर सामने आई और चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व में नेताओं की बैठक तथा वड़िंग के नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगे। हाईकमान ने पंजाब के नेताओं से फीडबैक लिया और अंततः वड़िंग के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटने का घटनाक्रम सामने आया।
प्रधान बदलते गए, गुटबाजी का चेहरा बदलता गया…
पंजाब कांग्रेस के इस पूरे सफर में एक बात लगातार दिखाई देती है। प्रदेश अध्यक्ष कोई भी हो, उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल विपक्ष से मुकाबला करना नहीं रही, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर अलग-अलग शक्ति केंद्रों को साथ लेकर चलना भी रही है। भट्ठल-अमरिंदर से शुरू हुआ टकराव बाद में अमरिंदर-बाजवा, अमरिंदर-सिद्धू, चन्नी-सिद्धू और अब चन्नी-वड़िंग खेमों की खींचतान के रूप में सामने आया। फर्क सिर्फ इतना रहा कि हर चुनाव के साथ चेहरे बदलते गए और विवाद का मुद्दा बदलता गया।
2017 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद सुनील जाखड़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने। चुनाव में पार्टी को जीत मिली, लेकिन सरकार बनने के बाद संगठन के भीतर नया टकराव शुरू हो गया। मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच मतभेद लगातार बढ़ते गए। 2019 में सिद्धू ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। 2021 में कोटकपूरा गोलीकांड की जांच और सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर भी कांग्रेस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया। हाईकमान ने नेताओं की शिकायतें सुनने के लिए समिति बनाई और अंततः जुलाई 2021 में जाखड़ की जगह नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया।
नवजोत सिंह सिद्धू : प्रधान बने तो मुख्यमंत्री बदल गया…
सिद्धू के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के साथ उनका टकराव और तेज हो गया। सितंबर 2021 में अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और चरणजीत सिंह चन्नी मुख्यमंत्री बने। इसके बाद सिद्धू और चन्नी के बीच भी मतभेद सामने आने लगे। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी में चन्नी और सिद्धू दो अलग राजनीतिक केंद्रों के रूप में दिखाई दिए। हाईकमान को हस्तक्षेप करते हुए चन्नी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करना पड़ा। चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और सिद्धू ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।
अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग : नया चेहरा, पुरानी बीमारी…
अप्रैल 2022 में राजा वड़िंग को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। उम्मीद थी कि 2022 की हार के बाद पार्टी में नई ऊर्जा आएगी और पुराने गुट खत्म होंगे। लेकिन वड़िंग के कार्यकाल में भी संगठन के भीतर मतभेद सामने आते रहे। भारत भूषण आशु और वड़िंग के बीच संगठनात्मक भूमिका को लेकर मतभेदों की चर्चा हुई। 2026 में यह खींचतान फिर खुलकर सामने आई और चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व में नेताओं की बैठक तथा वड़िंग के नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगे। हाईकमान ने पंजाब के नेताओं से फीडबैक लिया और अंततः वड़िंग के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटने का घटनाक्रम सामने आया।
प्रधान बदलते गए, गुटबाजी का चेहरा बदलता गया…
पंजाब कांग्रेस के इस पूरे सफर में एक बात लगातार दिखाई देती है। प्रदेश अध्यक्ष कोई भी हो, उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल विपक्ष से मुकाबला करना नहीं रही, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर अलग-अलग शक्ति केंद्रों को साथ लेकर चलना भी रही है। भट्ठल-अमरिंदर से शुरू हुआ टकराव बाद में अमरिंदर-बाजवा, अमरिंदर-सिद्धू, चन्नी-सिद्धू और अब चन्नी-वड़िंग खेमों की खींचतान के रूप में सामने आया। फर्क सिर्फ इतना रहा कि हर चुनाव के साथ चेहरे बदलते गए और विवाद का मुद्दा बदलता गया।