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पंजाब के किसानों का कपास की खेती से मोहभंग: उत्पादन में बड़ी गिरावट, फसल विविधीकरण के प्रयासों को झटका
Mon, 21 Jul 2025 02:30 PM IST
निवेदिता वर्मा
राजिंद्र शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
राजिंद्र शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Mon, 21 Jul 2025 02:30 PM IST
सार
मालवा क्षेत्र कपास उत्पादन के लिए जाना जाता है, लेकिन अब यहां का किसान धान और गेहूं की फसलों का रुख कर रहे हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अनिश्चितता व गुलाबी सुंडी व सफेद मक्खी का प्रकोप किसानों के कपास की खेती छोड़ने का प्रमुख कारण माना जा रहा है।
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कपास का उत्पादन
- फोटो : Social Media
विस्तार
पंजाब के किसानों का कपास की खेती से मोहभंग होता जा रहा है। इसी का नतीजा है कि इस साल प्रदेश में कपास उत्पादन में 63.48 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। एक साल के अंदर कपास के उत्पादन में बड़ी कमी आने से सरकार के फसल विविधीकरण के प्रयासों को झटका लगा है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अनिश्चितता व गुलाबी सुंडी व सफेद मक्खी का प्रकोप किसानों के कपास की खेती छोड़ने का प्रमुख कारण माना जा रहा है। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया की ताजा रिपोर्ट में कपास का उत्पादन कम होने की बात सामने आई है।
मालवा क्षेत्र कपास उत्पादन के लिए जाना जाता है, लेकिन अब यहां का किसान धान और गेहूं की फसलों का रुख कर रहे हैं। प्रदेश के भूजल का स्तर पहले ही गिर रहा है। 118 ब्लॉक रेड जोन में चले गए हैं और इस रिपोर्ट ने सरकार की चिंता अब और भी बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार कपास का उत्पादन 2023-24 में 6.09 लाख से घटकर 2024-25 में 2.52 लाख गांठों तक रह गया है। इसी तरह एरिया भी 2.14 लाख से घटकर 1 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है।
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न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अनिश्चितता व गुलाबी सुंडी व सफेद मक्खी का प्रकोप किसानों के कपास की खेती छोड़ने का प्रमुख कारण माना जा रहा है। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया की ताजा रिपोर्ट में कपास का उत्पादन कम होने की बात सामने आई है।
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मालवा क्षेत्र कपास उत्पादन के लिए जाना जाता है, लेकिन अब यहां का किसान धान और गेहूं की फसलों का रुख कर रहे हैं। प्रदेश के भूजल का स्तर पहले ही गिर रहा है। 118 ब्लॉक रेड जोन में चले गए हैं और इस रिपोर्ट ने सरकार की चिंता अब और भी बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार कपास का उत्पादन 2023-24 में 6.09 लाख से घटकर 2024-25 में 2.52 लाख गांठों तक रह गया है। इसी तरह एरिया भी 2.14 लाख से घटकर 1 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है।
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