26 फरवरी को बाबा विश्वनाथ की नगरी अनूठे रंगोत्सव की साक्षी बनेगी। मौका होगा बाबा विश्वनाथ के गौने का। बाबा की डोली उठने के साथ ही विश्वनाथ गली अबीर-गुलाल की बौछार से लाल हो जाएगी। इसी के साथ पांच दिनी होलाष्टक लगने से काशी में होली आरंभ हो जाएगी। पुराणों में ऐसा वर्णन मिलता है कि यही वह दिन है जब बाबा विश्वनाथ माता पार्वती से विवाह के बाद पहली बार काशी आए थे। आगे के स्लाइड्स में जानिए...
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- फोटो : अमर उजाला
रंगभरी एकादशी, फाल्गुन शुक्ल पक्ष पर आने वाले इस दिन का विशेष महत्व है। इस वर्ष रंगभरी एकादशी 26 फरवरी 2018 को मनाई जा रही है। रंगभरी एकादशी वैसे तो परंपरागत तरीके से पूरे देश में मनाई जाती है, किंतु इसका सर्वाधिक उत्साह काशी में देखने मिलता है। रंगभरी एकादशी पर काशीवासियों के आराध्य दूल्हे के रूप में सजकर मां गौरा को गौने पर लाएंगे।
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गौने में काशीपुराधिपति और मां गौरा के साथ होली खेलने के बाद काशी में फगुनहट का रंग और भी चटख हो जाता है। रंगभरी एकादशी पर होने वाले सांस्कृतिक आयोजनों की तैयारियां महंत आवास पर शुरू हो चुकी हैं। गौने के बाद होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए कलाकारों के चयन की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है।
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अबीर-गुलाल, ढोल-नगाड़े ,डमरू की थाप और शंखनाद से पूरा रेडजोन परिसर गूंज उठता है। विश्वनाथ मंदिर परिसर की गलियां पूरी तरह से अबीर-गुलाल से पट जाती हैं। बाबा के दर्शन के लिए देश-विदेश से लोग काशी पहुंचते हैं।
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महंत के आवास पर गौने की रस्म अदा की जाती है। इस दौरान काशी पुराधिपति, मां पार्वती संग भगवान प्रथमेश की रजत प्रतिमा का महंत आवास पर दर्शन पूजन होता है। संध्या में रजत पालकी पर विराजमान महंत आवास से यात्रा मंदिर के लिए निकलती है। गर्भगृह तक निकलने वाली यात्रा के गवाह हजारों भक्त होते हैं।