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बसपा में पहली कतार के नेता हाशिये पर, एक पावरफुल गुट तैयार
ब्यूरो, अमर उजाला/जालंध्ार
Updated Tue, 21 Jul 2015 10:06 PM IST
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बहुजन समाज पार्टी में इन दिनों सब ठीक नहीं है। पार्टी कभी भी राज्य की
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सियासत में नया टर्न ले सकती है। पार्टी के कई टकसाली नेता अपने-अपने अलग
गुट बना रहे हैं। इस सबसे कांग्रेस और शिअद पूरी तरह से चौकस हो गए हैं।
दरअसल, पंजाब में 1997 के बाद से बसपा ने एक भी विधानसभा सीट नहीं जीती है।
1997 में सिर्फ एक विधायक गढ़शंकर से शिंगारा राम सहूंगड़ा सीट जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। उसके बाद से लोकसभा व विधानसभा की एक भी सीट बसपा जीत नहीं पाई है। पार्टी का जनाधार और वोट बैंक लगातार खिसकता जा रहा है। 1992 में बसपा के पंजाब में 9 विधायक थे। राज्य में विधानसभा चुनावों में बसपा का लगातार ग्राफ गिरा है। 1992 में 16.32 फीसदी, 1997 में 7.48 फीसदी, 2002 में 5.69, 2007 में 4.13 फीसदी और 2012 में 4.28 फीसदी वोट बैंक बसपा को हासिल हुआ है। 2014 में तो पार्टी को सिर्फ 1.9 फीसदी ही वोट मिले।
राज्य में बसपा के गिरते जनाधार से पार्टी में तूफान तो लोकसभा चुनावों के बाद से ही शुरू हो गया था। तत्कालीन प्रधान प्रकाश जंडाली को पार्टी से निकाल दिया गया। पार्टी के कई टकसाली नेता इस बात पर हाईकमान पर दबाव बनाने में लग गए कि ऐसे पार्टी का वोटर बिल्कुल खत्म हो जाएगा। बसपा के कई टकसाली नेताओं ने इसका पूरा खाका तैयार कर हाईकमान को भेजा कि किस तरह से पंजाब में भाजपा की टिकट लेने के लिए कोई नेता तैयार नहीं होता था। सत्ता में 15 साल रहने के बाद पार्टी मजबूूत भी हुई है। पंजाब में जहां भाजपा के 3 लाख 50 हजार सदस्य थे, वहीं अब यह आंकड़ा 23 लाख को पार कर चुका है।
पार्टी पर अपना प्रभाव डालने के लिए बसपा के करीब 12 नेताओं को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया गया है। जालंधर से बसपा के तीन प्रदेश स्तरीय नेता भी खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं। नवांशहर, फगवाड़ा, होशियारपुर और दोआबा के अन्य दिग्गज अपनी अलग लॉबी तैयार कर चुके हैं। इनमें कई नेताओं का संपर्क अकाली दल से भी चल रहा है। शिअद के नेता भी उनकी पीठ थपथपा रहे हैं। ऐसे नेताओं ने साफ कह दिया है कि पार्टी के भीतर जो रणनीति चल रही है, उससे पार्टी का ही नुकसान हो रहा है। नए नेताओं को आगे लाया जा रहा है। बहरहाल, गुप्त मीटिंगों से लेकर विचार विमर्श का दौरा तेजी से शुरू हो गया है।
दरअसल, पंजाब में 1997 के बाद से बसपा ने एक भी विधानसभा सीट नहीं जीती है।
1997 में सिर्फ एक विधायक गढ़शंकर से शिंगारा राम सहूंगड़ा सीट जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। उसके बाद से लोकसभा व विधानसभा की एक भी सीट बसपा जीत नहीं पाई है। पार्टी का जनाधार और वोट बैंक लगातार खिसकता जा रहा है। 1992 में बसपा के पंजाब में 9 विधायक थे। राज्य में विधानसभा चुनावों में बसपा का लगातार ग्राफ गिरा है। 1992 में 16.32 फीसदी, 1997 में 7.48 फीसदी, 2002 में 5.69, 2007 में 4.13 फीसदी और 2012 में 4.28 फीसदी वोट बैंक बसपा को हासिल हुआ है। 2014 में तो पार्टी को सिर्फ 1.9 फीसदी ही वोट मिले।
राज्य में बसपा के गिरते जनाधार से पार्टी में तूफान तो लोकसभा चुनावों के बाद से ही शुरू हो गया था। तत्कालीन प्रधान प्रकाश जंडाली को पार्टी से निकाल दिया गया। पार्टी के कई टकसाली नेता इस बात पर हाईकमान पर दबाव बनाने में लग गए कि ऐसे पार्टी का वोटर बिल्कुल खत्म हो जाएगा। बसपा के कई टकसाली नेताओं ने इसका पूरा खाका तैयार कर हाईकमान को भेजा कि किस तरह से पंजाब में भाजपा की टिकट लेने के लिए कोई नेता तैयार नहीं होता था। सत्ता में 15 साल रहने के बाद पार्टी मजबूूत भी हुई है। पंजाब में जहां भाजपा के 3 लाख 50 हजार सदस्य थे, वहीं अब यह आंकड़ा 23 लाख को पार कर चुका है।
पार्टी पर अपना प्रभाव डालने के लिए बसपा के करीब 12 नेताओं को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया गया है। जालंधर से बसपा के तीन प्रदेश स्तरीय नेता भी खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं। नवांशहर, फगवाड़ा, होशियारपुर और दोआबा के अन्य दिग्गज अपनी अलग लॉबी तैयार कर चुके हैं। इनमें कई नेताओं का संपर्क अकाली दल से भी चल रहा है। शिअद के नेता भी उनकी पीठ थपथपा रहे हैं। ऐसे नेताओं ने साफ कह दिया है कि पार्टी के भीतर जो रणनीति चल रही है, उससे पार्टी का ही नुकसान हो रहा है। नए नेताओं को आगे लाया जा रहा है। बहरहाल, गुप्त मीटिंगों से लेकर विचार विमर्श का दौरा तेजी से शुरू हो गया है।