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कचरा बना कमाई का जरिया: बेकार बोतलों में उगाए ऑयस्टर मशरूम, एमसीएम कॉलेज का वेस्ट-टू-वेल्थ मॉडल
Wed, 30 Sep 2026 09:56 AM IST
Nivedita
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Wed, 30 Sep 2026 09:56 AM IST
सार
खाद्य विज्ञान विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ. वंदना शर्मा और डॉ. संदीप कौर ने छात्रों की टीम के साथ मिलकर कम लागत और पर्यावरण अनुकूल तरीके से ऑयस्टर मशरूम उगाने की पद्धति विकसित की। डॉ. संदीप के मुताबिक कृषि अवशेष और घरेलू किचन कचरे को मशरूम के लिए आधार सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
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चंडीगढ़ एमसीएम डीएवी कॉलेज फॉर वुमन का प्रयोग
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
जिस प्लास्टिक बोतल को पानी पीने के बाद अक्सर कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है, वही बोतल अगर मशरूम उगाने का कंटेनर बन जाए तो कचरा सिर्फ समस्या नहीं रहता बल्कि कमाई का जरिया भी बन सकता है।
मेहर चंद महाजन (एमसीएम) डीएवी कॉलेज फॉर वुमन के खाद्य विज्ञान विभाग में इसी सोच को प्रयोग के जरिए जमीन पर उतारा गया है। यहां कृषि अवशेष और घरों से निकलने वाले किचन कचरे को ऑयस्टर मशरूम यानी डिंगरी की खेती के लिए उपयोगी बनाया जा रहा है।
इस प्रयोग की खासियत यह है कि मशरूम उगाने के लिए नई प्लास्टिक सामग्री खरीदने के बजाय बेकार पड़ी प्लास्टिक बोतलों को दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। यानी एक ही मॉडल में कचरे के दो हिस्सों का समाधान-जैविक कचरे से उत्पादन और प्लास्टिक का पुन: इस्तेमाल। खाद्य विज्ञान विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ. वंदना शर्मा और डॉ. संदीप कौर ने छात्रों की टीम के साथ मिलकर कम लागत और पर्यावरण अनुकूल तरीके से ऑयस्टर मशरूम उगाने की पद्धति विकसित की। डॉ. संदीप के मुताबिक कृषि अवशेष और घरेलू किचन कचरे को मशरूम के लिए आधार सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
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मेहर चंद महाजन (एमसीएम) डीएवी कॉलेज फॉर वुमन के खाद्य विज्ञान विभाग में इसी सोच को प्रयोग के जरिए जमीन पर उतारा गया है। यहां कृषि अवशेष और घरों से निकलने वाले किचन कचरे को ऑयस्टर मशरूम यानी डिंगरी की खेती के लिए उपयोगी बनाया जा रहा है।
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इस प्रयोग की खासियत यह है कि मशरूम उगाने के लिए नई प्लास्टिक सामग्री खरीदने के बजाय बेकार पड़ी प्लास्टिक बोतलों को दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। यानी एक ही मॉडल में कचरे के दो हिस्सों का समाधान-जैविक कचरे से उत्पादन और प्लास्टिक का पुन: इस्तेमाल। खाद्य विज्ञान विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ. वंदना शर्मा और डॉ. संदीप कौर ने छात्रों की टीम के साथ मिलकर कम लागत और पर्यावरण अनुकूल तरीके से ऑयस्टर मशरूम उगाने की पद्धति विकसित की। डॉ. संदीप के मुताबिक कृषि अवशेष और घरेलू किचन कचरे को मशरूम के लिए आधार सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
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2019 में देशभर में मिली पहचान
कॉलेज की इस वेस्ट-टू-वेल्थ पहल को वर्ष 2019 में स्वच्छ सर्वेक्षण पुरस्कार के बेस्ट सिटीजन-लेड इनोवेशन वर्ग में अखिल भारतीय स्तर पर तीसरा स्थान मिला था। 6 मार्च 2019 को नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय की ओर से कॉलेज को यह सम्मान दिया गया था। पुरस्कार मिलने के बाद भी प्रयोग थमा नहीं। विभाग की ओर से वर्ष 2019 से लगातार अक्टूबर से मार्च के मौसम में छात्रों को ऑयस्टर मशरूम की खेती का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
कक्षा से आगे, कचरे को कमाई में बदलने की ट्रेनिंग
प्राचार्या नीना शर्मा के मार्गदर्शन में यह पहल छात्रों के लिए पर्यावरण जागरूकता के साथ उद्यमिता सीखने का माध्यम भी बनी है। हर साल बीएससी माइक्रोबियल एंड फूड टेक्नोलॉजी के कम से कम 10 से 15 छात्र इसमें शामिल होते हैं।
छात्र कचरे को उपयोगी आधार सामग्री बनाने से लेकर मशरूम की स्पॉनिंग, उत्पादन, कटाई और पोषण संबंधी जांच तक की प्रक्रिया सीखते हैं। तैयार मशरूम को कॉलेज के स्टाफ और शिक्षकों को कम कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है। कुछ मशरूम को सुखाकर प्रोटीन से भरपूर पाउडर बनाया जाता है। इसी पाउडर से छात्र कपकेक और कुकीज जैसे मूल्यवर्धित खाद्य उत्पाद भी तैयार करते हैं।
मशरूम के बाद भी नहीं बचता बेकार कचरा
इस मॉडल की खासियत सिर्फ मशरूम की खेती तक सीमित नहीं है। मशरूम तैयार होने के बाद बची सामग्री को भी बेकार नहीं छोड़ा जाता। इस्तेमाल हो चुके कल्चर बैग और आधार सामग्री से छात्रों ने सजावटी और उपयोगी वस्तुएं बनाने के प्रयोग किए हैं। यानी शुरुआत प्लास्टिक बोतल से होती है, बीच में किचन और कृषि कचरा काम आता है और अंत में बची सामग्री का भी इस्तेमाल हो जाता है। मकसद उत्पादन के साथ शून्य कचरा की सोच को बढ़ावा देना है।
कॉलेज से गांव और जेल तक पहुंचा प्रयोग
कॉलेज ने इस नवाचार को प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रखा। शिक्षकों और छात्रों ने दूसरे संस्थानों के विद्यार्थियों, आसपास के गोद लिए गए गांवों की महिलाओं और वर्ष 2022 में जेल के बंदियों को भी बेकार सामग्री से ऑयस्टर मशरूम उगाने का प्रशिक्षण दिया।
कॉलेज की इस वेस्ट-टू-वेल्थ पहल को वर्ष 2019 में स्वच्छ सर्वेक्षण पुरस्कार के बेस्ट सिटीजन-लेड इनोवेशन वर्ग में अखिल भारतीय स्तर पर तीसरा स्थान मिला था। 6 मार्च 2019 को नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय की ओर से कॉलेज को यह सम्मान दिया गया था। पुरस्कार मिलने के बाद भी प्रयोग थमा नहीं। विभाग की ओर से वर्ष 2019 से लगातार अक्टूबर से मार्च के मौसम में छात्रों को ऑयस्टर मशरूम की खेती का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
कक्षा से आगे, कचरे को कमाई में बदलने की ट्रेनिंग
प्राचार्या नीना शर्मा के मार्गदर्शन में यह पहल छात्रों के लिए पर्यावरण जागरूकता के साथ उद्यमिता सीखने का माध्यम भी बनी है। हर साल बीएससी माइक्रोबियल एंड फूड टेक्नोलॉजी के कम से कम 10 से 15 छात्र इसमें शामिल होते हैं।
छात्र कचरे को उपयोगी आधार सामग्री बनाने से लेकर मशरूम की स्पॉनिंग, उत्पादन, कटाई और पोषण संबंधी जांच तक की प्रक्रिया सीखते हैं। तैयार मशरूम को कॉलेज के स्टाफ और शिक्षकों को कम कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है। कुछ मशरूम को सुखाकर प्रोटीन से भरपूर पाउडर बनाया जाता है। इसी पाउडर से छात्र कपकेक और कुकीज जैसे मूल्यवर्धित खाद्य उत्पाद भी तैयार करते हैं।
मशरूम के बाद भी नहीं बचता बेकार कचरा
इस मॉडल की खासियत सिर्फ मशरूम की खेती तक सीमित नहीं है। मशरूम तैयार होने के बाद बची सामग्री को भी बेकार नहीं छोड़ा जाता। इस्तेमाल हो चुके कल्चर बैग और आधार सामग्री से छात्रों ने सजावटी और उपयोगी वस्तुएं बनाने के प्रयोग किए हैं। यानी शुरुआत प्लास्टिक बोतल से होती है, बीच में किचन और कृषि कचरा काम आता है और अंत में बची सामग्री का भी इस्तेमाल हो जाता है। मकसद उत्पादन के साथ शून्य कचरा की सोच को बढ़ावा देना है।
कॉलेज से गांव और जेल तक पहुंचा प्रयोग
कॉलेज ने इस नवाचार को प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रखा। शिक्षकों और छात्रों ने दूसरे संस्थानों के विद्यार्थियों, आसपास के गोद लिए गए गांवों की महिलाओं और वर्ष 2022 में जेल के बंदियों को भी बेकार सामग्री से ऑयस्टर मशरूम उगाने का प्रशिक्षण दिया।