खाटी बनारसी अंदाज में जीने वालों के लिए अखाड़े आज भी गहना हैं। यहां अखाड़ों में सत्तार साल के भी पहलवान सौ जोड़ी गदा फेरते मिलेंगे तो होश संभालने के साथ ही धूर पोतने के लिए लंगोटा बांधे युवा भी। मोहल्लों में चलने वाले अखाड़े आज भी युवकों के शौक में शुमार हैं।
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wrestling in Varanasi
- फोटो : अमर उजाला
दो घंटे धूल में लोटपोट न हुई तो मजा नहीं आता। काशी के इन अखाड़ों से कई हिंद केसरी, यूपी केसरी और बनारस केसरी निकले हैं। नाग पंचमी पर 27 जुलाई को बनारस के अखाड़ों में मल्ल उतरेंगे और दंगल देखने लायक होगा। काशी में सुबह-शाम कंधे पर गमछा डाल कर लंगोट पहना अखाड़े में शारीरिक सौष्ठव के लिए युवाओं की टोलियां निकल पड़ती हैं।
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दांव-पेंच सीखने के साथ ही धूल पोत कर मुश्कें बनाने का शौक आप देखते रह जाएंगे। हर मुहल्ले में ऐसा अखाड़े भोर में ही गुलजार हो जाते हैं। हालांकि नए दौर में जिमखानों के अलावा फिटनेस के लिए कसरत के उपकरणों के आकर्षण के चलते कुछ बदलाव भी आया है। लेकिन फिर बी अखाड़ों का कोई जोड़ नहीं है।
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बनारस में एक जमाने में इन्हीं अखाड़ों से निकले अंतरराष्ट्रीय पहलवानों ने भारत का नाम रौशन किया है। नागपंचमी पर अखाड़ों की माटी पर दमखम दिखाने के लिए पहलवानों ने कसरत शुरू कर दी है। ध्यानचंद अवार्डी कैप्टन राजेंद्र सिंह ने बताया कि पहलवानी में अब तो लड़कियां भी हाथ आजमा रही हैं। यह बेहद सकारात्मक है।
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हमारे समय में बनारस के युवकों में अखाड़े जाने की होड़ थी। किसी परिवार में अगर कोई नामी पहलवान निकला तो उसकी प्रतिष्ठा दोगुनी हो जाती। अखाड़ा गया सेठ के मनोहर पहलवान ने बताया कि अब तो कुश्ती का स्वरूप ही बदल गया है। इस अखाड़े से निकले जमुना, मेवा, बच्चा, इमरान, चंदन, सुनील, मुरारी, छोटलाल समेत कई अंतरराष्ट्रीय पहलवानों ने देश का नाम रौशन किया है।