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किसानों के लिए गोभी बनी घाटे का सौदा
नरिंदर वैद्य/अमर उजाला, जालंधर
Updated Thu, 31 Dec 2015 03:40 PM IST
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पहले से ही अपनी फसलों के सही दाम न मिलने से आहत किसानों के लिए गोभी की फसल भी घाटे का सौदा बनकर रह गई है। इस साल किसानों को बाजार में गोभी की फसल की लागत भी नहीं मिल पा रही है।
किसान गोभी की फसल लेकर मंडियों में आ रहे हैं, लेकिन उन्हें खरीदार नहीं मिल पा रहा है। इस वजह से किसान अपनी फसल को केवल 4 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेच रहे हैं।
किसानों को मंडी में गोभी की फसल का मूल्य प्रति क्विंटल मात्र 350 से 400 रुपये ही मिल रहा है। इसमें तो किसानों का फसल बीजने का खर्च भी पूरा नहीं हो रहा है।
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ऐसा नहीं है कि गोभी के कम हुए मूल्य का फायदा आम जनता को मिल रहा है। मंडी में आज भी लोगों को गोभी 15 से 18 रुपये प्रति किलो ही मिल रही है।
लोगों के घरों में जाकर सब्जियां बेचने वाले गोभी को 20 से 22 रुपये प्रति किलो बेच रहे हैं। इससे साफ है कि गोभी की फसल का नुकसान होलसेलर और रिटेलर को नहीं, बल्कि मात्र किसान को ही उठाना पड़ रहा है।
बीते साल गोभी की हुई फसल की बात करें तो सूबे में 13,824 हेक्टेयर रकबे में फसल बीजी गई थी। इसमें से 24,8454 मीट्रिक टन फसल की आमद हुई थी। इस तरह जालंधर जिले में 636 हेक्टेयर में गोभी की फसल बीजी गई थी।
इसमें से 11,587 मीट्रिक टन फसल हुई है। बीते साल के मुकाबले इस साल यह फसल पहले से कम हुई है। इसके बावजूद किसानों को फसल का सही मूल्य नहीं मिल पा रहा है।
सब्जी मंडी बोर्ड के सचिव परमजीत सिंह चीमा का कहना है कि इस साल गोभी की फसल बीते साल के मुकाबले कम हुई है।
किसानों को कम मिल रहे मूल्य पर उन्होंने कहा कि हो सकता है कि मांग कम होने से लागत में गिरावट आई हो। अभी सीजन खत्म नहीं हुआ है। मूल्य में उतार-चड़ाव होता रहता है।
इस साल गोभी की बिजाई करने वाले किसान हरनाम सिंह का कहना है कि वर्तमान में उन्हें जो गोभी का मूल्य मिल रहा है, उससे ज्यादा खर्च तो इसके बीज से लेकर फसल के पकने तक हो जाता है।
उन्होंने कहा कि इस साल उन्होंने गोभी की फसल कम हेक्टेयर में बीजी थी, लेकिन इसके बावजूद उनकी फसल का पूरा मूल्य उन्हें नहीं मिल पा रहा है।
कृषि विशेषज्ञ प्रो. डॉ. राजकुमार का कहना है कि सब्जियों पर सरकार का नियंत्रण नहीं है। बीते साल हुई बेहतर मांग की वजह से ज्यादातर किसान उसी फसल की बिजाई कर देते हैं।
फसल मार्केट में ज्यादा आ जाने से उनको सही मूल्य नहीं मिल पाता। इसके अलावा अभी तक पंजाब में फूड प्रोसेसिंग का भी कोई इंतजाम नहीं है।
इस वजह से यह आशा भी नहीं की जा सकती कि किसानों की फसल की खपत फूड प्रोसेसिंग में जाएगी। ऐसा ही हाल बासमती और अन्य फसलों का भी हो रहा है।
इसमें सबसे ज्यादा फायदे में होलसेलर व रिटेलर रहते हैं। बस कुछ मिस मैनेजमेंट से किसानों की फसलों का यह हाल हो रहा है।
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किसान गोभी की फसल लेकर मंडियों में आ रहे हैं, लेकिन उन्हें खरीदार नहीं मिल पा रहा है। इस वजह से किसान अपनी फसल को केवल 4 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेच रहे हैं।
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किसानों को मंडी में गोभी की फसल का मूल्य प्रति क्विंटल मात्र 350 से 400 रुपये ही मिल रहा है। इसमें तो किसानों का फसल बीजने का खर्च भी पूरा नहीं हो रहा है।
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ऐसा नहीं है कि गोभी के कम हुए मूल्य का फायदा आम जनता को मिल रहा है। मंडी में आज भी लोगों को गोभी 15 से 18 रुपये प्रति किलो ही मिल रही है।
लोगों के घरों में जाकर सब्जियां बेचने वाले गोभी को 20 से 22 रुपये प्रति किलो बेच रहे हैं। इससे साफ है कि गोभी की फसल का नुकसान होलसेलर और रिटेलर को नहीं, बल्कि मात्र किसान को ही उठाना पड़ रहा है।
बीते साल गोभी की हुई फसल की बात करें तो सूबे में 13,824 हेक्टेयर रकबे में फसल बीजी गई थी। इसमें से 24,8454 मीट्रिक टन फसल की आमद हुई थी। इस तरह जालंधर जिले में 636 हेक्टेयर में गोभी की फसल बीजी गई थी।
इसमें से 11,587 मीट्रिक टन फसल हुई है। बीते साल के मुकाबले इस साल यह फसल पहले से कम हुई है। इसके बावजूद किसानों को फसल का सही मूल्य नहीं मिल पा रहा है।
सब्जी मंडी बोर्ड के सचिव परमजीत सिंह चीमा का कहना है कि इस साल गोभी की फसल बीते साल के मुकाबले कम हुई है।
किसानों को कम मिल रहे मूल्य पर उन्होंने कहा कि हो सकता है कि मांग कम होने से लागत में गिरावट आई हो। अभी सीजन खत्म नहीं हुआ है। मूल्य में उतार-चड़ाव होता रहता है।
इस साल गोभी की बिजाई करने वाले किसान हरनाम सिंह का कहना है कि वर्तमान में उन्हें जो गोभी का मूल्य मिल रहा है, उससे ज्यादा खर्च तो इसके बीज से लेकर फसल के पकने तक हो जाता है।
उन्होंने कहा कि इस साल उन्होंने गोभी की फसल कम हेक्टेयर में बीजी थी, लेकिन इसके बावजूद उनकी फसल का पूरा मूल्य उन्हें नहीं मिल पा रहा है।
कृषि विशेषज्ञ प्रो. डॉ. राजकुमार का कहना है कि सब्जियों पर सरकार का नियंत्रण नहीं है। बीते साल हुई बेहतर मांग की वजह से ज्यादातर किसान उसी फसल की बिजाई कर देते हैं।
फसल मार्केट में ज्यादा आ जाने से उनको सही मूल्य नहीं मिल पाता। इसके अलावा अभी तक पंजाब में फूड प्रोसेसिंग का भी कोई इंतजाम नहीं है।
इस वजह से यह आशा भी नहीं की जा सकती कि किसानों की फसल की खपत फूड प्रोसेसिंग में जाएगी। ऐसा ही हाल बासमती और अन्य फसलों का भी हो रहा है।
इसमें सबसे ज्यादा फायदे में होलसेलर व रिटेलर रहते हैं। बस कुछ मिस मैनेजमेंट से किसानों की फसलों का यह हाल हो रहा है।