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Women's Day: ‘कैक्टस भरी जिंदगी’ से साकार किए सपने, अपने लिए ही नहीं दूसरों का भी बनीं संबल

Thu, 07 Mar 2019 10:43 PM IST
Sayali Maurya न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी Published by: Sayali Maurya Updated Thu, 07 Mar 2019 10:43 PM IST
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Womens Day 2019 story of women in social fields
womens day - फोटो : amar ujala

‘कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालों यारों’ यह कहावत उन महिलाओं के जज्बे से सच हो गई जो खुद के लिए दूसरों का भी संबल बन चुकी हैं। कर्तव्य पथ बढ़ना और बढ़ते ही रहने की सीख देती ये महिलाएं चिकित्सा, शिक्षा, कला में निपुण हैं ही, समाज सेवा का जज्बा भी कम नहीं है। इन महिलाओं को रोल मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। देखें आगे की स्लाइड्स में...

Womens Day 2019 story of women in social fields
womens day - फोटो : amar ujala

कला और साहित्य से अनुराग ने दिलाया सम्मान

संसदीय हिंदी परिषद द्वारा राष्ट्र भाषा गौरव सम्मान से सम्मानित अन्नपूर्णा नगर कॉलोनी की साहित्यकार डॉ. मुक्ता पढ़ाई में अव्वल रहीं। माता पिता की इच्छा थी कि वह डॉक्टर बने, लेकिन उनकी रुचि साहित्य और कला में थी। इसी वजह से पढ़ाई के साथ संगीत एवं नृत्य की भी शिक्षा ली। कक्षा पांच से उन्होंने तुकबंदियां लिखनी शुरू कर दी थीं। डॉ. मुक्ता की पहली कहानी ‘कैक्टस भरी जिंदगी’ प्रकाशित हुई। इसके बाद कहानी संग्रह पलास वन के घुंघरू, आधा कोष, इस घर उस घर, सीढ़ियों का बाजार का प्रकाशन हुआ। डीडी भारती पर प्रसारित विद्यानिवास मिश्र के जीवन पर आधारित वृत्तचित्र ‘चितवन की छांह’ का निर्देशन भी किया। उन्हें संसदीय हिंदी परिषद से राष्ट्र भाषा गौरव सम्मान, भारतेंदु प्रभा सम्मान, प्रेमचंद सम्मान, श्यामा देवी बेरी सम्मान, गायत्री साहित्य संस्थान, साहित्य शिरोमणि सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। लेकिन उनकी राह इतनी आसान नहीं थी। दिल्ली के राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज में शिक्षक बनीं, लेकिन पति का स्थानांतरण करनाल हो गया। पारिवारिक समस्याओं के चलते नौकरी छोड़कर करनाल जाना पड़ा। कुछ करने के जज्बे ने उन्हें घर में नहीं बैठने दिया। कामता महराज से कथक की शिक्षा ले चुकीं डॉ. मुक्ता ने करनाल में ही युवाओं को नृत्य का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया और अपनी अलग पहचान बनाई। डॉ. मुक्ता अब भी साहित्य की साधना में लगी है। 
 

Womens Day 2019 story of women in social fields
womens day - फोटो : amar ujala

विपत्तियों में बेटी बनीं हौसला 

संगीत शिक्षक के रूप में पहचानी जाने वाली कैवल्य धाम की डॉ. मधुमिता भट्टाचार्या की कहानी सबसे अलग है। कई विपत्तियों से सामना हुआ, लेकिन इन सबको भूल उन्होंने जो ठाना, उस मुकाम को हासिल किया। आर्य महिला पीजी कॉलेज से मानदेय पर शिक्षक बनीं। इसके बाद यहीं स्थायी शिक्षक बनीं और अब बीएचयू में वरिष्ठ असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। डीलिट करने के दौरान 2018 में शादी के बारह साल बाद पति की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। एक तरफ पति को खोने का दुख था, दूसरी तरफ तीन साल की बेटी को पालने की जिम्मेदारी। ऐसे में वह निराश हुईं तो बेटी की मासूमियत ने हौसला दिया। लगन के साथ वह फिर आगे बढ़ीं और नवंबर 2018 में दीक्षांत समारोह में उन्हें डीलिट की उपाधि दी गई। बीएचयू के संगीत और मंच कला संकाय की वह पहली ऐसी शिक्षक है, जिन्हें संगीत में डीलिट की उपाधि हासिल है। आज वह अपनी प्रतिभा के बल पर युवा कलाकारों की पौध को सींचने में जीजान से जुटी हैं।
 

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Womens Day 2019 story of women in social fields
womens day - फोटो : amar ujala

पहले देश और अब महिलाओं को बना रहीं मजबूत

आर्मी मेडिकल कोर में कैप्टन के रूप में कॅरियर की शुरुआत करते वाली सामने घाट निवासी डॉ. अंजली रानी ने बेहतर चिकित्सा के बल पर मेजर बनीं। इसके बाद वह बहुत से गांवों में गईं तो महिलाओं के चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव देख उनके लिए कुछ करने के जज्बात उमड़े। कुछ समय बाद सेना की नौकरी छोड़ बनारस आ गईं और बीएचयू में स्त्री रोग विभाग में कार्यभार संभाला। अब वह ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य की देखभाल करती हैं। मूल रूप से पंजाब की रहने वाली डॉ. अंजली माता-पिता की इकलौती संतान हैं। चंडीगढ़ से इंटर और बीएचयू से मेडिकल की शिक्षा ग्रहण करने के बाद वह 2002 में आर्मी हॉस्पिटल चंडीगढ़ में नियुक्त हुईं। अंजली कहती हैं कि कागजों में तो कई सरकारी सुविधाएं चलती हैं, लेकिन उसका लाभ आम लोगों को नहीं मिल पाता है, जबकि उन्हें इसकी जरूरत होती है। 
 

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womens day - फोटो : amar ujala

स्वयं सहायता समूह से महिलाओं को बना रहीं स्वावलंबी

आराजीलाइन विकासखंड की ग्राम सभा दयापुर निवासी शर्मिला ने ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को स्वावलंबी बनाने का बीड़ा उठाया है। वह स्वयं सहायता समूह गठित कर महिलाओं को रोजगार से जोड़ रही हैं और अब तक 20 स्वयं सहायता समूह बना चुकी हैं। दो सौ महिलाएं इनसे जुड़ी हैं। बेरोजगार महिलाओं को प्रशिक्षित किया और अब यही महिलाएं पशुपालन, ब्यूटी पार्लर, सिलाई, कढ़ाई जैसे काम कर परिवार का सहारा बन चुकी हैं। वहीं काशी विद्यापीठ विकासखंड की जानकी देवी पहले परिवार और फिर आसपास की महिलाओं का भी सहारा बनीं। वह ग्रामीण क्षेत्र की लड़कियों को सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण देकर हुनरमंद बना रही हैं। वह निशुल्क प्रशिक्षण देती है, फिर स्वयं सहायता समूह के जरिए पैसा दिलवाकर रोजगार से भी जोड़ती हैं। वह अब तक सौ से ज्यादा लड़कियों को रोजगार से जोड़ चुकी हैं।

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